यह श्लोक स्पष्ट करता है कि जब समाज के सज्जन और सकारात्मक विचार वाले लोग संगठित होते हैं, तो वह संगठन एक अभेद्य सुरक्षा कवच बन जाता है।
श्लोक :
सज्जनानां परित्राणे वज्रपञ्जरसन्निभम्।
लोकसंघटनं लोके ध्रुवं सामर्थ्यमैश्वरम्॥
भावार्थ :
इस संसार में सज्जनों की पूर्ण रक्षा के लिए ‘जन-संगठन’ (लोगों की एकजुटता) वज्र के अभेद्य किले के समान है। संगठित समाज में ही वास्तव में ईश्वर की शक्ति निहित होती है, जो श्रेष्ठ लोगों और धर्म की रक्षा करने में पूरी तरह समर्थ होती है।
आज के लिए प्रासंगिकता : आधुनिक संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता निम्नलिखित बिंदुओं से समझी जा सकती है:
सकारात्मक शक्तियों का एकीकरण: आज के समाज में असामाजिक, विखंडनकारी और असामाजिक तत्वों का सामना करने के लिए केवल व्यक्तिगत अच्छाई काफी नहीं है। अच्छे और सज्जन लोगों का संगठित होना ही सामाजिक सुरक्षा की पहली गारंटी है।
नागरिक समाज और सामुदायिक शक्ति : किसी भी आपदा, संकट या सामाजिक बुराई (जैसे अपराध, भ्रष्टाचार या नशा) के खिलाफ सबसे प्रभावी ढाल कानून के साथ-साथ एक जागरूक और संगठित समाज ही बनता है।
सामूहिक चेतना ही ईश्वरीय शक्ति : श्लोक के अनुसार, जब लोग सामूहिक हित के लिए एक सूत्र में बंधते हैं, तो वह केवल मानवीय प्रयास नहीं रहता, बल्कि उसमें एक ईश्वरीय सामर्थ्य और ऊर्जा आ जाती है, जो बड़े से बड़े संकट को टाल सकती है।

















