भुवनेश्वर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर भुवनेश्वर महानगर के बौद्धिक विभाग की ओर से अनूठे संगीत कार्यक्रम ‘शत कंठे शताब्दी का स्वर’ का आयोजन किया गया। भुवनेश्वर स्थित बुद्ध मंदिर में आयोजित इस कार्यक्रम में 105 स्वयंसेवकों ने 100 से अधिक राष्ट्रभक्ति एवं संघ गीतों की प्रस्तुति देकर राष्ट्रप्रेम, समर्पण और सांस्कृतिक एकता की भावना को अभिव्यक्त किया।
कार्यक्रम में ओड़िया के साथ-साथ हिंदी, संस्कृत, बंगाली, असमिया, तेलुगु, मलयालम और पंजाबी सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं के गीत प्रस्तुत किए गए।
संघ के गीत राष्ट्रप्रेम के भाव जगाते हैं : पराग अभ्यंकर
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सेवा प्रमुख पराग अभ्यंकर ने कहा कि संगीत केवल स्वर और ताल का संयोजन नहीं है, बल्कि यह मन में भावनाओं को जागृत करने का प्रभावी माध्यम भी है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में गाए जाने वाले गीत केवल मनोरंजन या मन को प्रसन्न करने के लिए नहीं होते। इन गीतों के शब्द और उनमें निहित भाव स्वयंसेवकों के भीतर राष्ट्रप्रेम, समर्पण और मातृभूमि के प्रति सेवा की भावना को मजबूत करते हैं। संघ की शाखाओं में मातृभूमि भारत की आराधना की जाती है और स्वयंसेवक गीतों में व्यक्त भावों को आत्मसात करते हुए राष्ट्र के प्रति अपने समर्पण को निरंतर बढ़ाता है। उन्होंने कहा कि गीतों के माध्यम से लोगों के भीतर राष्ट्र के लिए कार्य करने की प्रेरणा उत्पन्न की जा सकती है।
एकाम्र क्षेत्र में ऐसा आयोजन अपने आप में अनोखा
पराग अभ्यंकर ने भुवनेश्वर के ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि एकाम्र क्षेत्र भगवान शिव की नगरी है और भारतीय परंपरा में भगवान शिव को संगीत का जनक माना जाता है। ऐसे में संघ के शताब्दी वर्ष के दौरान भुवनेश्वर महानगर के बौद्धिक विभाग द्वारा इस तरह का आयोजन किया जाना अपने आप में विशेष और अनूठा प्रयोग है। इस प्रकार की पहल को आगे किस तरह विस्तारित किया जाए और इसका लाभ समाज के निचले स्तर तक किस प्रकार पहुंचाया जाए, इस दिशा में भी विचार करने की आवश्यकता है।
उन्होंने भुवनेश्वर के स्वयंसेवकों के प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि संगीत के माध्यम से समाज के प्रत्येक हृदय में राष्ट्रसेवा की भावना को मजबूत करने के ऐसे प्रयास निरंतर जारी रहने चाहिए। उन्होंने कहा कि महाप्रभु लिंगराज की इस पवित्र धरती पर आयोजित यह पहल विशेष महत्व रखती है।
पांच महीने की तैयारी का परिणाम
कार्यक्रम के उद्घाटन अवसर पर संघ के ओडिशा (पूर्व) प्रांत के प्रांत बौद्धिक प्रमुख तन्मय महापात्र ने आयोजन की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि ‘शत कंठे शताब्दी का स्वर’ कार्यक्रम की तैयारी पिछले अप्रैल महीने से चल रही थी। इस अनूठे कार्यक्रम की मूल कल्पना संघ के बौद्धिक विभाग की अखिल भारतीय गीत टोली के सदस्य असित वरण महापात्र की थी। हालांकि वे कार्यक्रम में प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित नहीं हो सके, लेकिन बेंगलुरु में रहते हुए भी उन्होंने ऑनलाइन माध्यम से आयोजन की तैयारियों और इसे सफल बनाने में सहयोग किया। तन्मय महापात्र ने कहा कि भुवनेश्वर महानगर के बौद्धिक विभाग ने उनकी कल्पना को धरातल पर उतारने का कार्य किया।
बिना वाद्य यंत्रों के अभ्यास से लेकर मंच प्रस्तुति तक चुनौती
तन्मय महापात्र ने बताया कि संघ की शाखाओं में सामान्यतः स्वयंसेवक बिना वाद्य यंत्रों के गीत गाते हैं। इस कार्यक्रम में पहली बार स्वयंसेवकों ने वाद्य यंत्रों के साथ सामूहिक रूप से गीत प्रस्तुत किए। बिना वाद्य यंत्रों के अभ्यास करने वाले स्वयंसेवकों के लिए अचानक वाद्य यंत्रों के साथ प्रस्तुति देना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। भुवनेश्वर महानगर के स्वयंसेवकों ने इस चुनौती को सफलतापूर्वक पूरा किया। कार्यक्रम में सात वर्ष से लेकर 70 वर्ष तक की आयु के स्वयंसेवकों ने भाग लिया। उन्होंने कहा कि आयोजन के दौरान कई नए स्वयंसेवक भी इस संगीत अभियान से जुड़े।
आठ भारतीय भाषाओं में राष्ट्रभक्ति गीतों की प्रस्तुति
कार्यक्रम की विशेषता इसकी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता भी रही। स्वयंसेवकों ने ओड़िया के अलावा बंगाली, असमिया, तेलुगु, मलयालम, पंजाबी, हिंदी और संस्कृत सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं में गीत प्रस्तुत किए। इन गीतों को विभिन्न तालों और संगीत शैलियों के अनुरूप तैयार किया गया था। कार्यक्रम की संगीत संरचना और प्रस्तुतियों को तैयार करने में भुवनेश्वर महानगर के बौद्धिक प्रमुख अमरेंद्र साहू और उनके सहयोगी कलाकारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
कार्यक्रम की शुरुआत करीब 100 स्वयंसेवकों द्वारा ‘वंदे मातरम्’ के सामूहिक गायन से हुई। इसके बाद विभिन्न आयु वर्ग के स्वयंसेवकों और कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रभक्ति एवं संघ गीतों की प्रस्तुतियां दीं।
सामूहिक प्रयास को बताया प्रेरणादायक
तन्मय महापात्र ने कहा कि संघ के शताब्दी वर्ष में भुवनेश्वर महानगर के स्वयंसेवकों का यह सामूहिक प्रयास देशभर में अपनी तरह की एक अनूठी पहल है। उन्होंने इसे देश के अन्य स्वयंसेवकों के लिए भी प्रेरणादायक बताया।
कार्यक्रम का संचालन भुवनेश्वर महानगर सह-बौद्धिक प्रमुख अमरेंद्र साहू ने किया। आयोजन को सफल बनाने में खोरधा जिला बौद्धिक प्रमुख लाबण्येंदु दलई और कटक जिला बौद्धिक प्रमुख विघ्नेश्वर साहू ने सहयोग किया।
कार्यक्रम के दौरान विभिन्न भारतीय भाषाओं में प्रस्तुत गीतों ने राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक विविधता और राष्ट्रसेवा की भावना को प्रभावशाली ढंग से सामने रखा। शताब्दी वर्ष में आयोजित यह कार्यक्रम भुवनेश्वर महानगर के स्वयंसेवकों के सामूहिक प्रयास और संगीत के माध्यम से राष्ट्रभाव जागृत करने की पहल के रूप में सामने आया।

















