दशकों तक इस देश के आम जनमानस को एक झूठी लोरी सुनाई गई कि नक्सलवाद का मतलब केवल दंडकारण्य के बस्तर, दंतेवाड़ा, सुकमा, कांकेर या गढ़चिरौली के जंगलों में घूमते फटेहाल, अनपढ़ और बंदूकधारी लाल कैडर हैं। यह झूठ इसलिए परोसा गया क्योंकि आजादी के बाद एक लंबे समय तक नक्सलियों के हमदर्द सत्ता के शीर्ष पर बैठे थे, लेकिन गत 15 अगस्त को प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इस नकाब को नोच फेंका। जंगल का बंदूकधारी नक्सली तो केवल एक प्यादा है। असली वजीर, मास्टरमाइंड और कंट्रोल रूम तो शहरों के वातानुकूलित कमरों, नामचीन विश्वविद्यालयों, मानवाधिकार एनजीओ, कानूनी लीगल फ्रंट्स और वामपंथी मीडिया संस्थानों में बैठा ‘दिमागी नक्सली’ है।
शहर में बैठा दिमागी नक्सली अपनी कलम, वकीलों के नेटवर्क, अंतरराष्ट्रीय लॉबिंग और अपने जहरीले राजनीतिक व सामाजिक नेरेटिव से पूरी की पूरी पीढ़ी का दिमाग अपाहिज कर देता है। वह राज्यसत्ता के नैतिक आधार पर हमला करता है, न्यायपालिका की साख पर सवाल उठाता है और देश के टुकड़े-टुकड़े करने की पूरी वैचारिक व वित्तीय जमीन तैयार करता है। प्रधानमंत्री की यह चेतावनी इस बात का ऐलान समझना चाहिए कि भारत अब इस वैचारिक आतंकवाद को “अभिव्यक्ति की आजादी” के नाम पर सहन नहीं करेगा। यदि भारत को 2047 तक विकसित, अखंड और संप्रभु राष्ट्र बनना है, तो सबसे पहले इस दिमागी नक्सलवाद और इसके सहयोगियों की धज्जियां उड़ानी होंगी।
रणनीति, फंडिंग और विदेशी आका
दिमागी नक्सलवाद कोई अकेला या अलग-थलग पड़ा विचार नहीं है। यह भारत को भीतर से ध्वस्त करने के लिए रचा गया मुख्य वैचारिक इंजन है। कम्युनिस्ट नेता लेनिन ने एक सिद्धांत दिया था – “उपयोगी मूर्खों का इस्तेमाल करो और शत्रु को भीतर से तोड़ो।” इसी सिद्धांत पर काम करते हुए चार अलग-अलग और परस्पर विरोधी दिखने वाली ताकतें एक मंच पर आ खड़ी हुई हैं।
इसमें पहला घटक दिमागी नक्सल का बौद्धिक व कानूनी फ्रंट है, जिसका काम कहीं भी हो रही भारत विरोधी हिंसा को ‘सामाजिक आंदोलन’ का नकाब पहनाना है। ये विश्वविद्यालयों में छात्रों का ब्रेनवाश करते हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं में भारत की छवि खराब करते हैं। सामाजिक आर्थिक मानकों के फर्जी इंडेक्स गढ़ते हैं। आतंकियों को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक वकीलों की फौज खड़ी करते हैं। दूसरा घटक चर्च व कन्वर्जन सिंडिकेट है। इनका लक्ष्य भारत के जनजातीय क्षेत्रों, पूर्वोत्तर और तटीय इलाकों में तेजी से कन्वर्जन करा कर भारत की मूल सांस्कृतिक जड़ों को काटना है।
ये विदेशी एनजीओ फंडिंग के जरिए भारत की बड़ी-बड़ी औद्योगिक व ऊर्जा परियोजनाओं के खिलाफ फर्जी पर्यावरण आंदोलन खड़े करते हैं। तीसरा घटक जिहादी नेटवर्क है, जो सड़क की ताकत और हिंसा का फ्रंट संभालता है। पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई), सिमी के अवशेष और विभिन्न कट्टरपंथी गिरोह दिमागी नक्सलियों को कैडर मुहैया कराते हैं। शाहीन बाग से लेकर दिल्ली के दंगों तक, इस नेटवर्क ने दिखाया कि कैसे वामपंथी नैरेटिव और जिहादी हिंसा एक साथ मिलकर देश की राजधानी तक को बंधक बना सकते हैं। रक्तपात कर सकते हैं। चौथा घटक पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी (आईएसआई) और चीनी खुफिया तंत्र का विध्वंसक जाल है। आईएसआई नेपाल, बांग्लादेश और नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ के जरिये हवाला का पैसा, आरडीएक्स विस्फोटक व घातक हथियार और नकली नोट भेजती है। चीन म्यांमार सीमा के जरिये माओवादियों और पूर्वोत्तर के आतंकवादी गुटों को आधुनिक हथियार व वित्तीय सहायता देता है।
चार स्तरीय रणनीति
दिमागी नक्सली और उनके सहयोगी बहुत ज्यादा आपसी समन्वय से काम करते हैं। इनका बहुत संगठित, पेशेवर और चार-स्तरीय सुरक्षा चक्र है। इनकी इस रणनीति को चार भागों में समझिए।
पहला स्तर (जमीनी कार्रवाई)- सबसे पहले जमीनी स्तर पर हिंसा या अवैध गतिविधि को अंजाम दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर, बस्तर के किसी इलाके में नक्सलियों का एक गुट आईईडी धमाका करके सुरक्षा बलों को निशाना बनाता है, या फिर तटीय क्षेत्र में विदेशी फंडिंग की मदद से एक बड़ा चर्च खड़ा होता है, जो कन्वर्जन का रैकेट चलाता है, या फिर सीएए के नाम पर देश की राजधानी में सुनियोजित दंगा किया जाता है।
दूसरा स्तर (हिंसा पर कार्रवाई)- जैसे ही इस तरह की किसी राष्ट्रविरोधी गतिविधि पर केंद्रीय बल, सेना या पुलिस कोई कार्रवाई करती है, दूसरा स्तर एक्टिवेट हो जाता है। वैचारिक रूप से और मीडिया के इस्तेमाल से तुरंत बचाव तंत्र हरकत में आ जाता है। लुटियंस मीडिया, वामपंथी डिजिटल पोर्टल्स और विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर एक स्वर में चिल्लाने लगते हैं। सिनेमा अभिनेता तख्तियां लेकर खड़े हो जाते हैं। राजनीतिक आका सड़क से संसद तक शोर मचाने लगते हैं। अपराधी के मानवाधिकारों का ढोंग रचा जाता है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दलीलें दी जाती हैं। बराबरी के अधिकार की दुहाई दी जाती है। नतीजा यह कि खूंखार आतंकी को “गरीब मास्टर का बेटा” बना दिया जाता है। कोई भारत के टुकड़े करने का ख्वाब देने वाला “भटका हुआ कवि” बन जाता है। प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश रचने वाले ‘मानवाधिकार कार्यकर्ता’ और “जनजातीय अधिकारों का रक्षक” बनाकर प्रस्तुत किए जाते हैं।
तीसरा स्तर (कानूनी इंजन)- मीडिया, सोशल मीडिया पर माहौल बना देने के बाद, संवैधानिक अधिकारों का शोर मचा देने के बाद इस दानव का चौथा इंजन मैदान में उतरता है। इनके पास अरबों की फंडिंग का बैकअप होता है। जिन अपराधियों-राष्ट्रद्रोहियों के घर में खाने को रोटी तक नहीं होती, उनकी पैरवी के लिए हर पेशी पर लाखों की फीस लेने वाले वकीलों की फौज अदालतों में आ खड़ी होती है। जनहित याचिकाओं की बाढ़ ला दी जाती है।
चौथा चरण (राजनीतिक आका)- दिमागी नक्सलियों का ये गिरोह राजनीतिक ताकत भी बहुत रखता है। वामपंथी, या राष्ट्र व विकास विरोधी विचारधारा रखने वाले सारे दल इस मसले पर इन गिरोह के पीछे लामबंद हैं। संसद की कार्रवाई ठप हो जाती है। हाल ही में आपने देखा, एनजीओ को विदेशी सहायता पर लगाम लगाने वाला एफसीआरए संशोधन बिल जैसे ही तैयार हुआ, किन बहानों से राजनीतिक वितंडा खड़ा किया गया।
मुखौटों का जाल
दिमागी नक्सलवाद कभी खुलेआम भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के बैनर तले काम नहीं करता। इन्होंने समाज के हर वर्ग में घुसपैठ करने के लिए कानूनी और मासूम से दिखने वाले दर्जनों बेनामी संगठन बना रखे हैं। सीपीआई (माओवादी) इनका प्रतिबंधित मातृ संगठन है जो समूचे नक्सली नेटवर्क की रीढ़ और सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था है। इसके साथ क्रांतिकारी लोकतांत्रिक मोर्चा (आरडीएफ) जुड़ा है, जो कथित बुद्धिजीवियों, कवियों, लेखकों, पत्रकारों और छात्रों को माओवादी विचारधारा से जोड़ता है।
राजनीतिक बंदियों की रिहाई के नाम पर बना संगठन सीआरपीपी (कमेटी फॉर द रिलीज ऑफ पॉलिटिकल प्रिजनर्स) जेल में बंद खूंखार माओवादी कमांडरों और जिहादी आतंकियों की रिहाई के लिए कानूनी और वित्तीय संसाधन जुटाता है। इसी तरह आईएपीएल (इंडियन एसोसिएशन ऑफ पीपुल्स लॉयर्स) माओवादी वकीलों का गुप्त सिंडिकेट है। इसका काम देश भर की अदालतों में माओवादी कैडर या अपने हमदर्दों व साझीदारों का मुफ्त बचाव करना है। यह बहुत सुनियोजित तरीके से पुलिस जांच की सारी जानकारियां इस चौमुखे दानव के कंट्रोल रूम तक पहुंचाता है।
मानवाधिकारों के नाम पर चलने वाले पीयूसीएल (पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज) और सीडीआरओ (कोआर्डिनेशन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स ऑर्गेनाइजेशंस) जैसे संगठन बस इस ताक में बैठे रहते हैं कि सुरक्षा बल कहां कार्रवाई कर रहे हैं। तुरंत ये मानवाधिकारों, अल्पसंख्यकों या आदिवासियों पर अत्याचार का शोर मचाते हैं और जांच की मांग करते हैं। लेकिन जब जिहादी निर्दोष हिंदुओं का नरसंहार करते हैं या फिर नक्सली किसी गांव में गरीब आदिवासियों का गला रेतते हैं, तो इन्हें सांप सूंघ जाता है।
देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में सक्रिय छात्र संगठन आईसा (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन) और डीएसएफ (डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स फेडरेशन) स्कूलों से निकलकर आने वाले मासूम छात्रों को क्रांति के सपने दिखाकर दिमागी नक्सली के कैडर में तब्दील कर देते हैं। इसके अलावा पीएफआई (पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया) जिहादी नेटवर्क का वह संगठन था जो अर्बन नक्सलियों के साथ मिलकर देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों के लिए कैडर और सड़क-शक्ति मुहैया कराता था। पाबंदी के बाद इसके पदाधिकारी या कैडर अब अन्य समान विचारधारा के प्लेटफार्म में शामिल हो गए हैं। विदेश से मिलने वाले एफसीआरए (फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट) फंड पर चलने वाले पर्यावरणवादी एनजीओ मंच विदेश से पैसा मंगाकर भारत की विकास परियोजनाओं के खिलाफ कानूनी और मैदानी अड़ंगे लगाते हैं।
घिनौना सच
इस भस्मासुर के बहुत सारे चेहरे हैं। हम कुछ चेहरे आपको दिखाना चाहते हैं, जिससे आप इनसे मिलते-जुलते चेहरों को पहचान सकें। उनकी गतिविधियों को समझ सकें। ये वे लोग हैं जिनके खिलाफ देश की शीर्ष जांच एजेंसियों (एनआईए, आईबी, सीबीआई या ईडी) के पास अकाट्य सबूत हैं।
वरवरा राव- ‘विप्लव रचयिता जन नाट्य मंच’ का संस्थापक और माओवादी सेंट्रल कमेटी का शीर्ष रणनीतिकार रहा है। वह जंगलों में बैठे माओवादी कमांडरों और शहरों के दिमागी कैडर के बीच की मुख्य संवाद कड़ी था। एनआईए की जांच में साबित हुआ कि वरवरा राव ने तेलंगाना और महाराष्ट्र के युवाओं को माओवादी आतंकवादी बनाने के लिए भारी रकम का लेन-देन किया था।
फादर स्टेन स्वामी- झारखंड में सक्रिय जेसुइट पादरी था, जिसे दिमागी नक्सलों ने “80 साल का वृद्ध समाजसेवक” बनाकर पेश किया। वह माओवादी संगठन ‘परकास’ का संचालक था। स्टेन स्वामी चर्च सिंडिकेट तथा माओवादी सेंट्रल कमेटी के बीच के सबसे बड़ा वित्तीय पुल थे। उनके पास से बरामद पत्राचारों से खुलासा हुआ कि वह माओवादी कैडर को कानूनी मदद देने के नाम पर विदेशी एनजीओ से आए करोड़ों रुपए डायवर्ट करता था।
गौतम नवलखा- ‘पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स’ का पूर्व सचिव रहा। उसके तार पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के बेनामी एजेंट गुलाम नबी फाई से सीधे जुड़े पाए गए। नवलखा ने कश्मीर के जिहादी अलगाववादियों और बस्तर के माओवादियों का एक संयुक्त मोर्चा तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। यह है जिहादी और नक्सली गठजोड़ का स्टैंडर्ड टेस्ट केस।
आनंद तेलतुंबडे- इसका काम अकादमिक जगत में बैठकर “दलित-माओवादी गठजोड़” का वैचारिक ढांचा तैयार करना था। वह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में जाकर भारत के खिलाफ यह झूठा प्रचार करता था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह दुष्प्रचार की मशीनरी का हिस्सा था। यह झूठ फैलाता था कि भारतीय सत्ता दलितों और आदिवासियों का कत्लेआम कर रही है। उनके माओवादी पोलित ब्यूरो से सीधे संबंध पकड़े गए।
रोना विल्सन- माओवादी फ्रंट संगठन सीआरपीपी के जनसंपर्क सचिव था। उससे लैपटॉप से जब्त किए गए ईमेलों में राजीव गांधी जैसी घटना को दोहराते हुए भारत के प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश का खुलासा हुआ। इसके अलावा, रोना विलसन ने इस साजिश को अंजाम देने के लिए नेपाल के रास्ते आठ करोड़ रुपए में एम-4 राइफलें राइफल और 4 लाख कारतूस खरीदने की साजिश रची थी।
उमर खालिद- जेएनयू का पूर्व छात्र और ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग का मुख्य सूत्रधार। उमर खालिद नक्सल और कट्टरपंथी इस्लामिक जिहाद के गठजोड़ की सबसे ज्वलंत मिसाल है। उसने 2020 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा के दौरान दिल्ली को ठप करने और दंगे भड़काने की पूरी साजिश रची। दिल्ली दंगे की इस पूरी साजिश में नक्सल नेटवर्क की अहम भूमिका रही।
शरजील इमाम- आईआईटी मुंबई और जेएनयू का छात्र रहा है। उसका एक वीडियो पूरे देश ने देखा। इसमें उसने खुलेआम कहा था कि असम और पूर्वोत्तर को भारत से काटकर अलग करना होगा। जिसके लिए सिलीगुड़ी कॉरिडोर को पूरी तरह बंद करना होगा। यह सीधे तौर पर भारत की अखंडता पर हमला था। आज इसकी जमानत कराने के लिए पूरा दिमागी नक्सल इको-सिस्टम लगा हुआ है।
सुधा भारद्वाज- छत्तीसगढ़ में सक्रिय ट्रेड यूनियन नेता और वकील थीं। वह आईएपीएल की शीर्ष पदाधिकारी थी। एनआईए की चार्जशीट के अनुसार वह माओवादियों को पुलिस की आवाजाही, तैनाती, खुफिया जानकारियां तो उपलब्ध करा ही रही थी। इसके लिए वह नक्सलियों द्वारा ठेकेदारों से लेवी के रूप में वसूले गए करोड़ों रुपये को मनी लांड्रिंग के जरिये शहरी दिमागी नक्सल नेटवर्क में खपाने का काम करती थी।
अरुंधति रॉय- दिमागी नक्सलवाद का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय पोस्टर-फेस हैं। उन्होंने बस्तर के जंगलों में जाकर असाल्ट राइफल थामे खूंखार माओवादी हत्यारों पर किताब लिखी। हिम्मत देखिए कि अरुंधति राय ने इन्हें “बंदूकधारी गांधीवादी” करार दिया। इनके रक्तपात को अरुंधति ने अपनी स्याही से धोकर पवित्र करने की कोशिश की, कश्मीर में अलगाववादियों के मंच साझा करने से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को “फासीवादी” कहने तक, वह लगातार भारत-विरोधी नैरेटिव तैयार करने की कोशिश करती रहती हैं। ये दिमागी नक्सल जानते हैं कि भारत को सीधे युद्ध में हराना संभव नहीं।
इनके सरपरस्त चीन और पाकिस्तान भी ये जानते हैं। इसलिए हथौड़ा अब देश के अंदर से चल रहा है। ये जातीय विद्वेष चाहते हैं। ये जनजातीय समुदाय को मूल धारा से काटना चाहते हैं। चर्च सिंडिकेट के प्रलोभन और अवैध कन्वर्जन के जरिए आदिवासियों की मूल पहचान छीनने की साजिश पर काम हो रहा है। हर संवैधानिक संस्था, चाहे वह संसद हो या न्यायपालिका या फिर चुनाव आयोग। सुनियोजित तरीके से हमला किया जा रहा है। मुसलमानों और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की फर्जी कहानियां गढ़ी जा रही हैं। कभी जेनजी, कभी किसान, कभी मुसलमान, कभी मजदूर के नाम पर आग लगाने की साजिशें रची जा रही हैं।
जंगल से सरकार ने नक्सलियों का सफाया कर दिया है। अब शहरों में बचे इन दिमागी नक्सलियों के सफाये की जरूरत है, इसके लिए बहुआयामी जवाबी रणनीति जरूरी है। कानूनी जवाब की जरूरत है। जो बुद्धिजीवी, पत्रकार, वकील या नेता हिंसा का वैचारिक, मीडिया या कानूनी बचाव करते हैं, उन्हें कानूनन सह-अभियुक्त माना जाना चाहिए। हिंसा की प्रेरणा या हिंसा का संरक्षण भी हिंसा से कम बड़ा दोष नहीं है।
वित्तीय रीढ़ तोड़ने के लिए विदेशी धन से चलने वाले उन सभी एनजीओ, चर्च ट्रस्टों और वामपंथी थिंक-टैंकों का लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द किए जाएं। नए एफसीआरए कानून में इसका प्रावधान किया जा रहा है। नई पीढ़ी को इन दिमागी नक्सलों से बचाना है, तो अकादमिक जगत के वि-उपपनिवेशीकरण के तहत भारत के विश्वविद्यालयों से वामपंथी और नक्सली विकृतियों को पूरी तरह उखाड़ फेंकना होगा। हमारी नई पीढ़ी को यह बताना होगा कि भारत केवल एक जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक राष्ट्र है। जिहादी नेटवर्क पर कड़ा प्रहार हो ही रहा है। मतांतरण रोधी कानून के जरिए भय, प्रलोभन या प्रपंच से होने वाले धर्मांतरण को गैर-जमानती अपराध बनाने की दिशा में कई राज्य सरकारें कदम बढ़ा चुकी हैं। सरकार जो करेगी या कर रही है, वह कर रही है। कर्तव्य इस समय हर नागरिक का भी है। यह युद्ध केवल बंदूकों से नहीं, बल्कि विचार, जागरूकता, कड़े फैसलों और अटूट राष्ट्रीय संकल्प से जीता जाएगा। जब तक देश का प्रत्येक नागरिक इस दिमागी नक्सलवाद के असली चेहरों और इनकी कार्यप्रणाली को पहचानकर बेनकाब नहीं करता, तब तक यह खतरा बना रहेगा। पहचानिए इन्हें। इनकाे बेनकाब करिए।

















