भारतीय खेल-इतिहास की जड़ें आधुनिक स्टेडियमों, खेल-संघों और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं से बहुत पहले की हैं। भारत में मल्लविद्या, अखाड़ा-संस्कृति, शारीरिक साधना, आहार, मर्दन, युद्ध-कौशल और गुरु-शिष्य परंपरा ने शरीर के साथ-साथ चरित्र-निर्माण की भी एक विशिष्ट परंपरा विकसित की। उत्तर गुजरात के पाटन जिले की चाणस्मा तहसील स्थित डेलमाल और उससे संबद्ध ज्येष्ठीमल्ल अथवा जेठी समाज इस विरासत का महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। ज्येष्ठी समाज की धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा अपनी मल्लविद्या की स्मृति भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सोमेश्वर ज्येष्ठी से जोड़ती है, जबकि संस्कृत ग्रंथ ‘मल्लपुराण’ मल्लविद्या को व्यायाम, आहार, मर्दन, अखाड़ा, प्रशिक्षण, स्वास्थ्य और मल्लयुद्ध की व्यवस्थित ज्ञान-परंपरा के रूप में सामने लाता है।
सांस्कृतिक स्मृति
ज्येष्ठी समाज द्वारा प्रकाशित साहित्य में मल्लविद्या की उत्पत्ति से संबंधित एक विस्तृत धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा मिलती है। इसके अनुसार कंस के मल्लों के वध के बाद भगवान श्रीकृष्ण और बलराम पश्चिम की ओर यात्रा करते हुए वर्तमान डेलमाल क्षेत्र में पहुंचे।
इसी प्रसंग में सोमेश्वर नामक युवा ज्येष्ठी ब्राह्मण का उल्लेख आता है। परंपरा के अनुसार श्रीकृष्ण ने सोमेश्वर को मल्लविद्या सीखने के लिए प्रेरित किया और सोमेश्वर ने उन्हें गुरु के रूप में स्वीकार कर यह विद्या प्राप्त की।
बलराम का युद्ध
प्रशिक्षण के बाद सोमेश्वर ज्येष्ठी और बलराम के बीच मल्लयुद्ध का प्रसंग आता है। बलराम असाधारण शारीरिक शक्ति और मल्ल-कौशल के प्रतीक माने जाते हैं। ऐसे प्रतिद्वंद्वी के सामने सोमेश्वर का उतरना उनके प्रशिक्षण और अर्जित कौशल की परीक्षा के रूप में प्रस्तुत होता है। समाज की प्रकाशित परंपरा में सोमेश्वर की विजय का वर्णन मिलता है। इस विजय को केवल शारीरिक शक्ति की जीत नहीं माना गया, बल्कि श्रीकृष्ण के गुरु-मार्गदर्शन, सोमेश्वर की साधना और अर्जित मल्लविद्या की सिद्धि का परिणाम माना गया।
खेल-संस्कृति की दृष्टि से इस कथा में खिलाड़ी-निर्माण का एक महत्वपूर्ण क्रम दिखाई देता है- गुरु, प्रशिक्षण, अभ्यास, प्रतियोगिता, प्रदर्शन, विजय और प्रतिष्ठा। सोमेश्वर की व्यक्तिगत उपलब्धि आगे चलकर पूरे ज्येष्ठी समाज की सामुदायिक पहचान में बदलती दिखाई देती है। परंपरा के अनुसार श्रीकृष्ण ने ज्येष्ठी ब्राह्मणों को मल्लविद्या में पारंगत रहने का वरदान दिया। इस प्रकार मल्लविद्या व्यक्तिगत कौशल से आगे बढ़कर पीढ़ीगत सामाजिक संस्कार और पहचान बनती है।
लंगोट, हल और मल्ल पहचान
ज्येष्ठी समाज की सांस्कृतिक स्मृति में भगवान बलराम से जुड़ा लंगोट और हल का प्रसंग भी महत्वपूर्ण है। परंपरा के अनुसार बलराम ने लंगोट और हल भेंट किए। भारतीय अखाड़ा-संस्कृति में लंगोट अनुशासन, संयम, अभ्यास और मल्लजीवन का प्रतीक माना जाता है, जबकि हल शक्ति, श्रम, भूमि और पुरुषार्थ से जुड़ा प्रतीक है। इसलिए इन दोनों वस्तुओं की भेंट केवल धार्मिक कथा का प्रसंग नहीं, बल्कि मल्लविद्या, श्रम और अनुशासन की सांकेतिक स्वीकृति के रूप में भी देखी जाती है। समाज की प्रकाशित परंपरा इस घटना को श्रावण सुद चौदस से जोड़ती है।
डेलमाल और जीवित विरासत
ज्येष्ठीमल्ल परंपरा का महत्वपूर्ण आयाम श्री लिंबजा माताजी की उपासना से जुड़ा है। डेलमाल स्थित श्री लिंबजा माताजी मंदिर को स्थानीय परंपरा और उपलब्ध सामुदायिक अभिलेखों में लगभग 1200 वर्ष पुराना माना जाता है। इस काल-निर्देश को स्वतंत्र पुरातात्विक तिथि के बजाय स्थानीय और सामुदायिक स्मृति के रूप में समझना अधिक उचित है। मंदिर की स्थापत्य-संपदा, कलात्मक स्तंभ, शिल्पांकित संरचनाएं और विस्तृत परिसर इसकी सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित करते हैं। डेलमाल में आस्था, स्थापत्य, समाज और मल्ल-संस्कृति एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। यहां शक्ति को केवल बाहुबल नहीं माना गया; उसके साथ श्रद्धा, संयम, आत्मनियंत्रण, गुरु के प्रति सम्मान और साधना भी जुड़ी है। इस दृष्टि से अखाड़ा और आराधना विरोधी नहीं, बल्कि एक ही जीवन-दृष्टि के दो पक्ष हैं।
मोढेरा से डेलमाल तक मल्ल परंपरा
ज्येष्ठीमल्लों के इतिहास में मोढेरा और डेलमाल दोनों का विशेष महत्व है। मोढेरा को ज्येष्ठीमल्ल परंपरा से जोड़कर देखा गया है। समाज के इतिहास में मोढेरा से डेलमाल की ओर ज्येष्ठी परिवारों के आने और यहां धार्मिक-सामाजिक परंपरा स्थापित करने का वर्णन है। इस प्रकार डेलमाल केवल निवास-स्थान नहीं रहा, बल्कि आस्था, सामाजिक स्मृति, मल्लविद्या और अखाड़ा-संस्कृति का केंद्र बनता गया। आज भी ‘जेठी नो अखाड़ो’ इस परंपरा की महत्वपूर्ण भौतिक स्मृति है। स्थानीय इतिहास-फलक मध्यकालीन घटनाओं से जुड़ी सामुदायिक स्मृतियों को भी संरक्षित करते हैं। इनमें कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में श्री लिंबजा माताजी की प्रतिमा को सुरक्षित रखने तथा ज्येष्ठीमल्लों द्वारा धार्मिक-सांस्कृतिक स्थलों की रक्षा करने की स्मृतियां मिलती हैं।
परंपरा की निरंतरता
डेलमाल के इतिहास में अकबर के काल से संबंधित लिखाजी ज्येष्ठी का प्रसंग भी मिलता है। स्थानीय प्रकाशित परंपरा में सत्ता और डेलमाल से जुड़े विवाद के संदर्भ में मल्लविद्या और शारीरिक सामर्थ्य की परीक्षा का वर्णन है। लिखाजी ज्येष्ठी को समाज की प्रतिष्ठा का प्रतिनिधि बताया गया है और उनके असाधारण बल तथा मल्ल-कौशल से जुड़े प्रसंग संरक्षित हैं। ज्येष्ठी समाज की सामूहिक स्मृति में लिखाजी का महत्वपूर्ण स्थान है। यदि सोमेश्वर ज्येष्ठी मल्लविद्या के सांस्कृतिक आरंभ के प्रतीक हैं, तो लिखाजी ज्येष्ठी बाद की पीढ़ियों में उसी परंपरा की निरंतरता और सामर्थ्य के प्रतीक बनकर सामने आते हैं।
परंपरा का व्यवस्थित ज्ञान
ज्येष्ठीमल्ल समाज की विशेषता यह है कि उसकी सामुदायिक स्मृति के साथ एक व्यवस्थित ग्रंथ-परंपरा भी उपलब्ध है। इसका सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘मल्लपुराण’ है। 1964 में बड़ौदा के ओरिएंटल इंस्टीट्यूट ने इसका आलोचनात्मक संस्करण Mallapurāṇa: A Rare Sanskrit Text on Indian Wrestling especially as practised by the Jyeṣṭhimallas शीर्षक से प्रकाशित किया। इसका संपादन भोगीलाल जयचंदभाई सांदेसरा और रमणलाल नागरजी मेहता ने किया। उपलब्ध पांडुलिपियों में पुणे स्थित भांडारकर प्राच्यविद्या मंदिर की एक पांडुलिपि संवत् 1731, अर्थात् लगभग 1674-75 ई. की नकल के रूप में दर्ज है।
इससे यह अंतर समझना आवश्यक है कि किसी उपलब्ध पांडुलिपि की तिथि और मूल ग्रंथ की रचना-तिथि एक ही बात नहीं होती। 2021 में डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू’ द्वारा संपादित एवं अनूदित ‘श्रीमल्लपुराणम् अर्थात् व्यायामविज्ञान’ प्रकाशित हुआ। ‘व्यायामविज्ञान’ के रूप में मल्लपुराण का पुनर्पाठ इसे केवल कुश्ती के दांव-पेचों के ग्रंथ के बजाय भारतीय व्यायाम और शारीरिक प्रशिक्षण की संगठित ज्ञान-परंपरा के रूप में देखने की दिशा देता है। इसकी भूमिका में राजदरबारों में मल्लों की उपस्थिति, सैन्य और शारीरिक प्रशिक्षण तथा ‘मानसोल्लास’ जैसे ग्रंथों में मल्लविनोद के उल्लेख की ओर भी संकेत मिलता है।
खिलाड़ी-निर्माण की समग्र व्यवस्था
मल्लपुराण का महत्व इस बात में है कि वह केवल प्रतिद्वंद्वी को पराजित करने की तकनीक पर केंद्रित नहीं है। वह मल्ल के पूरे जीवन को प्रशिक्षण की प्रक्रिया का हिस्सा मानता है-व्यायाम कितना हो, कौन-सा अभ्यास किस अवस्था में उपयोगी है, आहार कैसा हो, मर्दन का क्या महत्व है, विश्राम कब आवश्यक है, अखाड़े की भूमि कैसी हो और मल्लयुद्ध की तैयारी किस प्रकार की जाए। इस दृष्टि से खिलाड़ी प्रतियोगिता के दिन नहीं बनता; उसकी तैयारी दैनिक जीवन, अभ्यास, आहार, विश्राम और अनुशासन की संयुक्त प्रक्रिया से होती है।
मल्लपुराण में मल्लों की विभिन्न श्रेणियों और उनकी शारीरिक विशेषताओं की चर्चा भी मिलती है। आयु, बल, शरीर, अभ्यास और क्षमता के अनुसार प्रशिक्षण अलग हो सकता था। स्तंभ, गदा, भार तथा विभिन्न श्रम-अभ्यासों के माध्यम से शरीर के अलग-अलग गुण विकसित किए जाते थे। मल्ल को केवल विशाल शरीर नहीं, बल्कि शक्ति, सहनशक्ति, चपलता, संतुलन, गति और शरीर पर नियंत्रण की आवश्यकता थी।
इस प्रकार भारतीय मल्लविद्या बहुआयामी शारीरिक विकास की परंपरा थी। अखाड़ा भी केवल मिट्टी का मैदान नहीं था। वह प्रशिक्षण केंद्र, गुरु-शिष्य शिक्षा-स्थल, अनुशासन का विद्यालय, सामाजिक केंद्र और चरित्र-निर्माण की संस्था था। डेलमाल का ‘जेठी नो अखाड़ो’ इस ऐतिहासिक परंपरा को प्रत्यक्ष भौतिक संदर्भ प्रदान करता है और इसके व्यवस्थित खेल-विरासत दस्तावेजीकरण की आवश्यकता सामने आती है।
शक्ति के साथ मर्यादा और संतुलन
मल्लपुराण में मल्लयुद्ध के प्रकार, पकड़, तकनीक और प्रतियोगिता से जुड़े निर्देश मिलते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि मल्लयुद्ध अनियंत्रित बल-प्रयोग नहीं था। उसमें प्रशिक्षण, तकनीक, प्रतिद्वंद्वी, नियम, प्रतियोगिता और विजय की सामाजिक मान्यता का स्थान था। विजयी मल्ल की प्रतिष्ठा उसके गुरु और समुदाय से भी जुड़ती थी। इसलिए शक्ति के साथ मर्यादा और सामाजिक उत्तरदायित्व भी इस परंपरा का भाग था। मल्ल प्रशिक्षण की एक परिपक्व विशेषता यह भी थी कि अधिक अभ्यास को हमेशा श्रेष्ठ नहीं माना गया। व्यक्ति की क्षमता के अनुरूप अभ्यास और अत्यधिक श्रम से होने वाले नुकसान की समझ दिखाई देती है। इसी तरह भोजन और स्वास्थ्य का संबंध भी मल्ल जीवन में महत्वपूर्ण था। बाद की मल्ल-परंपराओं में पौष्टिक और अनुशासित भोजन पहलवान के जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा।
डेलमाल का महत्व
ज्येष्ठीमल्ल परंपरा भारतीय खेल-इतिहास के कई महत्वपूर्ण आयामों को सामने लाती है। यह बताती है कि भारत में खेल और शारीरिक संस्कृति की जड़ें आधुनिक संस्थागत खेलों से कहीं पुरानी हैं। समुदायों ने शारीरिक ज्ञान को पीढ़ियों तक संरक्षित किया; मल्लविद्या में प्रतियोगिता के साथ आहार, व्यायाम, विश्राम, अनुशासन और चरित्र शामिल थे; और अखाड़ा केवल खेल का मैदान नहीं, बल्कि सामाजिक तथा शैक्षणिक संस्था भी था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय खेल इतिहास को केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि गांवों, मंदिरों, अखाड़ों और जीवित समुदायों में भी खोजने की आवश्यकता है।
मल्लपुराण और डेलमाल की परंपरा मिलकर भारतीय शारीरिक संस्कृति की एक व्यापक तस्वीर प्रस्तुत करती है। समाज की सांस्कृतिक स्मृति इस यात्रा को श्रीकृष्ण, बलराम और सोमेश्वर ज्येष्ठी से जोड़ती है; श्रीकृष्ण का वरदान मल्लविद्या को सामुदायिक पहचान देता है; बलराम का लंगोट और हल उसे प्रतीक प्रदान करते हैं; श्री लिंबजा माताजी उसकी आराध्य शक्ति बनती हैं; मोढेरा और डेलमाल उसे भूगोल देते हैं; अखाड़ा अभ्यास और अनुशासन का स्थल बनता है; और मल्लपुराण इस परंपरा को व्यवस्थित ज्ञान का स्वरूप प्रदान करता है।
अंततः ज्येष्ठीमल्ल परंपरा को केवल किसी एक समुदाय की कुश्ती की कहानी के रूप में सीमित करना उचित नहीं होगा। यह भारतीय शारीरिक संस्कृति और खेल-विरासत का महत्वपूर्ण अध्याय है। आवश्यकता केवल गौरवगान की नहीं, बल्कि इस इतिहास को स्रोतों के आधार पर समझने, शोधित करने, दस्तावेजीकृत करने और संरक्षित करने की है। डेलमाल जैसे स्थलों, ‘जेठी नो अखाड़ो’, मंदिरों, इतिहास और सामुदायिक साहित्य को भारतीय खेल-विरासत के व्यापक अध्ययन से जोड़ना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
















