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विभाजन की विभीषिका : पूर्वोत्तर पर बंटवारे की चोट

पूर्वोत्तर भारत के लिए 1947 का बंटवारा सिर्फ सीमा बदलने की घटना नहीं था, बल्कि इससे क्षेत्र की जनसांख्यिकी, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा की तस्वीर बदल गई। आज भी इसके प्रभाव पूर्वोत्तर की पहचान, घुसपैठ, उग्रवाद और विकास की चुनौतियों में दिखाई देते हैं

Written byहिमेंद्र कुमारहिमेंद्र कुमार
Aug 22, 2026, 08:58 am IST
inभारत

स्वतंत्रता के बाद हुए भारत के बंटवारे ने उपमहाद्वीप के भूगोल, समाज और अर्थव्यवस्था को स्थायी रूप से बदल दिया। पंजाब के विभाजन की त्रासदी जितनी व्यापक रूप से चर्चित रही, उतनी ही गहरी और दूरगामी समस्या बंगाल के विभाजन ने भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र पर डाली। असम, त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम और आसपास के क्षेत्र, जो पहले पूर्वी बंगाल, बर्मा और शेष भारत से सहज ढंग से जुड़े हुए थे, अचानक एक नई अंतरराष्ट्रीय सीमा पूर्वी पाकिस्तान (बाद में बांग्लादेश) से घिर गए।

इस विभाजन का प्रभाव केवल सीमा-रेखा खींचने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने भूमि उपयोग, जनसंख्या संरचना, व्यापारिक मार्गों, सांस्कृतिक जुड़ाव और सुरक्षा परिदृश्य को मौलिक रूप से बदल दिया। आज, लगभग आठ दशक बाद भी, उस बंटवारे की छाया पूर्वोत्तर भारत की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने पर स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इन ऐतिहासिक घटनाओं की जड़ें आज की समस्याओं, घुसपैठ, उग्रवाद, आर्थिक विषमता और सीमा सुरक्षा की चुनौतियों में किस प्रकार गहराई से जमी हुई हैं।

विभाजन की प्रक्रिया

विभाजन की योजना, जिसे माउंटबेटन योजना (3 जून योजना) के नाम से जाना जाता है, में यह तय हुआ कि बंगाल और पंजाब जैसे मिश्रित-आबादी वाले प्रांतों का विभाजन स्थानीय मतदान के आधार पर होगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बंगाल का एक हिस्सा पश्चिम बंगाल के रूप में भारत में जुड़ा, जबकि पूर्वी बंगाल पाकिस्तान का हिस्सा बना और आगे चलकर 1971 में स्वतंत्र बांग्लादेश बना।

असम के संदर्भ में स्थिति विशेष रूप से जटिल थी। असम का सिलहट जिला, माउंटबेटन योजना के अंतर्गत एक अलग जनमत संग्रह के दायरे में रखा गया। जुलाई 1947-परिणामस्वरूप, सिलहट असम से अलग होकर पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा बन गया, जबकि करीमगंज उपखंड जैसे क्षेत्रों को रैडक्लिफ आयोग की सीमा-रेखा के आधार पर भारत के साथ रखा गया। रैडक्लिफ रेखा, जिसे सिरिल रैडक्लिफ ने मात्र कुछ सप्ताहों में, बिना पर्याप्त भौगोलिक और जनसांख्यिकीय अध्ययन के खींचा, ने बंगाल और भारत की प्राकृतिक भौगोलिक इकाई को छिन्न-भिन्न कर दिया। नदियों, रेल पटरियों, सड़कों और यहां तक कि गांवों के बीच से यह सीमा-रेखा गुजरी, जिससे एक ऐसा भूगोल बना जिसमें आर्थिक और सामाजिक तर्क की जगह राजनीतिक मजबूरी हावी हो गई। आने वाले दशकों में पूर्वोत्तर भारत को झेलने पड़े।

मुस्लिम आबादी हुई बहुसंख्यक

पंजाब की तरह पूर्वी सीमा पर बड़े पैमाने की हिंसक हलचल तात्कालिक रूप से नहीं हुई, परंतु शरणार्थियों का प्रवाह दशकों तक निरंतर चलता रहा। सांप्रदायिक तनाव, आर्थिक असुरक्षा और बाद में 1950, 1964 और 1971 की सांप्रदायिक व राजनीतिक उथल-पुथल की घटनाओं के कारण पूर्वी पाकिस्तान से लाखों शरणार्थी असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल की ओर पलायन करते रहे। त्रिपुरा में इस प्रवास का प्रभाव सबसे नाटकीय रहा। 1941 की जनगणना में त्रिपुरा की जनजातीय आबादी लगभग साठ प्रतिशत से अधिक थी, परंतु शरणार्थियों के लगातार आगमन के कारण अगले कुछ दशकों में यह अनुपात पूरी तरह उलट गया और बंगाली मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक हो गई। इस जनसांख्यिकीय परिवर्तन से त्रिपुरा की मूल जनजातियों में असुरक्षा का कारण बनी।

जब विभाजन की चर्चा बढ़ने लगी, तब असम में भी विभाजन के पूर्व से इस प्रकार की नीति लाई जाने लगी, जिससे मुस्लिम जनसंख्या बढ़ सके, ताकि असम को पूर्वी पाकिस्तान में लिया जा सके। उदाहरण के तौर पर देखें तो 1940 के दशक की Grow More Food (अधिक अन्न उपजाओ) नीति – पूर्वी बंगाल से मुसलमान कृषि-श्रमिकों को खेती के लिए बुलाना और भूमि व व्यवस्था प्रदान कराना इस नीति का मूल उद्देश्य था। क्योंकि मुस्लिम लीग का असम को पूर्वी पाकिस्तान में मिलाने का उद्देश्य स्पष्ट था, विभाजन के बाद यह प्रवाह मजहबी और आर्थिक कारणों से और तेज हो गया। पूर्वी बंगाल के मुस्लिम मुख्यतः बराक घाटी और निचले असम में बसे, मुस्लिम घुसपैठियों की एक धारा लगातार सीमा पार करती रही। यह प्रक्रिया इतनी संवेदनशील बन गई कि आगे चलकर 1979-1985 के ‘असम आंदोलन’ का प्रमुख आधार ही ‘विदेशी घुसपैठियों’ की पहचान और निष्कासन की मांग बनी।

जनसंख्या के इस बड़े स्थानांतरण ने पूर्वोत्तर के निवासियों, चाहे वे असमिया हों या विभिन्न समुदाय, सभी की भाषिक और सांस्कृतिक पहचान को प्रभावित किया। बड़ी संख्या में घुसपैठ होने पर असम में तनाव उत्पन्न हुए, जिसकी परिणति 1960 के दशक के भाषा आंदोलन और बाद में विभिन्न जातीय संघर्षों में हुई। इसी प्रकार त्रिपुरा और मेघालय में भी समुदायों को अपनी सांस्कृतिक पहचान और भूमि अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ा।

ब्रिटिशों की चाल

ब्रिटिश सरकार की एक बड़ी चाल यह थी कि भारत के विभिन्न भागों को अलग-अलग बांटने के लिए उन्होंने ‘ग्रुपिंग सिस्टम’ योजना बनाई। उन्होंने यह योजना कांग्रेस के प्रतिनिधियों के सामने रखी। उन्हीं दिनों 6 जुलाई और 7 जुलाई को मुंबई में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। कांग्रेस ने योजना पर विचार किया और दुःख की बात यह है कि कांग्रेसी नेता ब्रिटिश सरकार की चाल को समझ नहीं पाए और उन्होंने योजना के लिए स्वीकृति दे दी। गोपीनाथ बोरदोलोई इस योजना के सर्वथा विरुद्ध थे।

उनका कहना था कि असम के सम्बन्ध में जो भी निर्णय किया जाएगा अथवा उसका जो भी संविधान बनाया जाएगा, उसका पूरा अधिकार केवल असम की विधानसभा और जनता को होगा। वे अपने इस निर्णय पर डटे रहे। उनकी इसी दूरदर्शिता के कारण असम इस षड्यंत्र का शिकार होने से बच सका। इस प्रकार असम भारत का अभिन्न अंग बना रहा। यही कारण है कि भारत और असम के लोग उनके इस महत्त्वपूर्ण कार्य को समझ सके। असम के लोग गोपीनाथ बोरदोलोई को शेर-ए-असम के नाम से पुकारते हैं।

1947 का विभाजन केवल एक राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि यह पूर्वोत्तर भारत के लिए एक ऐसा भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक भूकंप था जिसके झटके आज, आठ दशक बाद भी, महसूस किए जा सकते हैं। भूमि का बंटवारा, शरणार्थियों का सतत प्रवाह, व्यापारिक मार्गों का टूटना, और शेष भारत से भौगोलिक कटाव इन सभी ने मिलकर पूर्वोत्तर की एक ऐसी विशिष्ट परिस्थिति गढ़ी, जिसे समझे बिना क्षेत्र की वर्तमान चुनौतियों, चाहे वह घुसपैठ उग्रवाद हो या आर्थिक पिछड़ापन, को सही संदर्भ में नहीं समझा जा सकता।

Topics: विभाजन की विभीषिकाअवैध घुसपैठपाञ्चजन्य विशेषअसम आंदोलनगोपीनाथ बोरदोलोईरैडक्लिफ रेखा
हिमेंद्र कुमार
हिमेंद्र कुमार
संशोधक, पूर्वोत्तर अध्ययन केंद्र, दिल्ली [Read more]
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