यह श्लोक संस्कृत के प्रसिद्ध नीति ग्रंथ ‘चाणक्य नीति’ से उद्धृत है। कुछ नीति-संग्रहों में इसे महाभारत और सुभाषित-रत्न-भांडागार जैसे नीतिपरक ग्रंथों में भी संदर्भ के रूप में देखा जाता है।
श्लोक :
यथात्मनस्तथान्यस्य रहस्यं न प्रकाशयेत्।
विजानीयाच्च वैगुण्यं यथान्यस्य तथात्मनः॥
भावार्थ :
जैसे स्वयं के रहस्य को कभी प्रकट न करे, वैसे ही कभी किसी अन्य के भी रहस्य को प्रकट न करे। वैसे ही अपने दुर्गुणों को तथा अन्यों के दुर्गुणों को भी ध्यान में रखें।
श्लोक का विश्लेषण और प्रासंगिकता :
1. गोपनीयता का सम्मान:
श्लोक का संदेश: जिस तरह व्यक्ति अपने निजी रहस्यों, कमज़ोरियों या गुप्त बातों को सुरक्षित रखता है और दूसरों के सामने उजागर नहीं करता, ठीक उसी तरह उसे दूसरों के रहस्यों की भी रक्षा करनी चाहिए।
वर्तमान प्रासंगिकता: आज के डिजिटल युग में, जहाँ दूसरों की निजी जानकारी (Privacy) लीक करना या चुगलखोरी/गॉसिप करना आम बात हो गई है, यह श्लोक व्यावसायिक नैतिकता (Professional Ethics) और व्यक्तिगत विश्वास की नींव रखता है। किसी का भरोसा न तोड़ना ही एक सच्चे और विश्वसनीय चरित्र की पहचान है।
2. आत्म-निरीक्षण और निष्पक्षता:
श्लोक का संदेश: व्यक्ति को केवल दूसरों की कमियों या दुर्गुणों (Flaws) पर ही ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि उसी निष्पक्षता से अपने भीतर के दोषों को भी पहचानना और स्वीकार करना चाहिए।
वर्तमान प्रासंगिकता: हम अक्सर दूसरों को आंकने (Judge करने) में बहुत जल्दबाजी करते हैं, लेकिन अपनी गलतियों को नजर अंदाज़ कर देते हैं। यह श्लोक आत्म-सुधार (Self-Improvement) और सहानुभूति को बल देता है। जब हम अपनी कमियों को पहचानेंगे, तभी हम दूसरों के प्रति अधिक सहनशील और विनम्र बन सकेंगे।

















