असुरत्व के विनाश और देवत्व के संरक्षण को संकल्पित युगनायक योगेश्वर श्रीकृष्ण भारतभूमि के अप्रतिम राष्ट्रनायक माने जाते हैं। इस महामानव का व्यक्तित्व और कृतित्व अत्यंत अद्भुत और विराट है। जीवन के धुर विरोधी आयामों को एक साथ अधिकारपूर्वक जीना भारत की सनातन संस्कृति के इस विलक्षण महानायक की अद्भुत विशिष्टता है। श्रीमद्भगवत गीता जैसी कालजयी कृति के सर्जक राष्ट्रनायक श्रीकृष्ण जीवन के हर मोर्चे पर क्रांतिकारी विचारों के धनी नजर आते हैं। ‘यदा-यदा हि धर्मस्य…संभवामि युगे-युगे’ के उद्घोषक युगनायक श्रीकृष्ण आज पांच हजार साल पहले द्वापरयुग में भारत की दिव्य धरा पर अवतरित हुए थे।16 कलाओं के पूर्णावतार योगेश्वर श्रीकृष्ण ने समग्र क्रांति का बिगुल बजाया और अपने सम्मोहक व्यक्तित्व व अनूठे न्यायप्रिय आचरण से पथभ्रष्ट समाज को सही दिशा दी। द्वारका से लेकर मणिपुर तक समूचे राष्ट्र ‘अखंड आर्यावर्त’ को बना देने वाले श्रीकृष्ण अपने समय के सर्वोत्कृष्ट कूटनीतिज्ञ माने जाते हैं। सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जनजागरण करने वाले योगेशवर कृष्ण की लोक लीलाओं में आमजन को अत्याचार से लड़ने और जागरूक रहने का प्रेरणादायी संदेश निहित है। श्रीकृष्ण का जीवन जितना रोचक व नाटकीय है, उतना ही मानवीय और मर्यादित भी। यही वजह है कि आज के तकनीकी युग का मानव भी श्रीकृष्ण के जीवन को अपने सर्वाधिक निकट व तर्कों पर पूरा पाता है।
प्रत्येक क्रियाकलाप में सारगर्भित शिक्षाएं
गोकुल के नटखट कान्हा से लेकर महाभारत समर में सारथी के रूप में पल पल पर अर्जुन का मार्गदर्शन करने वाले श्रीकृष्ण का समूचा जीवनचरित मानव कल्याण और जन सरोकारों के दिव्य सूत्रों को स्वयं में संजोये हुए है। बालपन से लेकर कुटुम्बीय जीवन तक; उनके प्रत्येक क्रियाकलाप में सारगर्भित शिक्षाएं निहित हैं। उन्होंने अपने बहुआयामी क्रियाकलापों से द्वापर युग की आम जनता को बोध कराया कि “अत्याचार” और “अहंकार” ये दो अवगुण समाज में असमानता और विद्वेष के मूल हैं। समरसतापूर्ण उन्नत समाज की संरचना के लिए इनका नष्ट होना जरूरी होता है। ज्ञात हो कि आसुरी शक्तियों के विरुद्ध श्रीकृष्ण का संघर्ष जन्म से ही शुरू हो गया था। दुधमुंही आयु में जहाँ एक ओर उन्होंने पूतना, वक्कासुर, शटकासुर जैसी शक्तिशाली आसुरी शक्तियों का नाश किया; वहीं यशोदा मैया को माटी भरे मुख में विश्व ब्रह्मांड भी दिखा दिया। मैया ने ऊखल से बांधने का प्रयास किया तो रस्सी छोटी हो गयी। हर लीला का अनूठा तत्वज्ञान। बालपन में ग्वाल सखाओं के साथ वन-वन गोवंश चराकर गऊ माता की महिमा बढ़ायी। जानना दिलचस्प हो कि भगवान श्रीकृष्ण ने ही सर्वप्रथम गाय को “माता” का दर्जा दिया था। उनको “गोपाल” सम्बोधन अत्यन्त प्रिय था। भारतीय दर्शन में पुरातन काल से ही गाय को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना गया है। अब तो वैज्ञानिक प्रयोगों से भी गोदुग्ध की ही नहीं, गोमूत्र, व गोमय की उपयोगिता साबित हो चुकी है। मुरली मनोहर की वंशी की मधुर तान सभी का मन मोह लेती थी। देवराज इन्द्र का दंभ तोड़कर गोवर्धन पूजा का महत्व प्रतिपादित किया। यशोदा के नटखट लल्ला, राधा के प्रेमी, सुदामा के मित्र, उद्धव के आचार्य, गोपियों के स्वामी, अर्जुन के सखा व महाभारत के सूत्रधार; उन्होंने सभी भूमिकाओं का निर्वहन सर्वोत्तम रूप में किया। चक्रवर्ती सम्राट युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में चरण धोकर व जूठे पत्तल उठाकर उन्होंने प्रतिपादन किया कि कोई भी काम छोटा नहीं होता। यही नहीं, इस शूरवीर महामानव ने धर्मरक्षा के लिए “रणछोड़” का सम्बोधन भी पूरी सहजता से स्वीकार किया।
देश-काल व धर्म के अनोखे व्याख्याता
देश के भागवत कथा मनीषी देवकी नंदन ठाकुर के शब्दों में कहें तो पूर्णावतार श्रीकृष्ण ने तद्युगीन समाज में प्रचलित पूर्व धारणाओं और जड़ परंपराओं को तोड़कर यह प्रतिपादित किया कि धर्म सदा देश-काल व परिस्थिति के सापेक्ष होता है। दुष्टों के दमन के लिए वे साम, दाम, दंड व भेद हर प्रकार की नीति के हिमायती थे। कर्ण व अर्जुन युद्ध में निहत्थे कर्ण को मारना उन्होंने धर्मोचित बताया। इसके पीछे उनका प्रबल तर्क यह था कि अधर्म के पोषक को धर्माचरण की आशा रखने का अधिकार नहीं होता। इसी तरह अनुचित रूप से मथुरा पर चढ़ाई करने आए कालयवन को धोखा देने में उन्होंने कुछ अनुचित नहीं समझा। उनकी मान्यता थी कि अधार्मिकों के साथ यदि पूर्ण धर्म का पालन किया जाए तो इससे उनका हौसला बढ़ता है और धर्म की हानि होती है। कहां-कहां धर्म को प्रधानता देनी है और कहां-कहां नीति को; इस महीन रेखा के वे पूर्ण जानकर थे।
कर्मयोद्धा कृष्ण जीवन के सबसे बड़े शिक्षक
चेहरे पर दिव्यता से भरी मनमोहक मुस्कान और मस्तिष्क में जीवन की गूढ़ समस्याओं के हल निकालने की गहरी समझ इस महामानव के चमत्कारी व्यक्तित्व का सबसे आकर्षक पहलू है। कृष्ण की दूरदर्शी सोच समस्या नहीं बल्कि समाधान ढूंढने की बात करती है। वे उदासी व नकारात्मक सोच के घोर विरोधी हैं। कृष्ण यह सिखाते हैं कि जीवन की लड़ाई संयम और सधी सोच के साथ लड़ी जाए तो सफलता सुनिश्चित होती है। उनका जीवन इस बात को रेखांकित करता है कि जीवन में आने वाली हर तरह की परिस्थितियों का समाना करने के लिए सतत कर्मशीलता के साथ धैर्य भी जरूरी है। कर्मयोद्धा कृष्ण सही अर्थों में जीवन के सबसे बड़े शिक्षक हैं। वे बताते हैं कि हमारे कर्म ही हमारे जीवन की दशा और दिशा तय करते हैं। कर्म की प्रधानता उनके संदेशों में सबसे ऊपर है। इसी कारण वे ईश्वरीय रूप में भी आम इंसानों से जुड़े से दीखते हैं। वे सिखाते हैं कि इंसान के विचार और व्यवहार स्वयं उनके ही नहीं बल्कि राष्ट्र और समाज की भी दिशा तय करते हैं। वे एक ऐसी जीवनशैली सुझाते हैं जिसमें सार्थकता और संतुलन के साथ समस्याओं से जूझने की ललक हो। गीता में वर्णित उनके सन्देश जीवन-रण में अटल विश्वास के साथ खड़े रहने की सीख देते हैं। कर्मयोगी कृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता में कहते हैं कि इंसान को फल की इच्छा किये बगैर कर्म करना चाहिए। याद रहे कि हमारी जिंदगी तभी तक तनाव, दुखों और परेशानियों से भरी है जब तक हम जिंदगी के मूल को नहीं समझते। बिखराव भरे वर्तमान दौर में भी राष्ट्र-राज्य की उन्नति के लिए राष्ट्र नायक कृष्ण के ये जीवन सूत्र आज भी पूर्ण प्रासंगिक हैं। उन्होंने हमें अनुशासन में जीने, व्यर्थ चिंता न करने और भविष्य की बजाय वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करने का मंत्र दिया है। वे हमें सिखाते हैं कि मुसीबत के समय या सफलता न मिलने पर हिम्मत नहीं हारनी चाहिए वरन हार की वजहों को जानकर पुन: प्रयास करना चाहिए। आज देश दुनिया के जाने माने मैनेजमेंट गुरु श्रीकृष्ण की इन्हीं सूत्रों पर अमल कर सफलता के पायदान चढ़ रहे हैं।
महामानवों की दृष्टि में योगेश्वर श्रीकृष्ण
बताते चलें कि देश के महान दार्शनिक श्री अरविंद को कारागार में श्रीकृष्ण के दर्शन हुए थे और उनका समूचा जीवन रूपान्तरित हो गया था। उनका कहना कि श्रीमद्भगवद्गीता मात्र एक धर्मग्रंथ न होकर एक सफल जीवनशैली है, जो हर उम्र को अलग संदेश और हर सभ्यता को अलग अर्थ समझाती है। दुनिया के जाने माने वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने भी कहा था कि श्रीकृष्ण के उपदेश अतुलनीय हैं। उनके चरित्र को जितना जानो उतना ही यह महसूस होता है कि इस धरा पर प्रेम का शाश्वत भाव वही हो सकता है, जो कृष्ण ने जिया है। उन्होंने जीवन में प्रेम को नवीन आयाम दिये। आजाद भारत में परमाणु ऊर्जा के जनक डा. होमी जहांगीर भाभा भी श्रीकृष्ण के विचारों से गहराई से प्रभावित थे। इसलिए उन्होंने श्रीकृष्ण को राष्ट्र के आदि पिता की संज्ञा दी थी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहा करते थे कि जब जब भी उन्हें कोई परेशानी ने घेरा; उसका समाधान उन्हें गीता के पन्नों में ही मिला। बापू की मानवीय सोच और जनकल्याण की भावना, उनका प्रकृति प्रेम व राष्ट्र व समाज की उन्नति की सोच कृष्ण से गहराई से प्रभावित है।
प्रकृति के प्रति गहरा अपनत्व
कृष्ण का जीवन प्रकृति के बहुत करीब रहा। प्रकृति के लिए उनके मन में जो अपनत्व दिखता है, वह आज भी समाज और राष्ट्र के सरोकारों से भी जोड़ने वाला है। कदम्ब का पेड़ और यमुना का किनारा उनका प्रिय स्थल था। वसुधैव कुटम्बकम के भाव को सही मायने में वासुदेव कृष्ण ने जिया। उन्होंने मनुष्यों और मूक पशुओं से ही नहीं, मोरपंख और बांसुरी से भी मन से प्रेम किया। कृष्ण ने किसी वस्तु को भी जड़ नहीं समझा। पेड़ पौधे हों या जीव जन्तु, वे सम्पूर्ण प्रकृति की चेतना से गहराई से जुड़े रहे। गायों की सेवा और पक्षियों के प्रति उनका प्रेम यह बताता है कि जीवन प्रकृति से ही जन्म लेता है और मां प्रकृति ही इसे विकसित और पोषित करती हैं।
कर्ममय जीवन के प्रबल समर्थक
कर्ममय जीवन के समर्थक कृष्ण जीवन को एक संघर्षों से भरा राजमार्ग बताते हैं। हम मानवीय मनोविज्ञान के आधार पर समझने की कोशिश करें तो पाएंगे कि अकर्मण्यता जीवन को दिशाहीन करने का बड़ा कारक है। श्रीकृष्ण की विशेषताएं उन्हें सच्चे अर्थों में लोकनायक के रूप में प्रतिष्ठित करती हैं। अगर हम अपने जीवन को सफल बनाना चाहते हैं और जिंदगी को बिना किसी तनाव और परेशानी से जीना चाहते हैं तो अपने जीवन में श्रीकृष्ण के सूत्रों को अमल करके देखिये; जीवन सफल और आनंदमय हो जाएगा।














