महापुरुष कभी मरते नहीं। वे समाज और राष्ट्र की स्मृतियों, प्रेरणाओं, आचरणों और आदर्शों में सदैव ज़िंदा रहते हैं। वे देशवासियों की धमनियों में लहू की तरह प्रवाहित रहते हुए उन्हें गति एवं ऊर्जा प्रदान करते हैं। वीर सावरकर भी एक ऐसे ही महान स्वतंत्रता सेनानी थे। संपूर्ण स्वतंत्रता-आंदोलन में सावरकर जैसी प्रखरता, तार्किकता एवं तेजस्विता अन्यत्र कम ही दिखाई पड़ती है। अंग्रेज उनसे सर्वाधिक भयभीत एवं आशंकित रहते थे।
बाल्यकाल से ही वीर सावरकर में थी देशभक्ति
इसका प्रमाण उन्हें मिली दो-दो आजीवन कारावास की सजा थी। वे उन विरले देशभक्तों में थे, जिनके अन्य दोनों सहोदर भाइयों ने भी स्वतंत्रता-आंदोलन में बढ़-चढ़कर योगदान दिया था। बल्कि तीन में से दो को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। बाल्य-काल से ही राष्ट्र एवं राष्ट्रीयता उनके संस्कारों में रची-बसी थी। बहुत छोटी आयु से ही उन्होंने अपने गृह जनपद के किशोरों एवं तरुणों में देशभक्ति की भावना जागृत करने के उद्देश्य से ‘मित्र-मेला’ का आयोजन प्रारंभ कर दिया था। मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करते-करते उनमें इतनी वैचारिक तीक्ष्णता, सांगठनिक कुशलता उत्पन्न हो गई थी कि उन्होंने 1901 में महारानी विक्टोरिया की शोकसभा का संपूर्ण नासिक में बहिष्कार किया और इसमें उन्हें किशोरों एवं तरुणों को साथ लाने में अभूतपूर्व सफलता मिली। 1902 में जब ब्रिटिश उपनिवेशों में एडवर्ड सप्तम की ताजपोशी का उत्सव मनाया जा रहा था तो तरुण सावरकर ने अपने जनपद में उसका विरोध किया। उनका मानना था कि अपने देश को गुलाम बनाने वालों के उत्सव में हम क्यों सम्मिलित हों! 1904 में उन्होंने ‘अभिनव भारत’ नामक संगठन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य ही ब्रिटिश राज्य का विरोध करना था। 1905 में युवाओं का नेतृत्व करते हुए उन्होंने लॉर्ड कर्जन द्वारा पंथ के आधार पर बंग-भंग किए जाने का संपूर्ण महाराष्ट्र में विरोध किया। वे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने सर्वप्रथम विदेशी वस्त्रों की होली जलाई तथा पूर्ण स्वराज का माँग की। वे स्वदेशी के अगुवा थे। 1906 आते-आते जहाँ एक ओर राष्ट्रीय फलक पर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक एक तेजस्वी व्यक्तित्व के रूप में छाए हुए थे, ठीक उसी कालखंड में महाराष्ट्र के सभी युवाओं के बीच वीर सावरकर का नाम प्रखर देशभक्त के रूप में तेजी से उभरने लगा था।
लंदन में भी वीर सावरकर ने जारी रखा आजादी का आंदोलन
1906 में ही लोकमान्य तिलक के प्रयासों से उन्हें श्याम जी कृष्ण वर्मा छात्रवृत्ति मिली और वे वक़ालत की पढ़ाई के लिए भारत से लंदन गए। लंदन में भी उन्होंने ‘फ़्री इंडिया सोसाइटी’ का गठन कर संपूर्ण भारतवर्ष से अध्ययन के लिए वहाँ पहुँचने वाले प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के बीच भारत की स्वतंत्रता हेतु प्रयास ज़ारी रखा। वहीं से उन्होंने अपने लेखों, पत्रों कविताओं आदि के माध्यम से भारत वर्ष में अभिनव भारत की गतिविधियों को भी सक्रिय रखा। उन्होंने वहाँ लाला हरदयाल, श्याम जी कृष्ण वर्मा, मैडम भीखाजी कामा, मदनलाल धींगड़ा, वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय, भाई परमानंद, सरदार सिंह राणा, वीवीएस अय्यर, निरंजन पाल, एमपीटी आचार्य आदि क्रांतिकारियों के साथ ‘भारत-भवन’ में देश की स्वतंत्रता संबंधी गतिविधियों का लगभग नेतृत्व-सा किया।
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वीर सावरकर की किताब ने 1857 को दिलाई प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की पहचान
1906-07 में उन्होंने इटली के महान क्रांतिकारी ज्युसेपे मेत्सिनी की पुस्तक का अनुवाद किया। 1907-08 में लंदन के एक पुस्तकालय की सदस्यता ग्रहण कर, ब्रिटिश दस्तावेज़ों को खंगाल उन्होंने ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ नामक महत्त्वपूर्ण एवं शोधपरक पुस्तक लिखी, जो दुनिया की पहली ऐसी पुस्तक थी, जिसे ब्रिटिश सरकार ने प्रकाशित होने से पूर्व ही प्रतिबंधित कर दिया। ब्रिटिश पुलिस की कड़ी निगरानी एवं गहन छानबीन के कारण ब्रिटेन तथा भारत में न छप पाने पर उसे फ़्रांस, फिर जर्मनी से प्रकाशित कराने का प्रयास किया गया और वहाँ भी विफलता हाथ लगने पर अंततः वह पुस्तक हॉलैंड से छपकर आई और छपते ही ‘1857 के विद्रोह’ को प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन की संज्ञा मिली। उससे पूर्व अंग्रेज उसे ग़दर या सिपाही विद्रोह कहकर ख़ारिज करते थे।
क्रांतिकारी गतिविधियों के चलते वीर सावरकर को मिली कालापानी की सजा
1909 में महान देशभक्त एवं क्रांतिकारी मदनलाल धींगड़ा ने जब भारतीय विद्यार्थियों को सर्विलांस पर रखने वाले ब्रिटिश सैन्य अधिकारी सर विलियम हट कर्जन वायली की हत्या की तो सावरकर ने उनका मुक़दमा लड़ना स्वीकार किया। लंदन टाइम्स में लेख लिखकर उन्होंने वायली की हत्या को न्यायोचित तथा धींगरा की फाँसी को अन्यायपूर्ण ठहराया और जब ब्रिटिशर्स ने एक बंद कमरे में बहस कर मदनलाल धींगड़ा को फाँसी की सजा सुना दी तो वीर सावरकर ने वहाँ रह रहे सभी भारतीय विद्यार्थियों को एकजुट कर ब्रिटिश सरकार के इस अन्यायपूर्ण फैसले का विरोध किया। अमर बलिदानी मदनलाल धींगड़ा के उस अंतिम-ओजस्वी कथन को भी उन्होंने इंग्लैंड के विभिन्न कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में प्रचारित-प्रसारित किया, जो युवाओं में त्याग, बलिदान एवं स्वतंत्रता की प्रेरणा जगाते थे। अंग्रेज उसे किसी कीमत पर सार्वजनिक नहीं होने देना चाहते थे। इतना सब होने के बाद स्वाभाविक था कि ब्रिटिश शासन की आँखों में वे खटकने लगे, उन्हें गिरफ़्तार कर भारत लाया जाने लगा, पर सावरकर का पौरुष एवं साहस इतना अदम्य था कि वे फ़्रांस स्थित एक बंदरगाह मार्सिले के समीप जहाज़ से छलाँग लगाकर समुद्र में कूद पड़े और तैरकर तट पर पहुँच गए। अंग्रेजी भाषा में कहे गए आग्रह को न समझ पाने के कारण फ्रांसीसी तटरक्षकों ने उन्हें पुनः गिरफ़्तार कर अंग्रेजों को सौंप दिया। वे पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय हेग में फ़्रांस और ब्रिटेन के बीच मुक़दमा चला, जिसमें फ़ैसला ब्रिटेन के पक्ष में सुनाया गया। वहाँ से उन्हें भारत लाया गया, उन पर मुकदमा चलाया गया और नासिक के जिला-कलेक्टर जैक्सन की हत्या का भी उन पर आरोप मढ़ा गया। उन्हें और उनके बड़े भाई को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। 1911 से 1921 तक वे कालापानी की असह्य यातना भुगतते हुए अंडमान के सेलुलर जेल में बंद रहे। जहाँ अन्य राजनीतिक कैदियों को जेल में न्यूनाधिक सुविधाएँ उपलब्ध होती थीं, वहीं कालेपानी की सज़ा प्राप्त कैदी हवा-पानी-रोशनी तथा रूखा-सूखा भोजन के लिए भी तरसाए और तड़पाए जाते थे। उन्हें दिन-दिन भर या तो कोल्हू चलाना पड़ता था या नारियल जूट की रस्सी बनानी पड़ती थी।
कालापानी की यातनाओं के बीच भी नहीं टूटा वीर सावरकर का हौसला
रस्सी बुनते-बुनते उनके हाथ व कोल्हू खींचते-खींचते पीठ लहूलुहान हो उठते थे और यदि कोई क्षण भर विश्राम के लिए रुकता तो उस पर कोड़ों की बौछार की जाती थी। ऐसी अमानुषिक यातनाओं से उन स्वतंत्रता-सेनानियों को गुजारा जाता था कि कई बार उनके मन में आत्महत्या तक के विचार कौंधते थे। सावरकर ने स्वयं स्वीकार किया कि उनके मन में भी आत्महत्या के विचार आए, पर उन्होंने तय किया कि कारावास की काल-कोठरियों में कैद रहते हुए घुट-घुटकर मर जाने से बेहतर है देश के लिए जीना, बाहर निकल देश की स्वतंत्रता के लिए यथासंभव प्रयास करना। एक ओर बाल गंगाधर तिलक एवं कांग्रेस के तत्कालीन वरिष्ठ राजनेताओं ने वीर सावरकर की मुक्ति के लिए प्रयास किए तो दूसरी ओर देश भर से सत्तर हजार लोगों ने उनकी मुक्ति के लिए ब्रिटिश हुक्मरानों को अर्जियाँ भेजीं। उन जैसे प्रखर देशभक्त पर सेलुलर जेल में होने वाले अन्याय-अत्याचार के विरुद्ध देश भर में आक्रोश एवं अंसतोष पनपने लगे। अंततः ब्रिटिश सरकार उन्हें रिहा करने को तैयार हुई, मगर कुछ शर्त्तों एवं शपथ-पत्र के साथ। उसे ही कुछ राजनीतिक दलों एवं विचारधाराओं ने निहित स्वार्थों की पूर्त्ति के लिए उनके माफ़ीनामे के रूप में प्रचारित कर उनकी छवि को चोट पहुँचाने की चेष्टा की। सत्य कुछ भिन्न एवं इतर होने के बावजूद उन पर यह कथित आरोप लगाया जाता रहा है कि उन्होंने तत्कालीन ब्रितानी हुकूमत से माफ़ी माँगी थी , उनकी शान में क़सीदे पढ़े थे और उनके प्रति राजभक्ति की कसमें खाईं थीं। यद्यपि राजनीतिक क्षेत्र में आरोप लगाओ और भाग जाओ की प्रवृत्ति प्रचलित रही है। उसके लिए आवश्यक प्रमाण प्रस्तुत करने का आदर्श कोई सामने नहीं रखता। क्या उन आरोपों को तर्कों एवं तथ्यों की कसौटी पर नहीं कसा जाना चाहिए?
















