कर्नाटक में संघ के पथ संचलन में भाग लेने वाले शिक्षक के निलंबन पर रोक
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कर्नाटक में संघ के पथ संचलन में भाग लेने वाले शिक्षक के निलंबन पर रोक

कर्नाटक राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण ने यादगीर के शिक्षक गुरुराज के आरएसएस कार्यक्रम में शामिल होने पर निलंबन पर रोक लगाई। जानें नियम 5, संघ की स्थिति और 2024 के नीतिगत बदलावों के बारे में।

Written byडी.के.दुबेडी.के.दुबे — edited by अरुण कुमार सिंह
Sep 10, 2026, 01:45 pm IST
inभारत
Karnataka High court Raises question on Waqf board power

कर्नाटक हाई कोर्ट

कर्नाटक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े एक मामले में कर्नाटक राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण यानी केएसएटी के 2026 के अंतरिम आदेश ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि क्या किसी सरकारी कर्मचारी का संघ के कार्यक्रम में शामिल होना अपने आप में राजनीतिक गतिविधि माना जा सकता है?  मामला यादगीर जिले के हुनसागी स्थित सरकारी बालिका हाई स्कूल के सहायक शिक्षक गुरुराज से जुड़ा है। विभाग ने उन्हें 20 अगस्त, 2026 को निलंबित कर दिया था। आरोप था कि उन्होंने 12 अक्तूबर, 2025 को संघ के एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया और यह सरकारी कर्मचारी के आचरण नियमों का उल्लंघन है। गुरुराज ने इस कार्रवाई को केएसएटी में चुनौती दी। मामले में मुख्य सवाल कर्नाटक सिविल सेवा आचरण नियम, 2021 के नियम 5 से जुड़ा था। यह नियम सरकारी कर्मचारियों को राजनीतिक दलों अथवा राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने से रोकता है।

निलंबन पर रोक

केएसएटी ने पहली नजर में माना कि जिस कार्यक्रम में शिक्षक शामिल हुए थे, उसे किसी राजनीतिक दल का कार्यक्रम नहीं माना जा सकता। न्यायाधिकरण ने यह भी ध्यान दिया कि राज्य सरकार की ओर से ऐसा कोई खास आदेश या अधिसूचना सामने नहीं रखी गई थी, जो सरकारी कर्मचारियों को संघ के इस प्रकार के कार्यक्रम में भाग लेने से साफ तौर पर रोकती हो। सुनवाई के दौरान एक और महत्वपूर्ण तकनीकी बात सामने आई। निलंबन आदेश में नियम 7 का भी उल्लेख किया गया था, जबकि न्यायाधिकरण के अनुसार संबंधित नियम 7 को 25 अप्रैल, 1968 से ही हटा दिया गया था। इन परिस्थितियों को देखते हुए केएसएटी ने शिक्षक के पक्ष में पहली नजर में मामला पाया और उनके निलंबन पर रोक लगा दी।

हालांकि, इसे संघ पर कोई अंतिम न्यायिक घोषणा नहीं माना जा सकता, क्योंकि मामला अभी लंबित है और अगली सुनवाई 9 अक्तूबर, 2026 को निर्धारित है। फिर भी इस आदेश का महत्व इसलिए बढ़ जाता है, क्योंकि इसने एक पुराने सवाल को फिर जीवित कर दिया है कि क्या संघ की गतिविधि को सरकारी सेवा नियमों के तहत राजनीतिक गतिविधि माना जा सकता है? इसी सवाल की पृष्ठभूमि में 1966 से सरकारी कर्मचारियों पर लागू निर्देशों, 1992-93 में संघ पर लगे प्रतिबंध और न्यायमूर्ति पी. के. बहरी न्यायाधिकरण के फैसले तथा 2024 में केंद्र सरकार द्वारा पुराने संघ संबंधी निर्देशों में किए गए बदलाव को भी समझना जरूरी हो जाता है।

संघ राजनीतिक दल नहीं

केएसएटी के फैसले की असली अहमियत यहीं से शुरू होती है। सरकारी शिक्षक गुरुराज जोशी को संघ के पथ संचलन में शामिल होने के कारण निलंबित किया गया, लेकिन न्यायाधिकरण ने कहा कि संघ को राजनीतिक दल मानने का आधार सामने नहीं है और केवल उसके कार्यक्रम में शामिल होना नियम 5 का उल्लंघन नहीं बनता। न्यायाधिकरण ने यह भी कहा कि सरकारी कर्मचारियों को संघ के कार्यक्रमों में शामिल होने से रोकने वाला कोई खास सरकारी आदेश मौजूद नहीं था। यहीं से कर्नाटक सरकार की कार्रवाई पर सवाल उठता है। यदि संघ के कार्यक्रम में शामिल होना अपने आप में आचरण नियमों का उल्लंघन नहीं है, तो फिर सरकार ने उस शिक्षक के विरुद्ध इतनी कठोर कार्रवाई किस प्रशासनिक आधार पर की? और यही सवाल प्रियंक खड़गे की उस राजनीतिक पहल को भी महत्वपूर्ण बना देता है, जिसमें उन्होंने पहले ही सरकारी कर्मचारियों को संघ के कार्यक्रमों से दूर रखने की मांग की थी।

सरकार की सोच

अक्तूबर, 2025 में प्रियंक खड़गे ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को पत्र लिखकर मांग की कि सरकारी कर्मचारी संघ और ऐसी संस्थाओं के कार्यक्रमों में हिस्सा न लें और नियम तोड़ने वालों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए। उन्होंने कर्नाटक सिविल सेवा आचरण नियमों के नियम 5 का हवाला दिया और कहा कि सरकारी कर्मचारियों को राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहना चाहिए। इस पहल को केवल एक मंत्री का निजी बयान कहकर छोड़ देना भी पूरी तस्वीर नहीं बताता, क्योंकि इसके बाद संघ की सार्वजनिक गतिविधियों और सरकारी कर्मचारियों की भागीदारी को लेकर कर्नाटक में प्रशासनिक कार्रवाई का सिलसिला दिखाई देता है। इसलिए केएसएटी का निर्णय इसी पृष्ठभूमि में पढ़े जाने पर ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।

संघ के विरुद्ध दूसरा मोर्चा

प्रियंक खड़गे का विवाद केवल सरकारी कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक स्थानों पर संघ की गतिविधियों को रोकने या नियंत्रित करने की मांग भी उठाई। अक्तूबर, 2025 में उन्होंने कहा कि सार्वजनिक स्थानों और सड़कों पर संगठन अपनी गतिविधियां सरकार की अनुमति के बिना नहीं कर सकते। इसके बाद राज्य सरकार ने ऐसी गतिविधियों को अनुमति के दायरे में लाने की बात कही। यहां सरकार के दृष्टिकोण का एक चलन दिखाई देता है—संघ को केवल एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में देखने के बजाय उसकी सार्वजनिक गतिविधियों को प्रशासनिक नियंत्रण के दायरे में लाने की कोशिश।

यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें सरकारी शिक्षक का संघ कार्यक्रम में जाना सरकार के लिए महज निजी गतिविधि नहीं, बल्कि सेवा-आचरण का सवाल बन गया। 2026 में संघ के पंजीकरण को लेकर भी तीखे सवाल उठाए गए और संगठन को कानूनी दायरे में आने की आवश्यकता बताई गई। इसलिए आलोचक इसे केवल आचरण नियमों की तकनीकी व्याख्या नहीं, बल्कि कर्नाटक कांग्रेस सरकार के संघ के प्रति व्यापक राजनीतिक दृष्टिकोण का हिस्सा मान सकते हैं। हालांकि अंतिम निष्कर्ष पाठक पर छोड़ना बेहतर होगा, क्योंकि सरकार की आधिकारिक दलील प्रशासनिक नियमों और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी है।

कानूनी सवाल

केएसएटी के सामने मूल सवाल यह नहीं था कि संघ क्या है, बल्कि यह था कि किसी सरकारी कर्मचारी का संघ के कार्यक्रम में शामिल होना क्या कर्नाटक सिविल सेवा आचरण नियम, 2021 के नियम 5 के अंतर्गत राजनीतिक गतिविधि माना जा सकता है!

सरकारी कर्मचारी पर राजनीतिक निष्पक्षता बनाए रखने की जिम्मेदारी होती है, लेकिन किसी संगठन के कार्यक्रम में केवल मौजूद रहना और किसी राजनीतिक दल की सक्रिय राजनीतिक गतिविधि में भागीदारी एक ही बात है या नहीं—यही इस मामले का केंद्रीय कानूनी सवाल बन गया। न्यायाधिकरण ने इसी अंतर को ध्यान में रखते हुए निलंबन की कार्रवाई पर सवाल उठाया।

सरकारी कर्मचारी और संघ

सरकारी कर्मचारियों और संघ के संबंध को लेकर विवाद नया नहीं है। 1966 में केंद्र सरकार ने एक कार्यालय ज्ञापन जारी कर सरकारी कर्मचारियों को संघ और जमात-ए-इस्लामी की गतिविधियों से दूर रहने के निर्देश दिए थे। बाद के वर्षों में भी इस नीति को लेकर सरकारी निर्देश जारी रहे। इसलिए आज के केएसएटी विवाद को केवल 2026 की एक प्रशासनिक कार्रवाई के रूप में देखना अधूरा होगा। इसके पीछे केंद्र सरकार की लगभग छह दशक पुरानी प्रशासनिक नीति और उसके बदलते स्वरूप की पूरी पृष्ठभूमि मौजूद है।

1992 में संघ पर प्रतिबंध

6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में बाबरी ढांचा विध्वंस के बाद केंद्र सरकार ने संघ सहित कुछ संगठनों पर प्रतिबंध लगाया। 10 दिसंबर, 1992 को लगाए गए इस प्रतिबंध के पीछे सरकार ने कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर आरोपों का हवाला दिया था।

लेकिन किसी संगठन पर प्रतिबंध लगाना सरकार का अंतिम शब्द नहीं होता। कानून व्यवस्था में ऐसे प्रतिबंध की न्यायिक समीक्षा का भी प्रावधान है। यही हमें 1993 के न्यायमूर्ति पी. के. बहरी न्यायाधिकरण तक ले जाता है। संघ पर लगाए गए प्रतिबंध की वैधानिक जांच के लिए गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम के तहत न्यायाधिकरण की कार्यवाही हुई, जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति पी. के. बहरी ने की। न्यायाधिकरण ने सरकार द्वारा प्रस्तुत सामग्री और आरोपों की जांच की और अंततः संघ पर लगाए गए प्रतिबंध को जारी रखने के लिए पर्याप्त आधार नहीं पाया। इस निर्णय का महत्व इसलिए है, क्योंकि यह उस दौर की न्यायिक जांच का परिणाम था, जब सरकार ने संघ को लेकर बेहद गंभीर आरोप लगाए थे। इसलिए 1993 का बहरी न्यायाधिकरण आज के विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में एक महत्वपूर्ण कड़ी है।

बहरी न्यायाधिकरण से केएसएटी तक

1993 और 2026 के मामलों को एक ही कानूनी सवाल मानना सही नहीं होगा। बहरी न्यायाधिकरण के सामने सवाल था कि संघ पर लगाया गया प्रतिबंध कानूनन उचित है या नहीं, जबकि केएसएटी के सामने प्रश्न था कि संघ के कार्यक्रम में सरकारी कर्मचारी की भागीदारी आचरण नियमों के तहत राजनीतिक गतिविधि बनती है या नहीं। दोनों मामलों का कानूनी विषय अलग है, लेकिन एक साझा सवाल जरूर दिखाई देता है कि राज्य की प्रशासनिक कार्रवाई और संघ की गतिविधियों की कानूनी प्रकृति के बीच संबंध। इसी दृष्टि से 1993 से 2026 तक की यात्रा दिलचस्प हो जाती है।

2023 का पथ संचलन का मामला

संघ से जुड़ा एक अलग लेकिन महत्वपूर्ण कानूनी विवाद मद्रास उच्च न्यायालय के सामने भी आया, जिसमें पथ संचलन और सार्वजनिक कार्यक्रम की अनुमति का सवाल था।

यहां मुद्दा सरकारी कर्मचारी की राजनीतिक निष्पक्षता नहीं, बल्कि सार्वजनिक सभा, कानून-व्यवस्था और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन का था। इस मामले से यह बात सामने आती है कि संघ से संबंधित विवाद अलग-अलग अदालतों में अलग-अलग कानूनी सवालों के रूप में सामने आते रहे हैं। इसलिए प्रत्येक फैसले का वास्तविक कानूनी आधार और उसकी सीमा अलग से समझना आवश्यक है।

58 वर्ष पुरानी केंद्रीय नीति बदली

9 जुलाई, 2024 को केंद्र सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने सरकारी कर्मचारियों से संबंधित पुराने निर्देशों में महत्वपूर्ण बदलाव किया। 1966, 1970 और 1980 के उन कार्यालय ज्ञापनों में संघ के संदर्भ को हटा दिया गया, जिनके आधार पर सरकारी कर्मचारियों को संघ की गतिविधियों से दूर रहने की नीति लागू थी। यह बदलाव राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण था। हालांकि इसे सीधे तौर पर संघ को कोई संवैधानिक या राजनीतिक मान्यता देना कहना सही नहीं होगा। इसका सीधा अर्थ पुरानी प्रशासनिक पाबंदी में बदलाव था।

पुराने आदेशों और नई नीति का सवाल

इसके बाद मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के सामने भी सरकारी कर्मचारियों और संघ से जुड़े पुराने प्रतिबंधों तथा 9 जुलाई, 2024 के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के आदेश का सवाल आया। इस कार्यवाही ने यह सवाल फिर सामने रखा कि दशकों पुराने प्रशासनिक निर्देश बदल जाने के बाद उनकी वर्तमान कानूनी स्थिति क्या रह जाती है! इस मामले को भी केएसएटी के फैसले के साथ जोड़ते समय सावधानी जरूरी है, क्योंकि अलग-अलग अदालतों के सामने अलग तथ्य और अलग कानूनी सवाल थे। लेकिन इन फैसलों को साथ पढ़ने पर सरकारी सेवा नियमों और संघ से जुड़े पुराने प्रतिबंधों के बदलते प्रशासनिक दृष्टिकोण की तस्वीर जरूर उभरती है।

बदलता कानूनी परिदृश्य

इस पूरे घटनाक्रम को एक समयरेखा में देखें तो तस्वीर काफी साफ दिखाई देती है—1992 में संघ पर प्रतिबंध, 1993 में न्यायमूर्ति पी. के. बहरी न्यायाधिकरण द्वारा उस प्रतिबंध की न्यायिक समीक्षा, 2024 में केंद्र सरकार द्वारा पुराने संघ संबंधी कर्मचारी प्रतिबंधों में बदलाव और फिर 2026 में केएसएटी द्वारा सरकारी शिक्षक के संघ कार्यक्रम में शामिल होने के मामले पर विचार। इन घटनाओं को एक ही कानूनी निर्णय की निरंतरता मानना उचित नहीं होगा, लेकिन ये जरूर दिखाते हैं कि संघ और सरकारी कर्मचारियों के संबंध को लेकर राज्य की प्रशासनिक नीति तथा न्यायिक दृष्टिकोण समय के साथ बदलते रहे हैं। इसलिए केएसएटी 2026 का फैसला केवल एक शिक्षक के निलंबन का मामला नहीं रह जाता। इसे छह दशक पुराने प्रशासनिक विवाद की नई कड़ी के रूप में भी देखा जा सकता है।

Topics: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघकेएसएटी आरएसएस आदेशसरकारी कर्मचारी संघ कार्यक्रमकर्नाटक सिविल सेवा नियम 5
डी.के.दुबे
डी.के.दुबे
वरिष्ठ अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट [Read more]
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