'स्मैश द पेट्रियार्की' का नारा और शाहबानो पर राहुल गांधी की चुप्पी, आखिर दोहरे मापदंड क्यों?
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‘स्मैश द पेट्रियार्की’ का नारा और शाहबानो पर राहुल गांधी की चुप्पी, आखिर दोहरे मापदंड क्यों?

‘स्मैश द पेट्रियार्की’ बोलते समय राहुल गांधी ने स्वयं के परिवार का भी अध्ययन नहीं किया! यदि भारत में पितृसत्ता होती तो क्या इंदिराजी प्रधानमंत्री होती?

Written byडॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानीडॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी
Aug 26, 2026, 08:01 pm IST
inविश्लेषण
Rahul Gandhi

राहुल गांधी

इधर ‘स्मैश द पेट्रियार्की’ बोलो और उधर शाहबानों को जिंदा दफना दो । निर्मल, पवित्र, ऐतिहासिक और भारतप्रिय ‘राष्ट्रगीत – वंदेमातरम्’ के पूर्ण गान से इंकार करके ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ करने वाले राहुल गांधी से अब यही आशा थी। पिछले सप्ताह ‘राष्ट्रगीत – वंदे मातरम्’ के विरोध में कांग्रेस वर्किंग कमेटी में प्रस्ताव पारित कराया और इस सप्ताह उन्होंने छात्रों से संवाद के बहाने फिर मुस्लिम तुष्टिकरण कर सनातन पर चोट कर दी।

सनातन नित नूतनता के साथ आगे बढ़ता है। यदि ऐसा नहीं होता तो क्या हम आज कई सामाजिक बुराइयों से घिरे नहीं होते? इसके लिए सुधार आंदोलन नहीं करना पड़ा न कोई प्रपंच करना पड़ा। हिंदुत्व का स्वमेव मंथन हुआ और बुराइयां छूटती चली गईं। आगे भी ऐसा ही होगा।

मुस्लिम आक्रांता बने बाधा

मुस्लिम आक्रांताओं के भय से हिंदू समाज ने पर्दा प्रथा अपनाई, रात्रि में विवाह करने का चलन चला। हिंदू स्त्री शिक्षा में भी ये मुस्लिम आक्रांता ही बाधा बने थे। समय आने पर हम सनातनियों ने इन बुराइयों को उखाड़ भी फेंका है। आज हिंदू महिलाएं अंतरिक्ष से भी अपने परिवार का नेतृत्व करती हैं। वस्तुतः पितृसत्ता और मातृसत्ता शब्द ही विदेशी हैं। हिंदू ‘परिवार संस्था’ ने कोई भेद ही नहीं रखा है। स्त्री-पुरुष का समग्र चिंतन अर्थात् मनुष्य का चिंतन ही हमारी परंपरा रही है।

राहुल गांधी क्या इंदिराजी को भूल गए

‘स्मैश द पेट्रियार्की’ बोलते समय राहुल गांधी ने स्वयं के परिवार का भी अध्ययन नहीं किया! यदि भारत में पितृसत्ता होती तो क्या इंदिराजी प्रधानमंत्री होती? राहुल गांधी सहित सभी राजनेताओं को राजनैतिक मंचों से हिंदू ग्रंथों, सभ्यता और सांस्कृतिक परंपराओं टिप्पणी करते समय सावधान रहना चाहिए। क्या ये नेता ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ के लिए कुछ भी कहते और करते चले जाएंगे?!

पेट्रियार्की अर्थात् पितृसत्ता पर राहुल पुणे में बहुत बोले। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि पितृसत्ता को खत्म करना है। ‘स्मैश द पेट्रियार्की’ (Smash the patriarchy) का नारा दिया। ‘यत्र नारी पूजयन्ते रमंते तत्र देवताः’ वाले हमारे देश में ‘राहुल गांधी’ को और विशेषतः कांग्रेस को तो यह बात करने का कतई अधिकार नहीं है। पेट्रियार्की का सर्वाधिक ज्वलंत उदाहरण शाहबानो प्रकरण है। राहुल गांधी हिजाब, पर्दा प्रथा, बुर्के पर कुछ नहीं बोलते। क्या वह शाहबानो प्रकरण में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा नए सिरे से स्थापित पेट्रियार्की को चुनौती देंगे। प्रगतिशील विचारों के धनी कहलाने वाले, विदेश में पले-बढ़े राजीव गांधी ने शाहबानो प्रकरण में संसद में प्रस्ताव पारित करके ‘मुस्लिम स्त्रियों’ पर कई सदियों की पेट्रियार्की एक झटके में लाद दी थी।

निकाह पर चुप्पी

राहुल जी पेट्रियार्की पर बोलते समय मुस्लिम समाज में एक से अधिक निकाह के अधिकार पर एक शब्द न बोले। मुस्लिम महिला के सीमित पैतृक विरासत के अधिकार पर भी नहीं बोले। मुस्लिम विधवाओं और तलाकशुदा महिला के संपत्ति अधिकार और गुजारा भत्ते पर बोलने का भी साहस नहीं जुटा पाए। विश्व में कई ऐसे मुस्लिम बहुल शरिया से चलने वाले देश हैं जो ‘एक बीबी’ के नियम को अपना चुके हैं फिर भारत में मुस्लिमों को चार निकाह का अधिकार क्यों है? क्या राहुल इसे नहीं देख पा रहे हैं?

कई मुस्लिम बहुल देश हैं जिन्होंने बुर्का, हिजाब, पर्दे को ‘कुरान सम्मत’ नहीं बताते हुए उसे खारिज कर दिया है। राहुल गांधी के ‘स्मैश द पेट्रियार्की’ में हिजाब, बुर्का क्यों नहीं आता है? दो-तीन वर्ष पूर्व भारत में कर्नाटक से ‘हिजाब विरोध’ की सार्थक बयार बहना प्रारंभ हुई थी। तब भी राहुल गांधी कुछ नहीं बोले थे। कर्नाटक में कांग्रेस शासन के आते ही विद्यालयों में मुस्लिम बालिकाएं विवशता में हिजाब, नकाब, बुर्का पहनकर ही आती हैं! यहाँ पर राहुल जाएं और हिजाब को हवा में उछालकर ‘स्मैश द पेट्रियार्की’ बोलें, तब बात समझ में आती है।

दोहरे मापदंड सही नहीं

दोहरे मापदंडों से राजनीति मत करिए! लड़के गाली देते हैं, यह गलत बात है, उन्हें रोकिए। राहुल जी लड़कियों को भी गालियां देने के लिए उकसा रहे हैं? भारत की सभ्यता वेदों, उपनिषदों, पुराणों, रामायण-महाभारत, बौद्ध-जैन-सिख दर्शन, लोक-संस्कृतियों और असंख्य सामाजिक अनुभवों से बनी एक विशाल सभ्यतागत धारा है। यदि भारतीय संस्कृति में केवल स्त्री-दमन ही होता, तो गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदूषियों की परंपरा कैसे विकसित होती? वेदों में स्त्रियों के विद्वतापूर्ण संवादों का उल्लेख कैसे मिलता? हिंदू विवाह के तो नियम और संहिता ही मातृशक्ति ने लिखे हैं।

भारतीय समाज में रूढ़ियां थीं। किंतु किसी सभ्यता का मूल्यांकन उसके आत्मसुधार की क्षमता से भी किया जाना चाहिए। भारत ने समय-समय पर अपने भीतर से सुधारकों को जन्म दिया और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध सफल संघर्ष किया है।

किसी ग्रंथ की कालबाह्य (चलन से बाहर) चुनिंदा पंक्तियों को लेकर उसे संपूर्ण हिंदू समाज की मानसिकता घोषित कर देना पक्षपात है। यह हिंदू विरोध है। भारतीय संस्कृति को स्त्री-विरोधी बताकर राजनैतिक लाभ प्राप्त करने का प्रयास ‘दिमागी नक्सल’ है। राहुल गांधी ने पुणे के कार्यक्रम में महिलाओं को भारत की बड़ी शक्ति बताया और उनकी स्वतंत्र पहचान की वकालत की। यह बात स्वागत योग्य है। लेकिन जब इसी विमर्श के साथ भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं को संदेह की दृष्टि से प्रस्तुत किया जाता है, तब प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने के बजाय उनसे दूर करने का प्रयास किया जा रहा है?

अपनी सभ्यता पर है गर्व

आज भारत का युवा अपनी पहचान को लेकर सजग है। वह विज्ञान और तकनीक में आगे बढ़ना चाहता है, लेकिन अपनी सभ्यता पर गर्व भी करना चाहता है। उसे महिला-पुरुष समानता चाहिए, लेकिन इसके लिए उसे अपनी संस्कृति से घृणा करना स्वीकार्य नहीं है। राहुल गांधी का महिला-समानता का संदेश तनिक सुनने योग्य हो सकता था यदि वह हिंदू-मुस्लिम दोनों के समान संदर्भों में कहा जाता। किंतु, भारतीय संस्कृति को संदेह के घेरे में रखकर दिया गया संदेश स्वीकार्य नहीं हो सकता। भारतीय हिंदू संस्कृति इतनी कमजोर नहीं कि उसे आधुनिकता के लिए त्यागना पड़े, और आधुनिकता इतनी संकीर्ण नहीं कि वह भारतीयता के साथ चल न सके। राजनीति को समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान करना चाहिए, सांस्कृतिक आत्महीनता पैदा नहीं करनी चाहिए। भारत की संस्कृति पर प्रहार करके आधुनिकता नहीं आएगी; अपनी जड़ों को समझकर, विवेक से सुधार करके और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़कर ही नया भारत बनेगा।

Topics: राहुल गांधीहिंदू समाजभारतीय संस्कृतिमुस्लिम समाजमुस्लिम आक्रांतास्मैश द पेट्रियार्कीशाहबानो प्रकरण
डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी
डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी
मूलतः मध्य प्रदेश के बैतूल से हैं. छह पुस्तकों का लेखन एवं दो पुस्तकों का संपादन. 'जनसंख्या असंतुलन एक चुनौती' एवं 'कांग्रेस मुक्त भारत की अवधारणा' विशेष तौर पर चर्चित. कविता संग्रह 'स्वप्न ही तो है कविता', साहित्य अकादमी से सम्मानित. विदेश मंत्रालय भारत सरकार में सलाहकार, छिंदवाड़ा यूनिवर्सिटी में कार्य परिषद् सदस्य रह चुके हैं. [Read more]
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