
Supreme Court
देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में होने वाले जातिगत भेदभावों पर सर्वोच्च अदालत सख्त है। इसको रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आय़ोग (UGC) ने कुछ नियम भी बनाए हैं। इस पर शीर्ष अदालत में सुनवाई हुई। ये नियम जनवरी 2026 में आए थे और इन पर कई याचिकाएं दायर हैं। यूजीसी की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि वे इन नए नियमों पर फिर से विचार कर रहे हैं और इसके लिए थोड़ा और समय चाहिए।
यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को “उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी नियम, 2026” अधिसूचित किए थे। इनका मकसद कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव रोकना और समानता बढ़ाना था। नियम में संस्थानों को विशेष समितियां बनाने, हेल्पलाइन शुरू करने और शिकायतों की निगरानी करने जैसे प्रावधान हैं।
याचिकाओं में मुख्य रूप से नियम के प्रावधान 3(सी) को चुनौती दी गई है। इसमें जातिगत भेदभाव की परिभाषा सिर्फ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के खिलाफ जाति या जनजाति के आधार पर होने वाले भेदभाव तक सीमित की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये प्रावधान मनमाना और भेदभावपूर्ण है। इससे कुछ वर्गों के लोग उच्च शिक्षा से बाहर हो सकते हैं या उनके पास शिकायत करने का रास्ता बंद हो सकता है। उन्होंने इसे संविधान के समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है। साथ ही कहा गया है कि ये नियम यूजीसी अधिनियम 1956 के भी खिलाफ हैं और उच्च शिक्षा में समान मौके देने के मकसद को नुकसान पहुंचाते हैं।
जनवरी 2026 में ही चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने इन नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी थी। कोर्ट ने कहा था कि ये नियम पहली नजर में अस्पष्ट लगते हैं और गलत इस्तेमाल हो सकते हैं। कोर्ट ने केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी किया था। तब तक पुराने 2012 के नियम लागू रहने का निर्देश दिया गया था।
मामले की सुनवाई के दौरान यूजीसी ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच के कहा कि नए नियमों पर पुनर्विचार चल रहा है। कोर्ट ने यूजीसी से चार हफ्ते के अंदर विस्तृत हलफनामा दाखिल करने को कहा है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि ये हलफनामा मामले के पक्षकारों को भी दिया जाए। सुनवाई के बाद मामला चार हफ्ते के लिए टाल दिया गया है।