भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के सामने अभी एक अलग तरह की परेशानी है। बैंकिंग सिस्टम में बहुत ज्यादा पैसा यानी लिक्विडिटी जमा हो गई है। 3 सितंबर को यह लगभग 10.3 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई, जो मई 2022 के बाद चार साल का सबसे ऊंचा स्तर है।
लिक्विडिटी इतनी क्यों बढ़ गई?
मुख्य वजह आरबीआई का खास डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा है। 31 अगस्त तक इसमें 136.377 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा प्रवाह आए। इसमें से ज्यादातर, 127.226 अरब डॉलर, FCNR (B) जमा के रूप में आए। जब ये डॉलर रुपये में बदले गए तो सिस्टम में बहुत सारे रुपये आ गए। इन जमाओं को CRR और SLR से छूट मिली थी, इसलिए यह पैसा बिना किसी रोक-टोक के सिस्टम में घुल गया।
अगस्त में रोजाना औसत सरप्लस लिक्विडिटी 3.67 लाख करोड़ रुपये रही, जो जुलाई के 1.07 लाख करोड़ से तीन गुना से ज्यादा थी। केयरएज रेटिंग्स का अनुमान है कि अगर RBI कुछ न करे तो दिसंबर तक कोर लिक्विडिटी 13-14 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।
ज्यादा लिक्विडिटी से दिक्कत क्या?
बैंकों के पास पैसा ज्यादा होने पर ओवरनाइट मनी मार्केट रेट्स नीचे आने लगते हैं। ये रेट्स कभी-कभी रेपो रेट से भी कम हो जाते हैं। लंबे समय तक ढीली लिक्विडिटी रहने से महंगाई बढ़ने का खतरा भी रहता है। RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी के सदस्यों ने संकेत दिए हैं कि हेडलाइन महंगाई तीसरी तिमाही में 5.9 प्रतिशत तक जा सकती है, इसलिए साल के दौरान रेट बढ़ाने की बात भी उठ सकती है।
त्योहारी सीजन में करेंसी इन सर्कुलेशन करीब 1.1 लाख करोड़ रुपये बढ़ सकती है। RBI के फॉरवर्ड मार्केट में शॉर्ट पोजीशन के मैच्योर होने से करीब 3 लाख करोड़ रुपये की लिक्विडिटी कम हो सकती है। जमा बढ़ने से CRR भी थोड़ा और लिक्विडिटी घटाएगा।
RBI लिक्विडिटी कैसे सोख सकता है?
RBI पहले से कुछ कदम उठा रहा है। वह लगातार वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRR) ऑक्शन चला रहा है। एक दिन 7 दिन का 6 लाख करोड़ और ओवरनाइट 4 लाख करोड़ का ऑक्शन हुआ। उसके बाद भी 5 लाख और 6 लाख करोड़ के ओवरनाइट ऑपरेशन चले।
अन्य विकल्प भी हैं:
सीआरआर बढ़ाना: अभी सीआरआर 3 प्रतिशत है। इसे बढ़ाने से पैसा टिकाऊ तरीके से सिस्टम से निकल जाएगा। 2 प्रतिशत बढ़ोतरी भी काफी असर डाल सकती है।
इंक्रिमेंटल सीआरआर (आई-सीआरआर): 2023 में इस्तेमाल किया गया था। यह अस्थायी रूप से काम कर सकता है।
ओपन मार्केट ऑपरेशंस (ओएमओ): आरबीआई सरकारी बॉन्ड बेचकर पैसा सोख सकता है। पिछले साल उसने 2 लाख करोड़ रुपये खरीदकर लिक्विडिटी डाली थी, अब उल्टा कर सकता है।
लंबे समय के वीआरआरआर और धीरे-धीरे डॉलर बेचना भी मददगार साबित हो सकते हैं।
ये सभी औजार आरबीआई के पास उपलब्ध हैं। वह स्थिति देखकर इनमें से किसी एक या मिला-जुला इस्तेमाल कर सकता है ताकि बाजार में ब्याज दरें बहुत ऊपर न जाएं और सरकारी सिक्योरिटीज मार्केट भी प्रभावित न हो।
















