असम में गुवाहाटी के पास एक नया फूल वाला पौधा मिला है। इसका नाम ओफिओराइजा असमेंसिस रखा गया है। यह पौधा विज्ञान के लिए पूरी तरह नया है। वैज्ञानिकों ने इसे पहली बार औपचारिक रूप से पहचाना और नाम दिया है। बड़ी बात यह है कि यह पौधा कैंसर के इलाज में सहायक पाया गया है।
पौधे की खोज कहाँ और कैसे हुई
यह छोटा सा पौधा कामरूप मेट्रोपॉलिटन जिले में सतरगाँव रोड के किनारे छायादार और नम जगह पर चुपचाप उग रहा था। गिरीजानंद चौधरी यूनिवर्सिटी के अजारा कैंपस में बॉटनी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर बिरिना भुयान और गुवाहाटी के वनस्पति वैज्ञानिक सलीम मेहमूद ने मिलकर इसकी खोज की। दोनों ने मिलकर इसका पूरा अध्ययन किया और अंतरराष्ट्रीय जर्नल फाइटोटैक्सा में अपना पेपर प्रकाशित किया। पेपर का शीर्षक है “ओफिओराइजा असमेंसिस (रूबिएसी), असम, भारत से एक नई प्रजाति।”
पौधे का रूप-रंग और परिवार
यह एक बहुवर्षीय जड़ी-बूटी है। इसकी पत्तियाँ बड़ी और नसदार होती हैं। छोटे-छोटे सफेद फूल गुच्छों में लगते हैं। यह ओफिओराइजा नाम के वंश में आता है और रूबिएसी परिवार का सदस्य है। यही परिवार कॉफी के पौधों का भी है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह पौधा दो पहले से ज्ञात प्रजातियों ओ. मुसैंडिफॉर्मिस और ओ. नेपालेंसिस से काफी मिलता-जुलता दिखता है। अंतर समझने के लिए शोधकर्ताओं ने पूरी टैक्सोनॉमिक डिटेल, चित्र और असम में पाई जाने वाली ओफिओराइजा प्रजातियों की तुलना की कुंजी भी दी है। असम में इस वंश की कई प्रजातियाँ हाल के वर्षों में ही पहचानी गई हैं। बिरिना भुयान ने 2024 में भी इस वंश की टैक्सोनॉमी और वितरण पर अध्ययन किया था, जिसने इस नई खोज की नींव रखी।
कैंसर से जुड़ा महत्व
ओफिओराइजा वंश की प्रजातियाँ कैम्प्टोथेसिन नाम का यौगिक पैदा करती हैं। यह यौगिक कई आधुनिक कैंसर दवाओं का आधार है। खासकर कोलन कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं में इसका इस्तेमाल होता है। इसलिए इस नई प्रजाति की खोज सिर्फ वनस्पति विज्ञान तक सीमित नहीं रहती। पौध-आधारित दवाओं के क्षेत्र में भी इसकी दिलचस्पी बढ़ जाती है।
वर्तमान स्थिति और संरक्षण
अभी तक यह पौधा सिर्फ सतरगाँव रोड के पास एक छोटे से क्षेत्र में ही मिला है। वैज्ञानिकों के पास अभी यही एक आबादी का पता है। इतने सीमित क्षेत्र में होने के कारण यह आसानी से खतरे में पड़ सकता है। सड़क चौड़ी करने, जमीन के इस्तेमाल में बदलाव या जंगलों के कटने से यह आबादी खत्म हो सकती है। भुयान और मेहमूद ने सुझाव दिया है कि इसे IUCN के दिशानिर्देशों के तहत फिलहाल “डेटा डेफिशिएंट” श्रेणी में रखा जाए। इसका मतलब है कि अभी इसकी पूरी जानकारी पर्याप्त नहीं है, इसलिए खतरे का स्तर तय नहीं किया जा सकता। लेकिन यह श्रेणी आगे की निगरानी और अध्ययन की जरूरत बताती है।

















