गुजरात की विकास यात्रा केवल आर्थिक प्रगति के आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आपदा को अवसर में बदलने, बंजर भूमि को आधुनिक औद्योगिक केंद्र में विकसित करने और राष्ट्रीय एकता को जनभागीदारी से जोड़ने की कहानी भी है। अहमदाबाद में आयोजित ‘साबरमती संवाद 2026’ में गुजरात के विकास के ऐसे ही विभिन्न आयामों पर चर्चा हुई। इसी क्रम में गुजरात सरकार के iNDEXT-C के कार्यकारी निदेशक डॉ. संजय जोशी, IAS ने ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के निर्माण से लेकर उससे जुड़े विकास मॉडल और जनभागीदारी की यात्रा को साझा किया। उन्होंने बताया कि कैसे सरदार वल्लभभाई पटेल की विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा आज केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना, स्थानीय विकास और जनसहभागिता का जीवंत प्रतीक बन चुकी है।
स्मारक से आगे, विकास और एकता का मॉडल
‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ केवल सरदार वल्लभभाई पटेल की स्मृति में बनाया गया एक स्मारक नहीं, बल्कि देश की एकता, जनभागीदारी और विकास के नए मॉडल का जीवंत उदाहरण है। यह बात स्टैच्यू ऑफ यूनिटी परियोजना से लंबे समय तक जुड़े रहे अधिकारी ने एक संवाद के दौरान कही। उन्होंने बताया कि वर्ष 2013 में तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्टैच्यू ऑफ यूनिटी की घोषणा किए जाने के समय ही उन्हें यहां मुख्य प्रबंधक के रूप में कार्य करने का अवसर मिला था। उनके अनुसार, इस परियोजना के लिए स्थान का चयन भी अपने आप में महत्वपूर्ण था। इसे रिवरफ्रंट जैसे स्थान पर भी बनाया जा सकता था, जहां बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते, लेकिन परियोजना का उद्देश्य केवल एक स्मारक का निर्माण करना नहीं था। इसके पीछे विकास की एक व्यापक अवधारणा थी।
उन्होंने कहा कि गुजरात में विकास के तीन महत्वपूर्ण मॉडल सामने आए हैं। पहला, वर्ष 2001 के बाद कच्छ में अपनाया गया आपदा से विकास का मॉडल, जिसने भूकंप से तबाह क्षेत्र को पुनः खड़ा करने का उदाहरण प्रस्तुत किया। दूसरा, धोलेरा का विकास मॉडल, जो कभी लगभग बंजर क्षेत्र था और आज औद्योगिक एवं स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित हो रहा है। तीसरा मॉडल स्टैच्यू ऑफ यूनिटी है, जो विकास के साथ राष्ट्रीय एकता और जनभागीदारी का संदेश देता है। उन्होंने बताया कि स्टैच्यू ऑफ यूनिटी को देश के किसानों की भागीदारी से जोड़ने के लिए ‘लोहा अभियान’ चलाया गया। करीब तीन लाख गांवों को निमंत्रण भेजा गया और लगभग 1,69,074 गांवों से कृषि उपकरणों के रूप में लोहा प्राप्त हुआ। किसानों ने खेतों में इस्तेमाल किए गए हल, फावड़े और अन्य पुराने कृषि उपकरण उपलब्ध कराए। इनसे प्राप्त करीब 111 टन स्वच्छ लोहे का उपयोग प्रतिमा के विभिन्न हिस्सों में किया गया। उन्होंने इसे किसानों के श्रम और देश के प्रति उनके समर्पण का ‘जीवंत द्रव्य’ बताया।
‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की जीवंत मिसाल
इसी तरह वॉल ऑफ यूनिटी के निर्माण में देश के अलग-अलग गांवों से लाई गई मिट्टी का उपयोग किया गया। यह दीवार भारत की विविधता में एकता की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। उन्होंने कहा कि स्टैच्यू ऑफ यूनिटी क्षेत्र में करीब 32 परियोजनाएं विकसित की गई हैं, जो बच्चों, युवाओं, शिक्षाविदों, इतिहासकारों, खेलप्रेमियों और पर्यटकों के लिए अलग-अलग अनुभव उपलब्ध कराती हैं। परियोजनाओं के माध्यम से स्थानीय जनजातीय समुदाय को भी रोजगार के अवसर मिले हैं। सरदार वल्लभभाई पटेल पर पीएचडी कर चुके वक्ता ने कहा कि पटेल के जीवन से देशभक्ति, त्याग, प्रशासन, सिंचाई, खाद्य वितरण, शहरी विकास और राष्ट्रनिर्माण जैसे अनेक विषयों की प्रेरणा ली जा सकती है। अहमदाबाद के समृद्ध बैरिस्टर के रूप में आरामदायक जीवन छोड़कर उन्होंने राष्ट्रसेवा को चुना। उन्होंने कहा कि स्टैच्यू ऑफ यूनिटी को केवल इतिहास की स्मृति के रूप में नहीं, बल्कि ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की जीवंत मिसाल के रूप में देखा जाना चाहिए। यह स्मारक देश की एकता, जनभागीदारी और विकास की उस सोच को सामने रखता है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन सकती है।













