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होम भारत कर्नाटक

टीपू से प्यार, हिंदुत्व पर वार

कर्नाटक में कांग्रेस का ‘सेक्युलरिज्म’ सवालों के घेरे में है। एक ओर टीपू सुल्तान के 40 फीट कटआउट और पाकिस्तान व ‘मुजाहिदीन’ संदर्भ वाले गीत को लेकर विवाद, दूसरी ओर संघ के पथ संचलन में शामिल सरकारी शिक्षकों का निलंबन। ये घटनाएं तुष्टीकरण की नीतियों का सवाल उठाती हैं कि क्या कांग्रेस के लिए कानून और न्याय सबके लिए समान है?

Written byनागार्जुननागार्जुन
Sep 10, 2026, 01:20 pm IST
inकर्नाटक

कर्नाटक में बीते सप्ताह दो तस्वीरें सामने आईं। पहली तस्वीर चिकमगलूर की है, जहां ईद-ए-मिलाद के अवसर पर टीपू सुल्तान का 40 फीट ऊंचा कटआउट लगाया गया। इसके बाद सोशल मीडिया पर वीडियो सामने आया, जिसमें कटआउट के साथ पाकिस्तान और ‘मुजाहिदीन’ संदर्भ वाला गीत बज रहा था। विवाद बढ़ा तो पुलिस ने मामला दर्ज किया और एक 23 वर्षीय युवक को गिरफ्तार किया।

दूसरी तस्वीर यादगीर की है, जहां दो शिक्षक-गुरुराज जोशी और अन्ना साहब देशमुख-को निलंबित कर दिया गया। दोनों शिक्षकों पर आरोप है कि उन्होंने 10 और 12 अक्‍तूबर 2025 को यादगीर जिले के हुनासगी और विजयपुरा जिले के तालीकोट में हुए आरएसएस पथसंचलन कार्यक्रमों में भाग लिया था।

क्या दोनों घटनाओं को एक ही कसौटी पर रखा जा सकता है? टीपू के कटआउट से लेकर संघ स्वयंसेवकों पर कार्रवाई तक, क्या कांग्रेस के ‘सेक्युलरिज्म’ का पैमाना सबके लिए एक है? सवाल केवल दो शिक्षकों के निलंबन का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक मानसिकता का है जहां एक ओर संघ गतिविधियों पर निगरानी तेज है, जबकि दूसरी ओर टीपू जैसे विवादित पात्रों के महिमामंडन, मजहबी पहचान वाले आयोजनों और समुदाय-विशेष कल्याण नीतियों को लेकर सरकार की प्राथमिकताएं सवालों में हैं।

बड़ा सवाल

चिकमगलूर में टीपू सुल्तान का 40 फुट ऊंचा कटआउट लगाना अपने आप में कानून का उल्लंघन सिद्ध नहीं करता, लेकिन इसके साथ जो वीडियो सामने आया, वह गंभीर है। अब दो प्रश्न हैं। क्या किसी मजहबी आयोजन में टीपू जैसे विवादित व्यक्तित्व की विशाल प्रतिमा या कटआउट लगाना कानूनसम्मत है? और यदि उसी आयोजन के प्रचार में पाकिस्तान या आतंकी या हिंसक समूहों के महिमामंडन जैसी सामग्री मिलती है, तो प्रशासन की जिम्मेदारी क्या है? दूसरे प्रश्न पर किसी भी सरकार को शून्य-सहनशीलता बरतनी चाहिए, क्योंकि मजहबी स्वतंत्रता और राष्ट्रविरोधी सामग्री का प्रसार अलग-अलग बातें हैं। इस घटना ने एक तीसरा सवाल भी खड़ा किया है। कर्नाटक की राजनीति में टीपू सुल्तान का नाम बार-बार क्यों लौटता है?

इतिहास या वोट-बैंक का प्रतीक?

टीपू सुल्तान अंग्रेजों के खिलाफ मैसूर की लड़ाई का अहम पात्र था, लेकिन उसके शासन, युद्धों और मजहबी नीतियों को लेकर इतिहासकारों में गंभीर मतभेद हैं। एक पक्ष उसे अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाला योद्धा मानता है, दूसरा पक्ष धार्मिक उत्पीड़न और जबरन कन्‍वर्जन की बात करता है। समस्या तब शुरू होती है जब किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को पूरे संदर्भ से काटकर वर्तमान राजनीति का प्रतीक बना दिया जाता है।

कर्नाटक में 2015 से कांग्रेस सरकार ने टीपू जयंती का सरकारी आयोजन शुरू किया, जिस पर भाजपा और हिंदू संगठनों ने तीखा विरोध किया। बाद में 2019 में भाजपा सरकार ने इसे बंद कर दिया। वर्तमान कांग्रेस सरकार ने 2023 में सत्ता में आने के बाद भी सरकारी स्तर पर टीपू जयंती फिर से शुरू नहीं की और न ही पिछले प्रतिबंध को हटाया। फिर भी टीपू कर्नाटक की राजनीति में मौजूद हैं, क्योंकि वह अब केवल अठारहवीं सदी का शासक नहीं, बल्कि राजनीतिक स्मृति का प्रतीक बन चुका है। सवाल है, क्या इतिहास की आड़ में वर्तमान की राजनीतिक और सामुदायिक पहचान को आक्रामक बनाने की कोशिश हो रही है?

एक तरफ टीपू, दूसरी तरफ स्वयंसेवक

यादगीर में दो सरकारी शिक्षकों का निलंबन बहस को नए स्तर पर ले गया है। शिक्षा विभाग ने इसे प्रथमदृष्टया कर्नाटक सिविल सेवा (आचरण) नियम-2021 के उल्लंघन मानते हुए दोनों को 20 अगस्त 2026 को निलंबित कर दिया। 3 सितंबर 2026 को कलबुर्गि बेंच के कर्नाटक प्रशासनिक न्यायाधिकरण ने निलंबन आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी। अगली सुनवाई 9 अक्‍तूबर 2026 को होगी। यदि किसी कर्मचारी ने सेवा नियम तोड़े हैं तो जांच होनी चाहिए, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये नियम सभी संगठनों और विचारधाराओं के लिए समान रूप से लागू होते हैं?

केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कार्रवाई को नफरत और विद्वेष की राजनीति करार देते हुए तत्काल निलंबन वापस लेने को कहा। उन्‍होंने कहा कि सरकार को शिक्षकों को निलंबित करने के बजाय कथित अनियमितताओं के मामले में लापता आईएएस अधिकारी ज्ञानेंद्र कुमार गंगवार की तलाश पर ध्यान देना चाहिए। केंद्रीय मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी ने भी पूछा कि पथ संचलन में भाग लेने से ऐसा कौन-सा गंभीर नुकसान हुआ जिसके कारण निलंबन आवश्यक हो गया। प्रश्न वही है, क्या नियमों का प्रयोग समान रूप से हो रहा है?

कांग्रेस सरकार का रवैया

कर्नाटक में रा.स्व.संघ को लेकर कांग्रेस सरकार का यह रवैया पहली बार नहीं है। अक्‍तूबर 2025 में सरकार ने सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और कुछ अन्य परिसरों में संगठनों के कार्यक्रमों के लिए पूर्व अनुमति की व्यवस्था लागू की। तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धरामैया ने तब स्पष्ट किया था कि रा.स्व.संघ पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया और आदेश में संगठन का नाम नहीं है।

इसी दौर में रा.स्व.संघ के शताब्दी समारोह में भाग लेने और गणवेश पहनने वाले पंचायत विकास अधिकारी प्रवीण कुमार के निलंबन का मामला भी सामने आया था। अक्‍तूबर 2025 में मंत्री प्रियांक खरगे ने सरकारी कर्मचारियों के रा.स्व.संघ कार्यक्रमों में भाग लेने पर कड़ी कार्रवाई की मांग करते हुए मुख्यमंत्री को पत्र भी लिखा था। इसलिए सवाल उठता है, क्या कर्नाटक सरकार सरकारी कर्मचारियों की राजनीतिक निष्पक्षता सुनिश्चित कर रही है या रा.स्व.संघ के सामाजिक प्रभाव को सीमित करने की राजनीतिक कोशिश कर रही है?

तुष्‍टीकरण की राजनीति

रा.स्व.संघ पर कार्रवाई और टीपू विवाद के बीच कर्नाटक सरकार की कुछ नीतियों ने विरोधियों को तुष्टीकरण का आरोप लगाने का अवसर दिया है। सबसे प्रमुख उदाहरण है सरकारी ठेकों में मुसलमानों के लिए 4 प्रतिशत आरक्षण, जिसे 2025 में विधानसभा ने पारित किया। भाजपा ने इसे ओबीसी, एससी और एसटी के अधिकारों पर असर डालने वाला और तुष्टीकरण की नीति बताया। सरकार और समर्थकों का तर्क है कि पिछड़े और वंचित समुदायों को अवसर देना सामाजिक न्याय का हिस्सा है। लेकिन संवैधानिक सवाल उठता है, क्या कल्याणकारी नीति आर्थिक-सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर बननी चाहिए या मजहबी पहचान के आधार पर? यही बहस 2025 की आवास नीति में भी सामने आई, जहां अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण और हिस्सेदारी बढ़ाने के फैसले पर भाजपा ने मजहब-आधारित आरक्षण बताते हुए आपत्ति की।

यदि सामाजिक न्याय का उद्देश्य गरीबी और पिछड़ेपन को दूर करना है, तो लाभार्थी की मजहबी पहचान को प्राथमिक कसौटी क्यों बनाया जाए? यदि योजना का आधार वास्तव में सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन है, तो सरकार को आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। किस समुदाय की कितनी आय है, कितने परिवार बेघर हैं, कितने शिक्षा से वंचित हैं और किस आधार पर प्रतिशत तय हुआ? पारदर्शिता होगी तो तुष्टीकरण का आरोप कमजोर होगा! लेकिन यदि नीति का राजनीतिक आधार समुदाय-विशेष को साधना है, तो यह लोकतांत्रिक समानता के लिए गंभीर प्रश्न है।

क्या कांग्रेस का ‘सेक्युलरिज्म’ चयनात्मक है? यही इस विवाद का सबसे बड़ा सवाल है। सरकार की मशीनरी को यह तय करने में समान कठोरता दिखानी चाहिए कि कोई सरकारी कर्मचारी किसी अन्य राजनीतिक, मजहबी या वैचारिक संगठन की गतिविधि में भाग न ले। इसका स्पष्ट, सार्वजनिक रिकॉर्ड रखना चाहिए। तुष्टीकरण अंततः समाज को कमजोर करता है। किसी समुदाय के गरीब, पिछड़े और वंचित लोगों को सहायता देना गलत नहीं है। गलत तब होता है जब सहायता का आधार नागरिक की आवश्यकता नहीं, उसकी मजहबी पहचान बन जाए, क्योंकि तब कल्याणकारी राज्य धीरे-धीरे हितग्राही राज्य और फिर वोट-बैंक राज्य में बदल जाता है। इसी तरह, यदि रा.स्व.संघ से जुड़े किसी सरकारी कर्मचारी पर कार्रवाई सेवा नियमों के कारण होती है, तो सरकार को यह साबित करना होगा कि वही नियम उसके राजनीतिक विरोधियों पर भी उसी तरह लागू होते हैं। लोकतंत्र में मंशा से अधिक महत्वपूर्ण समानता है।

कर्नाटक का असली सवाल

कर्नाटक आज एक बड़े वैचारिक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर यह राज्य भारत की आधुनिक तकनीकी और औद्योगिक शक्ति के निर्माण में अहम भूमिका निभा रहा है; दूसरी ओर इसकी राजनीति इतिहास, पहचान और समुदायों के बीच खिंचती रेखाओं से प्रभावित हो रही है। टीपू का कटआउट हो या संघ का पथ संचलन, दोनों घटनाएं अलग हैं, लेकिन दोनों एक बड़ा सवाल पूछती हैं। राज्य किसे अपनी नागरिक स्वतंत्रता का पूरा अधिकार देता है और किसे संदेह की नजर से देखता है? क्या उसी स्वतंत्रता से छत्रपति शिवाजी महाराज, रानी अब्बक्का, कित्तूर रानी चन्नम्मा, महाराणा प्रताप और अन्य ऐतिहासिक व्यक्तित्वों की स्मृति को भी समान सरकारी संरक्षण और सम्मान मिलेगा? कसौटी एक ही होनी चाहिए।

मुसलमानों के लिए कल्याणकारी योजनाएं हों या संघ के स्वयंसेवकों पर प्रशासनिक कार्रवाई, सरकार का व्यवहार ही उसकी पंथनिरपेक्षता की वास्तविक परीक्षा है। सेक्युलरिज्म का अर्थ किसी एक समुदाय को प्रसन्न करना नहीं, बल्कि यह है कि राज्य सबका हो, कानून सबके लिए हो, अधिकार सबके लिए हों और प्रशासन की कसौटी भी सबके लिए एक हो। लोकतंत्र में सरकार की असली परीक्षा यह नहीं कि वह अपने समर्थकों के साथ कैसा व्यवहार करती है, बल्कि यह है कि वह अपने वैचारिक विरोधियों के साथ कितना समान व्यवहार करती है।

Topics: तुष्टीकरणपंथनिरपेक्षतामजहबी पहचानपाञ्चजन्य विशेषसमान कानूनसामाजिक एकजुटतावोट बैंक राजनीतिप्रशासनिक निष्पक्षतापथ संचलन
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