राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक पूज्य श्री कुप्पहली सीतारमैया सुदर्शन जी का जन्म छत्तीसगढ़ के रायपुर में 18 जून 1931 को श्री सीतारमैया के यहां हुआ। कर्नाटक के मंड्या जिले का गांव कुप्पहली उनका पैतृक निवास था। हालांकि उनके पूर्वज तमिलनाडु के संकेती के रहने वाले थे इसलिए उनकी मातृभाषा तमिल और तेलुगु मिश्रित शकैटी रही। उनके पूर्वज 250 वर्ष पूर्व तमिलनाडु से कर्नाटक चले गए थे।
पिता श्री सीतारमैया वन विभाग में कार्यरत थे तथा नौकरी के सिलसिले मध्यप्रदेश के अलग-अलग जिलों में पदस्थ रहे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा बैतूल, दमोह, रायपुर और मंडला आदि स्थानों पर हुई। आज के महाराष्ट्र का चंद्रपुर उस समय मध्य प्रदेश में ही हुआ करता था। अतः जब पिता चंद्रपुर में पदस्थ थे तब वहां के जुबली हाईस्कूल से उन्होंने अपनी हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। वह 1947-1948 में जबलपुर आ गए, यहीं रॉबर्ट्सगंज कॉलेज से इंटर की पढ़ाई पूर्ण की। उन्होंने टेली कम्युनिकेशन विषय में 1954 में बीई किया। अगले ही वर्ष उन्होंने प्रचारक जीवन में प्रवेश किया। श्रद्धेय श्री राम शंकर अग्निहोत्री जी जिला प्रचारक थे, उनके सम्पर्क में आकर वह संघ कार्य में सक्रिय हुए थे। जांजगीर चांपा सक्ति में तहसील प्रचारक एवं सागर में वह जिला प्रचारक रहे। सुदर्शन जी रीवा में विभाग प्रचारक भी रहे। उनके पास 1964 में मध्य भारत के प्रांत प्रचारक का दायित्व आया। 1969 में अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख बने। इस दौरान शस्त्र के बिना आत्मरक्षा व प्रहार की शैली नियुद्ध को उन्होंने शारीरिक कार्यक्रम में सम्मिलित करवाया। 1975 में आपातकाल की घोषणा हुई और पहले ही दिन इंदौर में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। पूरे 19 माह उन्होंने कारावास में बिताये। यहां उन्होंने अलग-अलग पंथ व मजहब के लोगों के साथ संवाद व अनेक पुस्तकों का अध्ययन किया।
पूर्वांचल और पंजाब में प्रवास
1977 में पूर्वांचल के क्षेत्र प्रचारक बने, वहां के समाज में वह इस तरह रम गए कि पूर्वोत्तर की कई भाषाएं उन्हें आने लगीं। यहां उन्होंने जनजातीय समाज के बीच हो रहे मतांतरण एवं देश में होने वाली घुसपैठ के कारणों पर व्यापक अध्ययन एवं विमर्श कर समाज व शासन को सचेत किया। उन्होंने जनजातीय समाज की आस्था की रक्षा हेतु उपाय बताए। इसी क्रम में जनजातीय क्षेत्रों में छात्रावास, विद्यालयों व सेवा प्रकल्प खड़े हुए। असम में रानी मां गाईदिन्ल्यू के साथ जगह-जगह उन्होंने प्रवास कर जनजातीय समाज में बढ़ते मतांतरण के विरुद्ध जनजागृति पैदा की।
90 के दशक में अशांत पंजाब में शांति की स्थापना में उनकी अग्रणी भूमिका रही। उन्होंने श्री गुरू ग्रंथ साहिब का अध्ययन ही नहीं गुरुवाणी के अनेक प्रसंग कंठस्थ किए और दूसरों को भी प्रेरित करते थे। उनके पास 1979 में अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख के दायित्व में आए। संघ के एकात्मता स्रोत को सर्वस्पर्शी व करोड़ों कंठों के लिए अनुकरणीय बनाने में उनके अनथक प्रवास महत्वपूर्ण रहे। 1990 में वह सरकार्यवाह के दायित्व में आए। उन्हें पूज्य प्रो. राजेंद्र सिंह जी के बाद 10 मार्च 2000 को आरएसएस के शीर्ष दायित्व सरसंघचालक की जिम्मेदारी मिली। उन्होंने 21 मार्च 2009 को इस पद से स्वयं निवृत्त होकर डॉ श्री मोहन भागवत जी को पूज्य सरसंघचालक का दायित्व सौंपा। पूज्य सुदर्शन जी पर्यावरण संरक्षण के प्रति बहुत सजग थे।
जैविक खेती के प्रबल पक्षधर
श्री सुदर्शन जी जैविक खेती के प्रबल पक्षधर थे। वहीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा तैयार संकर बीजों एवं आनुवांशिक रूप से रुपांतरित बीजों के नकारात्मक प्रभावों से शोधकर्ताओं को सचेत करते रहे। जीवाश्म ईंधनों के विकल्प बायोडीजल आदि के विकास हेतु हमेशा वैज्ञानिकों के साथ संवाद करते थे। दैनिक जीवन में जल और संसाधनों का कितना कम से कम उपयोग हो इसके लिए वह स्वयं एक अनुकरणीय उदाहरण थे। सरसंघचालक के दायित्व से मुक्त होने के पश्चात उनका केंद्र भोपाल हो गया, संघ कार्यालय की छत पर ही रासायनिक खादों से मुक्त सब्जियों की खेती (रूफटॉप फार्मिंग) की उन्होंने व्यवस्था विकसित की। उनकी बायपास सर्जरी होनी थी लेकिन लौकी के जूस के सेवन से स्वयं को स्वस्थ रखा।
गौ, ग्राम एवं कृषि आधारित व्यवस्था
वह गौ, ग्राम एवं क़ृषि आधारित अर्थव्यवस्था को मंगलकारी मानते थे। उनका तर्क था कि भारत को पोषणक्षम विकास की जगह पोषणक्षम उपयोग को वरीयता देनी चाहिए। अयोध्या में भगवान राम का भव्य मंदिर बनेगा, इसके समक्ष आने वाले सभी विघ्न दूर होंगे। ऐसे शाश्वत विचार से उन्होंने एक पूरी पीढ़ी को दिशा दी। एक युगदृष्टा के रूप में वह कहते थे 2011 से भारत का एक ऐसा उत्कर्ष प्रारंभ होगा जिसमें विश्व हमारी ओर समाधान की दृष्टि से देखेगा। आज यह चरितार्थ हो रहा है। वह प्राय: कहते थे कि भारतीय मनीषियों और भारत की एकात्मता के सभी तंतुओं जैसे महान् पर्वत, नदियों, तीर्थों,ऋषि मुनियों, संत हमारे लिए प्रात: स्मरणीय हैं। आज मुस्लिमों और ईसाई का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि उनके पूर्वज हिन्दू हैं बस उनकी इबादत का तरीका भिन्न है। इसके पीछे पूज्य सुदर्शन जी जैसे मनीषी हैं, जिन्होंने इस सत्य को कहने में कभी संकोच नहीं किया। वह मुस्लिमों व ईसाई को अल्पसंख्यक नहीं मानते थे, वह कहते थे कि सभी भारतीय पूर्वजों की संतान हैं।
श्री सुदर्शन जी ने नेत्रदान किया था, ऐसे में मानवीय लोक से प्रस्थान करने के उपरांत भी अंधकार को प्रकाशवान करते रहे। छत्तीसगढ़ उनकी जन्मभूमि थी और यह दैवीय संयोग ही था कि यहीं रायपुर में वह 15 सितंबर 2012 के दिन देवगति को प्राप्त हुए। एक कर्मयोगी के जीवन की यह प्रेरक यात्रा अनेक भावी पीढ़ियों में राष्ट्र कार्य का बोध जगाती रहेगी।

















