टी-20 से मल्लयुद्ध तक… कैसी रही भारत की खेल संस्कृति? प्रसाद महानकर जी ने बताया पूरा इतिहास
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टी-20 से मल्लयुद्ध तक… कैसी रही भारत की खेल संस्कृति? प्रसाद महानकर जी ने बताया पूरा इतिहास

भारत को खेल संस्कृति विरासत में मिली है। उसका स्वरूप समय-समय पर बदलता रहा है, लेकिन खेल हमारे जीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहे हैं।

Written byMahak SinghMahak Singh
Sep 13, 2026, 04:38 pm IST
inगुजरात, पाञ्चजन्य इवेंट
पाञ्चजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर जी और श्री प्रसाद महानकर- राष्ट्रीय संगठन मंत्री

पाञ्चजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर जी और श्री प्रसाद महानकर- राष्ट्रीय संगठन मंत्री

भारत की खेल संस्कृति केवल जीत और पदक की कहानी नहीं, बल्कि शरीर, मन, बुद्धि और चरित्र निर्माण की एक समृद्ध परंपरा है। इसी भारतीय खेल-दृष्टि, उसकी ऐतिहासिक विरासत और बदलते स्वरूप पर अहमदाबाद में आयोजित ‘साबरमती संवाद 2026’ के दौरान पाञ्चजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर जी ने क्रीड़ा भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्री प्रसाद महानकर जी से विशेष बातचीत की। इस संवाद में भारतीय खेल परंपरा से लेकर ‘क्रीड़ा’ और ‘साधना’ के संबंध तथा भारत के संभावित खेल मॉडल तक कई महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई।

प्रश्न : अगर हमें भारत की खेल संस्कृति को समझना हो, तो इसकी ऐतिहासिक परंपरा कैसी रही है?

उत्तर: भारत को खेल संस्कृति विरासत में मिली है। उसका स्वरूप समय-समय पर बदलता रहा है, लेकिन खेल हमारे जीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। आज अगर किसी से पूछा जाए कि आपको टी-20 क्रिकेट के बारे में पता है, तो शायद बहुत से लोग कहेंगे कि हां, बिल्कुल पता है। लेकिन अगर उनसे पूछा जाए कि क्रिकेट का टेस्ट मैच कितने दिनों का होता है, तो शायद गिने-चुने लोग ही हाथ उठाएंगे। इससे यह स्पष्ट होता है कि समय के साथ खेलों का स्वरूप बदलता रहा है और उसी के साथ खेलों की हमारी समझ भी बदलती रही है।

यदि हम इतिहास की ओर देखें, तो आज जिन खेलों को हम खेल के रूप में जानते हैं, उनमें से कई का संबंध प्राचीन समय में युद्ध-कला से रहा है। रामायण और महाभारत काल से ही विभिन्न प्रकार की युद्ध कलाएं और शारीरिक कौशल हमारी परंपरा का हिस्सा रहे हैं। भगवान श्रीकृष्ण जब गोकुल से मथुरा आए, तो उन्हें मल्लयुद्ध के लिए आमंत्रित किया गया। चाणूर और मुष्टिक के साथ उनका मल्लयुद्ध हुआ और उसी मंच पर कंस का वध भी हुआ। इससे पता चलता है कि उस समय शारीरिक कौशल और युद्ध-कला का सामाजिक जीवन में कितना महत्व था। हमारी विरासत में रथों की स्पर्धाएं थीं, घोड़ों की स्पर्धाएं थीं, हाथियों और ऊंटों से जुड़ी प्रतियोगिताएं थीं। भाले से लक्ष्य भेदना, धनुर्विद्या और विभिन्न प्रकार की शारीरिक क्षमताओं का अभ्यास होता था। अर्थात हमारे यहां खेल केवल मनोरंजन के लिए नहीं थे। खेल स्वभाव निर्माण, चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व निर्माण का माध्यम रहे हैं। हमारी परंपरा में हजारों प्रकार की खेल एवं शारीरिक गतिविधियां रही हैं, जिनका उद्देश्य केवल शरीर को स्वस्थ रखना नहीं, बल्कि व्यक्ति के संपूर्ण विकास को सुनिश्चित करना था।

प्रश्न : खेल स्वभाव, चरित्र और व्यक्तित्व निर्माण का माध्यम रहे हैं। क्या भारतीय परंपरा में खेल को इससे भी व्यापक रूप में देखा गया है?

उत्तर: निश्चित रूप से। मैं तो कहूंगा कि खेल शरीर को साधने, मन और बुद्धि के विकास तथा आत्मबल को मजबूत करने का साधन रहा है। यह भारतीय परंपरा का मूल विचार है। आज के समय में खेल को मुख्य रूप से प्रदर्शन और प्रतिस्पर्धा के नजरिए से देखा जाता है। खिलाड़ी का लक्ष्य होता है कि वह बेहतर प्रदर्शन करे, प्रतियोगिता जीते और पोडियम तक पहुंचे। यह आवश्यक भी है। प्रतिस्पर्धा होगी तो खिलाड़ी उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए प्रयास करेगा। लेकिन भारतीय दृष्टि इससे कहीं अधिक व्यापक है। हमारे लिए खेल में शरीर, मन और बुद्धि- तीनों का समन्वित विकास होना चाहिए।

प्रश्न : खेल की प्रक्रिया में ही उसका वास्तविक परिणाम छिपा हुआ है?

उत्तर: खेल का परिणाम केवल मेडल या रिकॉर्ड नहीं है। खेल की प्रक्रिया में ही शरीर का विकास होता है, मन मजबूत होता है, बुद्धि प्रखर होती है और आत्मबल विकसित होता है। भारत में कुश्ती हो, मल्लखंब हो या योग- इन सभी में यह समग्र दृष्टि दिखाई देती है। योग को ही देखिए। कभी यह केवल शरीर को स्वस्थ रखने की प्रक्रिया नहीं था। यह शरीर-साधना, मन-साधना और आत्मिक उन्नति की साधना था। समय के साथ उसका स्वरूप बदला और आज योगासन को खेल के रूप में भी विकसित किया जा रहा है। इसी प्रकार मल्लखंब हमारे यहां शरीर-साधना और व्यायाम की पारंपरिक पद्धति रही है। आज वह आधुनिक खेल का रूप लेकर देश और दुनिया में पहुंच रहा है।

प्रश्न : क्या भारत की अपनी कोई ऐसी खेल अवधारणा या ‘स्पोर्ट्स मॉडल’ हो सकता है, जिसे दुनिया के सामने रखा जा सके?

उत्तर: जिस प्रकार विकास के क्षेत्र में गुजरात मॉडल की चर्चा होती है, उसी प्रकार खेल के क्षेत्र में भी भारत का अपना मॉडल हो सकता है। गुजरात की खेल परंपरा इसका एक अच्छा उदाहरण है। दुनिया के प्राचीन खेल ग्रंथों में ‘मल्ल पुराण’ का महत्वपूर्ण स्थान है। गुजरात में पाटन के आसपास के क्षेत्र में मल्लयुद्ध और कुश्ती की बहुत समृद्ध परंपरा रही है। जेठी कुश्ती जैसी परंपराएं भी इसी विरासत का हिस्सा रही हैं। इससे पता चलता है कि भारत में खेल केवल शारीरिक गतिविधि नहीं था, बल्कि उसे व्यवस्थित रूप से समझा और विकसित किया जाता था। आज भी हम अपनी पारंपरिक विधाओं को आधुनिक खेल विज्ञान के साथ जोड़ सकते हैं। योग इसका उदाहरण है। एक समय योग शरीर और मन की साधना था। आज वह आधुनिक स्वरूप में पूरी दुनिया तक पहुंच चुका है और योगासन को खेल के रूप में भी विकसित करने के प्रयास हो रहे हैं। मल्लखंब का उदाहरण भी हमारे सामने है। इसी प्रकार कबड्डी को ओलंपिक में शामिल कराने के प्रयास हो रहे हैं। कुश्ती पहले से ही ओलंपिक का हिस्सा है। यदि हम अपनी पारंपरिक खेल विधाओं को आधुनिक प्रशिक्षण, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और अंतरराष्ट्रीय मानकों के साथ जोड़ें, तो आने वाले वर्षों में भारत के कई पारंपरिक खेल विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना सकते हैं।

प्रश्न : अगर हम आज के खेल परिदृश्य का विश्लेषण करें, तो खिलाड़ियों के सामने मुख्य रूप से दो लक्ष्य दिखाई देते हैं- जीतना और रिकॉर्ड बनाना। क्या आप इससे सहमत हैं?

उत्तर: आज के खेल में जीतना और रिकॉर्ड बनाना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हो गया है। लेकिन भारतीय दृष्टि से खेल को केवल जीत और रिकॉर्ड तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। भारतीय परंपरा में खेल के लिए एक महत्वपूर्ण शब्द है- ‘क्रीड़ा’। और क्रीड़ा के साथ एक और शब्द जुड़ता है- ‘साधना’। यही दोनों के बीच का सबसे महत्वपूर्ण अंतर है।

प्रश्न : ‘क्रीड़ा’ और प्रतिस्पर्धा में क्या अंतर है? खेल के साथ ‘साधना’ कैसे जुड़ती है?

उत्तर: साधना से क्रीड़ा में विजय प्राप्त होती है और क्रीड़ा से व्यक्तित्व का निर्माण होता है। यदि किसी खिलाड़ी को अपने खेल में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करना है, नंबर एक बनना है या गोल्ड मेडल जीतना है, तो उसे लगातार प्रयास करना होगा। उसे अपने शरीर पर काम करना होगा, अनुशासन में रहना होगा, अभ्यास करना होगा और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहना होगा। यही उसकी साधना है। लेकिन रिकॉर्ड बनाना ही अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकता। आज एक खिलाड़ी रिकॉर्ड बनाता है और कल कोई दूसरा खिलाड़ी उस रिकॉर्ड को तोड़ देता है। इसलिए रिकॉर्ड स्थायी नहीं होते। रिकॉर्ड का महत्व है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि खिलाड़ी अपने खेल के माध्यम से एक आदर्श स्थापित करे। वह यह दिखाए कि इस खेल में उसने स्वयं को किस ऊंचाई तक पहुंचाया है।

Topics: Indian sports cultureIndian sports traditionIndian sports modelIndian sports philosophyYoga and sports#panchjanyaSabarmati SamvadSabarmati Samvad 2026साबरमती संवाद 2026
Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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