श्रीकृष्ण अवतार का उद्देश्य संगठित एवं शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण
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श्रीकृष्ण अवतार का उद्देश्य संगठित एवं शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण

गणराज्यों का दमन और अंत हो रहा था.। काम्बोज के राज सुदक्षिण  माहिष्मती के नील,अवंती  के अनुविंद, त्रिगर्त के पांच भाई ,कौशल  के बृहदबल,गांधार के सकुनि पौरव के जलसंघ, प्रगज्योतिषपुर के भगदत्त तथा बाल्हीक के शासक कौरवों के पक्ष में उतरे थे ।

Written byआचार्य मनमोहन शर्माआचार्य मनमोहन शर्मा — edited by Mahak Singh
Sep 2, 2026, 02:28 pm IST
inधर्म-संस्कृति
भगवान श्रीकृष्ण।

भगवान श्रीकृष्ण।

द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण का अवतार होना भारतीय धार्मिक सांस्कृतिक इतिहास की एक है भूतपूर्व घटना है उन्होंने सामान्य व्यक्ति के रूप में समाज में अन्याय, अव्यवस्था अनाचार और निश्चितता को नष्ट कर एक संगठित, सुदृढ़, समर्थ एवं शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण करने में मुख्य भूमिका निभाई इसीलिए आज सारे भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि समस्त विश्व में फैले हुए भारतवंशी उनके जन्मदिन को धूमधाम से मनाते हैं। महाभारत युद्ध से पूर्व भारत में कोसल, विदेह, शूरसेन, कुरु, पाञ्चाल, मत्स्य, मद्र, केकय, गान्धार, वृष्णि, भोज, मालव, क्षुद्रक, सिन्धु, सौवीर, काम्बोज, त्रिगर्त, श्रनर्त आदि सहित लगभग 200 राज्य थे ।अधिकतर राज्यों में सुशासन नहीं था । कंस,शिशुपाल,जरासंध आदि शासक जनता पर भार बन चुके थे।

कौरवों के अधर्म से बढ़ा राजनीतिक असंतुलन

गणराज्यों का दमन और अंत हो रहा था.। काम्बोज के राज    सुदक्षिण  माहिष्मती के नील,अवंती  के अनुविंद, त्रिगर्त के पांच भाई ,कौशल  के बृहदबल,गांधार के सकुनि पौरव के जलसंघ, प्रगज्योतिषपुर के भगदत्त तथा बाल्हीक के शासक कौरवों के पक्ष में उतरे थे । इससे पता चलता है कि ये सभी शासक अन्याय के पक्षधर थे । हस्तिनापुर का कौरव साम्राज्य निरंकुश और अधर्मी हो चुका था । कौरवों के पास अनियंत्रित सत्ता राष्ट्र की राजनीति में बोझ बन गई थी । अतः पृथ्वी पर बढ़ते इस राजनीतिक असंतुलन और अधर्म वाले निरंकुशता शासन को समाप्त करके न्याय प्रिय धर्म राज्य स्थापित करने की आवश्यकता थी । अतः  संतुलन के लिए  योग्य शासको को पुनर्स्थापित किया और क्षत्रिय धर्म का लोप होने से बचाया । अर्जुन के माध्यम से उन्होंने शासको को उनका  कर्तव्य याद दिलाया और अपनी कूटनीतियों द्वारा समाज में सुशासन स्थापित किया । इतना ही नहीं  देश में संस्कृतिक एकता स्थापित करने के लिए उनके भाई बलराम ने लंबी यात्रा की जिस से देश में तीर्थों, गुरुकुलों एवम नगरों की पुनः प्रतिष्ठा हुई । प्राचीन काल में राज्यकार्य समस्त समाज के प्रतिनिधियों की सलाह पर चलता थ ।रामायणमें इसका बहुत सुन्दर वर्णन है। राम के भावि राजा धोषित होने से पूर्व दसरथ सभा बुला कर सब की सलाह लेते हैं । ऐसी सभाओं में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि सभी वर्णों के लोग निमन्त्रित किये जाते थे। राजसत्ता  अनियन्त्रित नहीं थी और  किन्तु जनता की राय  लेनेकी परिपाटी थी। युद्ध से पूर्व  हस्तिनापुरमें भी राजा और ब्राह्मण लोगोंको ऐसी ही सभा बैठी थी; और.वहाँ युद्धके सम्बन्धमें सब लोगों को राय लेने की आवश्यकता हुई थी। वहीं श्री- कृष्णने भाषण किया था परन्तु अब राज्य सलाह नहीं मान रहा था।

कृष्ण अवतार के पीछे श्राप और धर्म स्थापना के प्रमुख कारण

कृष्ण के जन्म लेने के अनेक कारण संस्कृत ग्रंथों में प्राप्त होते हैं जैसे राम अवतार के समय दिए गए वरदान, महर्षि भृगु का श्राप तथा तत्कालीन समाज में फैली अव्यवस्था को नष्ट करने के लिए देवताओं द्वारा भगवान की स्तुति आदि। अनेक पुराणों जैसे ब्रह्म पुराण, लिंग पुराण, कूर्म पुराण, मत्स्य पुराण तथा देवी भागवत में हम पाते हैं कि महर्षि भृगु ने विष्णु  को श्राप दिया था कि उन्हें मनुष्य योनि में पृथ्वी पर अवतरित होना पड़ेगा  । इस शाप का मुख्य कारण यह था कि इंद्र की रक्षा करने के लिए विष्णु ने भृगु की पत्नी का वध कर दिया था । अतः क्रोध में महर्षि भृगु ने उन्हें यह श्राप दिया । इसी प्रकार कृतिवास रामायण के अनुसार जब भगवान राम ने बाली का वध किया तो बाली की पत्नी तारा ने राम को श्राप दिया था कि वह मनुष्य रूप में धरती पर आएंगे और बाली उनका वध करेगा।

राम अवतार कैसे में दिए गए वरदानों की चर्चा पर दृष्टिपात करें तो हमें पता चलता है कि उसमें भी कृष्ण जन्म के कारण छुपे हुए थे पद्म पुराण तथा गर्ग संहिता के अनुसार राम के सौंदर्य से मुग्ध हुए दंडकारण्य वासियों और अनेक ऋषियों को उन्होंने वरदान दिया था कि जन्मांतर में वे  गोपियां बनकर और मुझे प्राप्त करेंगे. आनंद रामायण के अनुसार प्रातः के हुए बाली को राम ने वरदान दिया था कि द्वापर में तुम मुझ से अपना बदल लोगे । उस समय तुम भील और मैं अवतार रूप में रहूंगा । इसी रामायण में हम यह भी पाते हैं कि राम ने पिंगला वेश्या, गुणवती विधवा, नागकन्या और सुगना दासी को यह वरदान दिया था कि अगले जन्म में तुम्हारा कुब्जा, सत्यभामा, जांभवती और राधा के रूप में जन्म होगा  और मैं तुम्हारी कामना पूरी करूंगा । इस प्रकार कुछ अन्य ग्रन्थों में भी राम द्वारा वरदान देने की चर्चा है।

अत्याचारी शासकों से मुक्ति और पृथ्वी का भार कम करना

कृष्ण जन्म की सबसे महत्वपूर्ण और सामाजिक राजनीतिक कारणों का विश्लेषण करने के लिए हमारे पास अनेक ग्रन्थों में देवताओं द्वारा भगवान से प्रार्थना कर उन्हें अवतार लेने के लिए आग्रह करनेत के  प्रमाण मिलते हैं ।  देवताओं ने  धरती पर  राज करने वाले अहंकारी,अत्याचारी, अन्यायी एवं क्रूर शासको का विनाश करने के लिए और पृथ्वी का भार कम करने के लिए यह प्रार्थनाएं की थी  महाभारत, विष्णु, ब्रह्म, अग्नि, लिंग, देवीभागवत, भागवत, पद्म और ब्रह्मवैवर्तपुराण, गर्गसंहिता आदि के अनुसार पृथ्वी दुराचारी दैत्यों के भार से पीडित हो गई थी, अतः उसका भार-हरण करने के लिए देवों ने विष्णु से प्रार्थना की महाभारत के भीष्म पर्व में दुर्योधन द्वारा पांडवों की विजय होने के कारणों के बारे में पूछने पर  भीष्म ने दुर्योधन को उपदेश के बहाने पुरानी कथाओं में ब्रह्मा द्वारा गंधमादन पर्वत पर परम पुरुष से प्रार्थना करने का विवरण दिया था। ब्रह्मा ने कहा था कि

तेनास्मि कृतसंवादः प्रसन्नेन सुरर्षभाः ॥ जगतोऽनुग्रहार्थाय याचितो मे जगत्पतिः ॥
मानुषं लोकमातिष्ठ वासुदेव इदि श्रुतः । असुराणां वधार्थाय सम्भवख महितले ॥
मैंने उन जगदीश्वरसे सम्पूर्ण जगत्पर कृपा करनेके लिये यों प्रार्थना की है कि प्रभो ! आप वासुदेव नामसे विख्यात होकर कुछ काल तक मनुष्य लोक में रहें और असुरोंके वधके लिये इस भूतलपर अवतीर्ण हों ॥
संग्रामे निहता ये ते दैत्यदानवराक्षसाः । त इमे नृषु सम्भूता घोररूपा महाबलाः ॥
तेषां वधार्थ भगवान् नरेण सहितो वशी । मानुषीं योनिमास्थाय चरिष्यति महीतले ॥
‘जो-जो दैत्य, दानव तथा राक्षस संग्रामभूमि में मारे गये थे, वे मनुष्यलोकमें उत्पन्न हुए हैं और अत्यन्त बलवान् होकर जगत् के लिये भयंकर बन बैठे हैं  ।’उन सबका वध करनेके लिये सबको वशमें करनेवाले भगवान् नारायण नरके साथ मनुष्ययोनिमें अवतीर्ण होकर भूतलपर विचरेंगे ॥  6.66.6-10.
पृथिवी निर्भया देव त्वत्प्रसादात् सदाभवत् । तस्माद् भव विशालाक्ष यदुवंशविवर्धनः ॥  धर्मसंस्थापनार्थाय दैत्यानां च वधाय च । जगतो धारणार्थाय विज्ञाप्यं कुरु मे विभो ॥ देव ! आपके ही प्रसादसे पृथ्वी सदा निर्भय रही है, इसलिये विशाललोचन ! आप पुनः पृथ्वीपर यदुवंशमै अवतार लेकर उसकी कीर्ति बढ़ाइये ।प्रभो ! धर्मकी स्थापना, दैत्योंके वध और जगत्की रक्षाके लिये हमारी प्रार्थना अवश्य स्वीकार कीजिये ॥

अत्याचारियों के विनाश के लिए कृष्ण अवतार

देवीभागवत पुराण के अनुसार इन भारवर्द्धक दुराचारियों में  कंस, जरासंध, शिशुपाल, काशिराज, नरकासुर, शाल्व, केशी, धेनुक, वत्सासुर और रुक्मी आदि के नाम दिए गए हैं ।इन्हें समाज विरोधी और राक्षस प्रवृति  का माना गया है । इन्हें नष्ट करने के लिए देवताओं से प्रार्थना की गई है।  भागवत पुराण के दशम स्कंध में परीक्षित सूत जी से कृष्ण जन्म के कारण और उनके कार्यों का विवरण सुनना चाहते हैं  ।उसके उत्तर में सुकदेव जी बताते हैं कि हे परीक्षित! उस समय लाखों दैत्यों के दल ने घमंडी राजाओं का रूप धारण कर अपने भारी भार से पृथ्वी को आक्रांत कर रखा था । उससे त्राण पाने के लिए वह ब्रह्मा जी की शरण में गई और ब्रह्मा जी ने भगवान से पृथ्वी का भार काम करने की प्रार्थना की । ब्रह्मा जी ने भगवान की वाणी सुनकर देवताओं को आदेश दिया कि वह सभी अपने-अपने अंश में यदुकुल में जन्म ले और भगवान भी  कृष्ण के रूप में जन्म लेंगे।

हरिवंश पुराण में हम पाते हैं कि सभी राजा अपने अपने कर्म में ऊपर जा भी अपने-अपने कर्मों में   लगे हुए थे ।परन्तु उनकी सेना में निरंतर  संख्या बढ़ती जा रही थी।  जिससे पृथ्वी पर भार बढ़ रहा था । इस प्रकार भार से त्रस्त    हुई यह पृथ्वी  पीड़ित होकर भगवान की शरण में गई ।   पृथ्वी का भार दूर करने के लिए राज्यों का वध आवश्यक कार्य है , ऐसा विचार कर ब्रह्मा जी पृथ्वी सहित मेरु पर्वत पर भगवान विष्णु के पास गए और उनसे पृथ्वी का भार उतारने के लिए प्रार्थना की. । पृथ्वी बोली मैं रसातल में जा रही हूं ।आप मुझे धारण करें और मेरा भार काम करें । भगवान के कहने पर देवताओं से कहा गया कि  पृथ्वी पर रहने वाले राजाओं का अंत कर दिया जाए । ऐसी मंत्रणा की जाए जिससे पृथ्वी का भर तो काम हो जाए पर धर्म को हानि नहीं पहुंचे ।

यथा धर्मवधो न स्यात् तथा मन्त्रः प्रवर्त्यताम् ॥
राज्ञां चैव वधः कार्यो धरण्या भारनिर्णये ॥
तदेष निर्णयः श्रेष्ठः पृथिव्यां पार्थिवान्तकः । अंशावतरणं सर्वे सुराः कुरुत मा चिरम् ॥ देवताओं इसलिए तुम सब लोग अपने-अपने अंश से अवतार को देर न करो ।काल से प्रेरित हुए राजा  दो पक्षों में से किसी एक का साथ लेंगे और पृथ्वी के राज्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष कर नष्ट होंगे ।

इस पृथ्वी का भर काम करने के लिए राज्यों का वध आवश्यक कार्य है। हरिवंश पुराण में सुख शांति और व्यवस्था से अर्थात सुविधाओं से जनसंख्या बढ़ने और उसके कारण सैनिकों की संख्या बढ़ाने का विवरण प्राप्त होता है । उनके भार से पृथ्वी दुखी है अर्थात सुविधाएं बढ़ाने से जनसंख्या बढ़ गई उसे रोकने के लिए पृथ्वी ने भगवान से प्रार्थना की। वर्तमान में भी देश में कुछ वर्गों की जनसंख्या सुविधा प्राप्त करके तेजी से बढ़ रही है ।अतः  पुराण की दृष्टि में इसका उन्मूलन आवश्यक है जो वर्तमान काल में कूटनीति से ही संभव है इस और ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।

कृष्ण ने अत्याचार मिटाकर सुशासन और एकता स्थापित की

श्री कृष्ण ने धरा पर आने के बाद लोकरक्षक कार्यों में पूतना , कुक्कुट वेशधारी राक्षस  , वत्सासुर बकासुर अधासूर, धेनु कसूर  कालिया दमन, प्रलम्ब, शंखचूड़ अरिष्टासुर, केशी, व्योमासुर, रजक , कुवल्यापीड़, कंस, कागासुर,  आदि का वध किया ।  कुछ समय  बाद कालयवन, नरकासूर, पोंडर्क, श्रीगाल, शिशुपाल, निकुंभ, शाल्व, दंतवकत्र, विदुरथ, आदि का  वध करके धरा को स्वयं उबारा । भारत युध में अनेक दुष्ट राजाओं का संहार करवाया और सुशासन स्थापित किया ।युधिष्ठिर ने सब की सहमति से राज्यारोहण किया। संस्कृत ग्रंथों के इस विवरण से स्पष्ट है कि कृष्ण के जन्म का मुख्य कारण भारत भूमि में उत्पन्न राजनीतिक सामाजिक संकटों  का समाधान करना था कुशासन से समस्त प्रजा त्रस्त  थी और  बाह्य हस्तक्षेप बढ़ रहा था । इस प्रकार भीतर और बाहर से संकट था  आज भी राष्ट्र के सामने बाहरी और आंतरिक समस्याएं हैं ।उस काल के शासको की भांति आज भी अनेक क्षत्रप अपनी तुच्छ महत्वकांक्षाओं के लिए राष्ट्रीय एकता को हानि पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं  राष्ट्रीय गौरव, संस्कृति और श्रेष्ठता के भाव को निर्बल करने में लगे हुए हैं अत : आज भी कृष्ण जैसी कूटनीति  द्वारा ऐसी शक्तियों के दमन की आवश्यकता है।

Topics: Janmashtamijanmashtami kab haiJanmashtami 2026Incarnation of Shri KrishnaReason for Krishna's birthEstablishment of religionKrishna and good governanceDiplomacy of Shri KrishnaLord Shri Krishna
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