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‘कृष्ण चेतना से सभी एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने शुक्रवार, 28 अगस्त को न्यूयॉर्क स्थित ऐतिहासिक इस्कॉन मंदिर का दौरा किया

Written byPanchjanyaPanchjanya
Sep 8, 2026, 02:28 pm IST
inविश्व
न्यूयॉर्क के इस्कॉन मंदिर में (बाएं से) संत यदुनाथ दास, दयान्वेषक दास, राधानाथ स्वामी, गोपाल कृष्ण गोस्वामी और सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत

न्यूयॉर्क के इस्कॉन मंदिर में (बाएं से) संत यदुनाथ दास, दयान्वेषक दास, राधानाथ स्वामी, गोपाल कृष्ण गोस्वामी और सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने शुक्रवार, 28 अगस्त को न्यूयॉर्क स्थित ऐतिहासिक इस्कॉन मंदिर का दौरा किया। इस अवसर पर उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना की और श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि आज दुनिया अनेक संघर्षों और द्वंद्वों से गुजर रही है। ऐसे समय में श्रीकृष्ण की चेतना ही मनुष्य को एक-दूसरे से जोड़ने और विश्व में शांति स्थापित करने का आधार बन सकती है।

श्री भागवत ने कहा कि पूरी दुनिया कृष्णमय है और हमें कृष्ण की चेतना को जागृत करना होगा। उनके अनुसार दुनिया में अलग-अलग प्रकार के संघर्ष और द्वैत दिखाई देते हैं, लेकिन इनके बीच एक ऐसी चेतना है जो सबको जोड़ती है। उन्होंने इस एकत्व को श्रीकृष्ण की चेतना से जोड़ते हुए कहा कि जब मनुष्य अपने ईश्वर से संबंध और समस्त मानवता की एकता को समझेगा, तभी समाज में वास्तविक शांति संभव होगी।

उन्होंने एक उदाहरण के माध्यम से अपनी बात समझाई। श्री भागवत ने कहा कि किसी संस्था में मालिक, अधिकारी और अनेक कर्मचारी होते हैं। सभी की जिम्मेदारियां अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन यदि सभी को यह पता हो कि वे एक ही उद्देश्य के लिए काम कर रहे हैं, तो उनका काम अधिक तेजी और बेहतर ढंग से होता है। इसी प्रकार संसार में मनुष्यों के काम करने के तरीके अलग हो सकते हैं, उनकी परिस्थितियां अलग हो सकती हैं, लेकिन यदि उन्हें यह बोध हो कि सभी एक ही व्यापक उद्देश्य से जुड़े हैं, तो एकता स्थापित हो सकती है।

श्री भागवत के संबोधन का मूल संदेश यही था कि विविधता अलगाव का कारण नहीं, बल्कि एक व्यापक एकता का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने भीतर उस चेतना को जगाने की आवश्यकता है, जो उसे ईश्वर और दूसरे मनुष्यों से जोड़ती है। उनके अनुसार श्रीकृष्ण की चेतना को समझे बिना विश्व में स्थायी शांति की कल्पना कठिन है।

प्रभुपाद की तपस्या को नमन

श्री भागवत जिस स्थान पर पहुंचे, उसका इस्कॉन के इतिहास में विशेष महत्व है। न्यूयॉर्क के 26 सेकंड एवेन्यू स्थित यह वही ऐतिहासिक स्थान है, जहां श्रील ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने वर्ष 1966 में इस्कॉन की स्थापना की थी। एक छोटे से केंद्र से आरंभ हुई यह यात्रा आज विश्व के अनेक देशों तक पहुंच चुकी है। श्री भागवत ने इस ऐतिहासिक स्थल पर श्रील प्रभुपाद को पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। उन्होंने इस्कॉन द्वारा श्रीकृष्ण की भक्ति, भगवद्गीता और भारतीय आध्यात्मिक चिंतन को विश्वभर में पहुंचाने के प्रयासों की सराहना की।

इस्कॉन के अनुसार, छह दशक की यात्रा में संस्था ने दुनिया के विभिन्न देशों में लगभग एक हजार मंदिर, करीब एक सौ शाकाहारी भोजनालय और वैदिक साहित्य के व्यापक प्रसार का कार्य किया है। भगवद्गीता सहित वैदिक साहित्य की करीब 60 करोड़ प्रतियां 80 से अधिक भाषाओं में वितरित की जा चुकी हैं।

मंदिर से सेवा का संदेश भी

श्री भागवत के दौरे का एक महत्वपूर्ण पक्ष सेवा भी रहा। उन्होंने जरूरतमंद और बेघर लोगों के लिए चलाए जा रहे भोजन वितरण कार्यक्रम में हिस्सा लिया। इस अवसर पर न्यूयॉर्क में निःशुल्क शाकाहारी भोजन वितरण की एक लाखवीं थाली का पड़ाव भी पूरा हुआ। इस्कॉन दुनिया के विभिन्न हिस्सों में निःशुल्क भोजन वितरण के कार्यक्रम चलाता रहा है। भारत सहित कई देशों में इन कार्यक्रमों के माध्यम से जरूरतमंद लोगों तक भोजन पहुंचाया जाता है। श्री भागवत की यात्रा के दौरान भी आध्यात्मिक चेतना के साथ सेवा के इसी पक्ष को प्रमुखता मिली।

छह दशक की यात्रा और भविष्य का संकल्प

न्यूयॉर्क स्थित ऐतिहासिक मंदिर में भागवत का पहुंचना इस्कॉन की स्थापना के 60 वर्ष पूरे होने के अवसर से भी जुड़ा था। वर्ष 1966 में श्रील प्रभुपाद ने न्यूयॉर्क से जिस अभियान की शुरुआत की थी, वह आज विश्व के अनेक हिस्सों में कृष्ण भक्ति और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के प्रसार का माध्यम बन चुका है।

श्री भागवत ने इस वैश्विक यात्रा की सराहना करते हुए इस्कॉन के कार्यकर्ताओं को दुनिया के सामने ईश्वर चेतना और कृष्ण चेतना के संदेश को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया। उनका संदेश स्पष्ट था, दुनिया में शांति केवल बाहरी व्यवस्थाओं से नहीं आएगी। इसके लिए मनुष्य को अपने भीतर उस चेतना को जगाना होगा, जो उसे ईश्वर और समूची मानवता से जोड़ती है। न्यूयॉर्क के उसी ऐतिहासिक स्थान से, जहां छह दशक पहले श्रील प्रभुपाद ने कृष्ण भक्ति की वैश्विक यात्रा का आरंभ किया था,श्री मोहन भागवत ने आज के संघर्षग्रस्त विश्व के सामने कृष्ण चेतना, एकत्व और सेवा का संदेश रखा।

सरसंघचालक जी का विदेश प्रवास : बात भारत की

 

 

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