भारत में जन्माष्टमी इतिहास, आस्था, लोकजीवन, कला और सामुदायिक स्मृतियों की लंबी यात्रा का उत्सव है। भारत ने कृष्ण को अपनी विविध संस्कृतियों में किस प्रकार आत्मसात किया और अपनी-अपनी भाषा में उनकी लीला को कैसे जीवित रखा। यही यात्रा हमें एक ऐसे भारत से परिचित कराती है जहाँ उत्सव अनेक हैं, रूप अनेक हैं, पर सांस्कृतिक आत्मा एक है।
मथुरा से वृंदावन गोकुल तक जन्माष्टमी में जीवंत होता कृष्ण का स्वरुप
मथुरा कृष्ण की जन्मभूमि, गोकुल उनके बाल्यकाल की स्मृति से जुड़ी भूमि और वृंदावन राधा-कृष्ण की प्रेम एवं रास-भक्ति का प्रमुख केंद्र है। मथुरा का उल्लेख मेगास्थनीज फाह्यान और हवेनसांग ने भी किया है, मथुरा शैली की मूर्ति ने कृष्ण भक्ति की परम्पर को समृद्ध किया है। कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी की मध्य रात्रि में मथुरा के कारागार में देवकी और वासुदेव के पुत्र के रूप में हुआ , जन्म के बाद वासुदेव द्वारा शिशु कृष्ण को यमुना पार कर गोकुल ले जाने की कथा, मथुरा और गोकुल की जन्माष्टमी परंपराओं को आपस में जोड़ती है। भक्त दिन भर व्रत रखते हैं, भजन कीर्तन, कृष्ण कथा करते हैं। मध्य रात्रि में कृष्ण जन्म का उत्सव मनाते हैं। वर्तमान परिसर में जन्म स्थान से जुड़ा गर्भ गृह और केशव मंदिर एवं मथुरा का द्वारकाधीश मंदिर है , यहां कृष्ण का राजसी स्वरूप देखने को मिलता है। इस मंदिर का निर्माण 1814 में सेठ गोकुलदास पारीख ने कराया था उसका प्रबंधन वल्लभाचार्य संप्रदाय से जुड़ा है।
वृंदावन जहां कृष्ण जन्म से आगे प्रेम बन जाते हैं, मथुरा से लगभग 12 किलोमीटर वृंदावन कृष्ण भक्ति का हृदय है। यहां बांके बिहारी मंदिर, मदन मोहन मंदिर घाट आदि महत्वपूर्ण स्थल है। यह भूमि है जहाँ कृष्ण की बांसुरी, गोपियों के साथ रास , राधा कृष्ण का प्रेम, ब्रज की मधुर भक्ति ने भारतीय साहित्य एवं संगीत को गहराई से प्रभावित किया है। सूरदास, रसखान ,स्वामी हरिदास और चैतन्य महापुरुष भक्तों ने संतों ने ब्रज की कृष्ण भक्ति को समृद्ध किया है। वृंदावन का इस्कॉन मंदिर , राधारमण मंदिर , बांके बिहारी मंदिर कृष्ण भक्ति के केंद्र है। गोकुल में जन्माष्टमी दो दिन मनाई जाती है. एक जब मथुरा में कृष्ण का जन्म हुआ तब और दूसरा जब गोकुल में नंद-यशोदा के घर उनका बाल रूप प्रकट हुआ। गोकुल में नंद भवन, 84 खंबा, गोकुलनाथ मंदिर, रमन रेती, ब्रह्मांड घाट आदि प्रमुख स्थल है। ब्रज में जन्माष्टमी में लोगों के घरों में बाल गोपाल की स्थापना होती है, झूले सजाये जाते हैं, कृष्ण को नए वस्त्र आभूषण बनाए जाते हैं, कृष्ण की बाल लीलाओं की झांकियां होती हैं, भजन संकीर्तन होते हैं और कृष्ण की कथा का रासलीला के रूप में प्रकटीकरण होता है। साझी कला जो फूलों रंगों से बनाई जाने वाली विशिष्ट ब्रज कला है।
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महाराष्ट्र की दही हांडी माखन चोर कृष्ण की बाल लीला से सामूहिक उत्सव तक
महाराष्ट्र में मानव पिरामिड बनाकर ऊपर पहुंचकर मटकी फोड़ने की परंपरा है, जिसे दही हांडी कहा जाता है। इसे हम गोपालकाला/उत्लोत्सव के नाम से भी जानते हैं। दही-हांड़ी एक चुनौती पूर्ण कार्य है क्योंकि इसमें पानी की बौछार भी की जाती है। मटकी जितनी ऊंची होती है चुनौती उतनी ही बड़ी होती जाती है, नीचे खड़े प्रतिभागी एक दूसरे के कंधों पर चढ़ पिरामिड बनाते हैं और जो सबसे ऊपर पहुंचा एवं हांडी फोड़ता है और पूरा वातावरण गोविंदा आला रे जैसे जय घोष से गूंज उठता है। इसमें हमें टीमवर्क, समन्वय, धैर्य और ता सामुदायिक एकता का अनुभव होता है और दहीहंडी का प्रसाद अकेले नहीं, सब में साझा किया जाता है। महाराष्ट्र में दही हांडी विशेष रूप से मुंबई ठाणे पुणे में बड़े पैमाने पर मनाई जाती है। गुजरात में जन्माष्टमी द्वारकाधीश की भक्ति से सातम-आठम और लोक मेलो तक द्वारिका में स्थित द्वारकाधीश मंदिर जन्माष्टमी का मुख्य केंद्र है। यहाँ कृष्ण को बालक और राजा दोनों भाव में दिखाया जाता है, जिसमें गोमती स्नान का बड़ा महत्व है। मध्य रात्रि में कृष्ण जन्म की घोषणा के साथ पूरा वातावरण ‘नंद के घर आनंद भयो’ की भावना से भर उठता है। गुजरात के परिवारों में जन्माष्टमी सातम-आठम पर्व के क्रम से जुड़ा है। जन्माष्टमी से एक दिन पहले शीतला सप्तमी की परंपरा आती है, सातम के दिन यानी ठंडा भोजन ग्रहण करने की परंपरा कही जाती है। एक दिन पूर्व भोजन तैयार करने की प्रक्रिया को रंधन छठ से भी जोड़ा जाता है और आठवें दिन कृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जाता है। यहां कृष्ण जन्माष्टमी दूसरा पक्ष लोक मेलों के रूप में देखने को मिलता है जहां भोजन हस्तशिल्प सांस्कृतिक कार्यक्रम और मनोरंजन से जुड़े कार्यक्रम होते हैं जिसमें राजकोट और पोरबंदर के लोक मेले प्रसिद्ध है।
महाराष्ट्र की तरह यहां पर भी माखन-हांडी देखने को मिलती है। कृष्ण भक्ति का एक केंद्र डाकोर है, जहां भगवान कृष्ण रणछोड़ राय के नाम से प्रतिष्ठित है, इस मंदिर का निर्माण 1772 में कराया गया था। यहां पर कृष्ण को रणनीति एवं धर्म नीति के रूप में देखा जाता है। पश्चिम बंगाल और असम में जन्माष्टमी भक्ति परंपरा और लोक संस्कृति के विशिष्ट रूप पश्चिम बंगाल में चैतन्य महाप्रभु की भक्ति परंपरा और पुराने बंगाली परिवारों की घरेलू परंपराओं से जुड़ती है जबकि असम में इसका स्वरूप शंकर देव की एकशरण वैष्णव परंपरा, नाम घर ,नाम कीर्तन और सतारिया के माध्यम से सामने आता है। नवदीप और मायापुर चैतन्य महाप्रभु से जुड़े कृष्ण परंपरा के केंद्र हैं। जन्माष्टमी के दिन अनेक श्रद्धालु उपवास रखते हैं, मध्य रात्रि तक कृष्ण जन्म का उत्सव मानते है। अगले दिन नंदोत्सव मनाया जाता है। कोलकाता की पुरानी बोनेदी -बाड़ी अर्थात सभ्रांत परिवारों के पारंपरिक घर, इस पर्व को अपनी पारंपरिक पारिवारिक परंपराओं के साथ जीवित रखते हैं। भवानीपुर की मालिक बाड़ी में जन्माष्टमी के दिन की शुरुआत काठ पूजा अर्थात दुर्गा पूजा की लकड़ी के ढांचे की पूजा से की जाती है। एक और जन्माष्टमी और दूसरे ओर दुर्गा पूजा की तैयारी का शुभारंभ होता है। कोलकाता के प्रसिद्ध मार्बल पैलेस में 200 वर्ष पुराने जगन्नाथ देव जी तथा राधाकांत देव जी की पूजा जन्माष्टमी के अवसर पर की जाती है। बंगाल में बंगाल में विशेष रूप से ताड के फल से तैयार किए जाने वाला पारंपरिक पकवान ताल एर बोरा जन्माष्टमी के अवसर पर अर्पित किया जाता है। असम में 15वीं 16वीं शताब्दी में शंकरदेव उनके शिष्य माधव देव ने एक शरण नाम धर्म या असमिया नव- वैष्णव परंपरा को प्रारंभ किया और नाम घर में जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जाता है। नाम घर की धार्मिक अवस्था में माणिकूट प्रमुख है। जन्माष्टमी को सामान्य लोगों तक पहुंचाने के लिए अंकिया नाट की परंपरा विकसित की गई थी।कृष्ण और विष्णु की कथाएं सत्तरिया की विषयवस्तु का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। माजुली कृष्ण भक्ति का प्रमुख केंद्र है।इसके अलावा पूर्वोत्तर के मेघालय की शिलांग में जन्माष्टमी का उत्सव होता है। त्रिपुरा में उदयपुर स्थित पलाटाना इस्कॉन मंदिर में जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जाता है। सिक्किम के गंगटोक की ठाकुरबाड़ी में जन्माष्टमी की विशेष पूजा की जाती है। अरुणाचल प्रदेश के नाहरलागुन के क्षेत्र में असमिया समुदाय द्वारा कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है।
उड़ीसा में जन्माष्टमी जगन्नाथ परंपरा में कृष्ण जन्म नंद दोस्तों लीलाओं का उत्सव
यहां कृष्ण को जगन्नाथ परंपरा के भीतर जीवंत कृष्ण रूप में अनुभव किया जाता है। पुरी में जन्माष्टमी का विशेष पर्व मनाया जाता है। जन्माष्टमी की तैयारी के एक दिन पहले विशेष गर्भोदक बंदापना और जेउता भोग की परंपरा निभाई जाती है। मध्य रात्रि में पुरी के मंदिरों और अन्य धार्मिक केदो में भक्त उपवास रखते हैं और कृष्ण का जन्म होता है। जन्माष्टमी का अगले दिन नंदोत्सव मनाया जाता है और यहां कई दिनों तक कृष्ण की बाल लीलाओं का मंचन किया जाता है। उड़ीसा में चैतन्य महाप्रभु एवं गीत गोविंद की परंपरा ने कृष्ण-भक्ति को गहराई देने का काम किया।
मणिपुर में जन्माष्टमी कृष्ण भक्ति रासलीला और मणिपुरी संस्कृति का संगम
मणिपुर के राजा भाग चंद्र का संबंध कृष्ण भक्ति से है और यहां के इंफाल में स्थित श्री गोविंद जी मंदिर में जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जाता है। जन्माष्टमी के समय यहां रासलीला का आयोजन किया जाता है। मणिपुरी कृष्ण भक्ति में संकीर्तन औरपुंग चोलोम का महत्वपूर्ण स्थान है। मणिपुरी वैष्णव संस्कृति में नूपा पाला, जिसे कार्ताल चोलोम भी कहते है, में पुरुष कलाकार करताल के साथ सामूहिक रूप से गायन और नृत्य करते हैं। यहां की गोपीनाथ मंदिर में बड़े भव्यता से जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता है। दक्षिण भारत में विशेष कर तमिल क्षेत्र की प्राचीन संस्कृति में मायोन नामक देवता की कल्पना है , जिसे वैष्णव परंपरा में कृष्ण से जोड़ा गया। भक्ति आंदोलन को अलवार संतों ने विष्णु और उनके अवतारों विशेषज्ञ कृष्ण के प्रति भक्ति को जान भाषा में बदल दिया। साध्वी आण्डाल की तिरुप्पावै में कृष्ण भक्ति का भाव मिलता है। तमिलनाडु में कृष्ण जयंती या गोकुल अष्टमी कहा जाता है, इस दिन घर में कृष्ण के पद चिन्ह बनाए जाते हैं जो बालकृष्ण के आगमन का उत्सव बन जाते हैं। विशेष प्रसाद उप्पु सीडई, वेल्लम सीडई मुरुक्कु, अप्पम आदि खाद्य पदार्थ बनाए जाते हैं। तमिलनाडु में दही हांडी को उरियाडी के नाम से जाना जाता है।
केरल में जन्माष्टमी को अष्टमी रोहिणी कहा जाता जिसका प्रमुख केंद्र गुरुवायुर का श्री कृष्ण मंदिर हैं। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में तिरुमला तिरुपति क्षेत्र एवं अन्य विष्णु मंदिरों में जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जाता है। कर्नाटक का उडुपी 13वीं शताब्दी के दार्शनिक माधवाचार्य से जुड़ा हुआ है, यहां कृष्ण की मूर्ति का दर्शन एक विशिष्ट कनकन किंडी नाम की खिड़की से किया जाता है। उडुपी में जन्माष्टमी का उत्सव कई दिन तक चलता है। जन्माष्टमी के बाद विट्ठल पिंडी उत्सव का विशेष आकर्षण होता है। जन्माष्टमी हमें यह समझाती है कि कृष्ण वह बाँसुरी हैं, जिसकी धुन सबको अपनी ओर खींचती है। कृष्ण वह बालक हैं, जो घर-आँगन में मुस्कान भर देते हैं। कृष्ण वह गोपाल हैं, जो प्रकृति, पशु और ग्राम्य जीवन से जुड़ते हैं। कृष्ण वह सखा हैं, जो मनुष्य के सुख-दुःख में साथ खड़े होते हैं। कृष्ण वह मुरलीधर हैं, जो प्रेम का स्वर जगाते हैं। कृष्ण वह योगेश्वर हैं, जो मोह के क्षण में गीता का ज्ञान देते हैं और कृष्ण वह मार्गदर्शक हैं, जो धर्म, कर्तव्य और लोककल्याण का रास्ता दिखाते हैं। जन्माष्टमी की मध्यरात्रि में जब शंख बजता है और घोषणा होती है ‘नंद के घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ तो वह आनंद केवल एक स्थान का नहीं रहता। वह भारत के गांवों, नगरों, मंदिरों, घरों, घाटों, पहाड़ों और समुद्रतटों तक फैल जाता है।












