‘वंदे मातरम्’: भारत की आत्मा से निकला राष्ट्रभक्ति का स्वर
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‘वंदे मातरम्’: भारत की आत्मा से निकला राष्ट्रभक्ति का स्वर

वाद-प्रतिवाद, तर्क-वितर्क से ही सत्य निसृत होता है। वैदिक हो या ग्रीक साहित्य, सभी में संवाद महत्वपूर्ण है। 2001 में संयुक्त राष्ट्र ने इस वर्ष को ‘सभ्यताओं का संवाद’ का वर्ष घोषित किया था। मगर संवाद कब संभव है?

Written byप्रदीप पंडितप्रदीप पंडित
Aug 20, 2026, 10:23 pm IST
inभारत

‘वादे-वादे जायते तत्त्वबोधः’—वाद-प्रतिवाद, तर्क-वितर्क से ही सत्य निसृत होता है। वैदिक हो या ग्रीक साहित्य, सभी में संवाद महत्वपूर्ण है। 2001 में संयुक्त राष्ट्र ने इस वर्ष को ‘सभ्यताओं का संवाद’ का वर्ष घोषित किया था। मगर संवाद कब संभव है? यह तभी संभव है, जब बोलने की निजता के साथ ही बोलने वाले के पास सुनने की क्षमता हो। तभी संवाद संवेदित और गतिशील हो पाता है।

फिर भी, स्टुअर्ट मिल का एक निबंध ‘स्वाधीनता’ कहता है कि मानवजाति के विकास के साथ ऐसे सिद्धांत भी विकसित करने होंगे, जिनके संबंध में अंततः कोई मतभेद या संदेह न रह जाए। मनुष्य की सच्चाई इसमें परखी जाएगी कि उसके पास ऐसे कितने ताकतवर सत्य हैं, जो बिना विरोध के सार्वभौम रूप में मान्य हों। इन अर्थों में भारतीय संदर्भ में ‘वंदे मातरम्’ एकाएक सार्वभौम सत्य के रूप में उभरा और राष्ट्रभक्ति का धर्म बन गया।

वंदे मातरम् का अर्थ

‘वंदे मातरम्’ का अर्थ है—‘मैं तुम्हें नमन करता हूँ, माँ’। ‘माँ’ अर्थात् भारत माता! ‘शुभ्रज्योत्स्ना से…’ शेष पंक्तियों का अर्थ है—‘तुम्हारी रातों में चाँद की किरणें चमकती हैं।’ वह भूमि, जिसकी धरती खिले हुए पुष्पों से सुसज्जित है। सदैव विहँसती, मधुर भाषी, सुखदायी और वरदान देने वाली माँ, तुम्हें प्रणाम।

यहाँ के करोड़ों कंठ कभी प्रसन्नतापूर्वक शांत नदी की धारा के समान कल-कल करते हैं, तो कभी चंडी के समान विकराल रूप धारण कर गरजते हैं। जिसकी भुजाएँ तीक्ष्ण तलवारें धारण किए हुए हैं। ऐसी अपार बलशाली माता को मैं प्रणाम करता हूँ। आप सभी पुत्रों को तारने वाली, मुक्तिदायिनी माता हैं। शत्रुओं से लड़ने की शक्ति देने वाली माता को मैं प्रणाम करता हूँ।

तुम ही भुजाओं की शक्ति हो, तुम्हारी प्रतिमा हर मंदिर में विराजित है। तुम ही कमल पर हंस-विहार करने वाली लक्ष्मी हो, तुम ही विद्या देने वाली सरस्वती हो। मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

सघन धान से युक्त, श्यामल रंगों वाली, सरल, सुस्मित, सुशोभित प्रिये, आभूषणों से सुसज्जित, बच्चों को धारण करने वाली, सभी का भरण-पोषण करने वाली माता, धरती माता, आपको प्रणाम।

जब बंकिम चंद्र चटर्जी ने कहा- इस गीत से पूरा देश जाग उठेगा

बंकिम बाबू ने इसे 1872 से 1875 के बीच लिखा। वे ‘बंगदर्शन’ पत्रिका के संपादक थे। उनके सहयोगी थे रामचंद्र बंद्योपाध्याय। साहित्य का एक महत्वपूर्ण प्रसंग तैयार हो रहा था, लेकिन कुछ कमी रह गई थी। रामचंद्र जी बंकिम बाबू के घर पहुँचे। वहाँ उनकी निगाह ‘वंदे मातरम्’ लिखे एक कागज पर पड़ी। उन्होंने उसे देखा और बंकिम बाबू से कहा, “इससे काम चल जाएगा।”

बंकिम बाबू ने उन्हें मना किया और कहा, “आज लोग इसका अर्थ शायद नहीं समझ पाएँगे, लेकिन एक दिन आएगा और इस गीत से पूरा देश जाग उठेगा।” पूरा पढ़ने पर रामचंद्र जी ने कहा, “गीत तो अच्छा है, लेकिन संस्कृतनिष्ठ होने से लोगों की जुबान पर नहीं चढ़ पाएगा।” इस पर बंकिम बाबू ने कहा था, “यह गीत सदियों तक गाया जाता रहेगा।”

रवींद्रनाथ टैगोर के शब्दों में, “बंकिम बाबू राष्ट्रवाद के प्रतीक थे।” इस गीत ने देश के सामूहिक चरित्र को जागृत करते हुए राष्ट्रीय संकल्प को बल दिया। शक्ति, भलाई और एकता की भावना का प्रसार किया। 1882 में ‘आनंदमठ’ में प्रकाशित होने के बाद टैगोर ने सबसे पहले 1896 में इसे गाया। फिर तो इस गीत ने भारतीय संदर्भ को नया आयाम दिया। आस्था के पुराने अध्याय में ‘वंदे मातरम्’ नया हिस्सा बन गया।

बंगाल विभाजन के समय जन-जन का लोकमंत्र बना

1905 में लॉर्ड कर्जन ने बंगाल विभाजन किया। उस समय ‘वंदे मातरम्’ जन-जन का लोक-मंत्र बन गया। प्रभात फेरियां निकलीं, जिनमें हर गली और सड़क पर यह नारे और गीत में बदल गया। इससे परेशान होकर ही अक्टूबर 1905 में ‘वंदे मातरम्’ गाने पर विद्यार्थियों को स्कूलों से निकाल दिया गया और 37 विद्यार्थियों के विरुद्ध मानहानि की कार्रवाई की गई। इसके आगे भी अनेक कार्रवाइयाँ हुईं। छात्रों ने जुलूस निकाला, मार्च किया और अंग्रेजी हुकूमत की ज्यादतियों के बावजूद उनके होंठों पर ‘वंदे मातरम्’ तैरता रहा।

पूरे देश में इसका प्रभाव दिखाई दिया। पंजाब में लाला लाजपत राय ने और बंगाल विभाजन के विरोध में अन्य नेताओं ने आंदोलन को आगे बढ़ाया। महाराष्ट्र में लोकमान्य तिलक ने इसे आगे बढ़ाया और अपने अखबार ‘मराठा’ में इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया तथा अपने अखबार ‘केसरी’ में इसे प्रकाशित भी किया। अन्य भाषाओं में इसके अनुवाद हुए और इसे सार्वभौमिक मान्यता के साथ राष्ट्रभक्ति के धर्म का दर्जा मिल गया।

राष्ट्रीय सम्मान देने में 150 साल लग गए

ठीक इसी तरह 1912 में ‘भारत समाज की पत्रिका’ ‘तत्त्वबोधिनी’ में ‘जन गण मन’ ‘भारत विधाता’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। टैगोर ही इसके संपादक थे। इसकी तुलना भी ‘वंदे मातरम्’ से होने लगी थी। ‘वंदे मातरम्’ ने टैगोर के प्रभाव में यह साबित किया कि यह देश मात्र भू-भाग का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक जीवंत सत्ता है और यह गीत उनके हृदय की वीणा की गूँज है। इसलिए आपने देखा कि कथावस्तु बंकिम से शुरू होकर किसानों की पीड़ा और संन्यासी विद्रोह में बदलती है। महाजनों की सत्ता और अंग्रेजों के अत्याचारों के विरोध में संन्यासियों का दल बड़ा होता है। यहीं से ‘वंदे मातरम्’ गूँजता है।

इस चिन्मय ज्योति को राष्ट्रीय सम्मान प्रदान करने और उसके अपमान की रोकथाम हेतु लगभग 150 वर्ष लग गए। 11 अगस्त 2028 को राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 की धारा 3 में संशोधन किया गया। इसके तहत राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान कानूनी सुरक्षा प्रदान की गई है।

क्या इतना अंतराल इसलिए लंबा हो गया कि आज का मनुष्य इतना अधिक क्षण-केंद्रित हो गया है कि उसकी स्वाधीनता के मूल्यबोध और उसकी चिंताओं का फलक बदल गया है? फिर भी लगता है कि अंतर-जनपदीय भाषा या जिसे आप जातीय भाषा कहते हैं, उसमें अब भी जाति-निर्माण, जातीय चेतना का प्रसार, जातीय प्रदेश का गठन और उसकी आत्मरक्षा आध्यात्मिक विचारों से पुष्ट नहीं होती। भरोसा है कि भारत के नागरिक अब भी सिर्फ उपभोक्ता नहीं हैं और ‘वंदे मातरम्’ की ऊर्जा के बारे में विचार करेंगे तो पाएँगे कि वह लोक-स्वर में बदलकर ग्राम-गीत के पृष्ठों में उतर गई है।

रवींद्रनाथ के अंग्रेजी गद्य के उस पैराग्राफ से, जिसमें वे लिखते हैं कि—“हम लोग कहाँ हैं? दूर, बहुत दूर उस नगर का नाम है विषाद…”—उस दौर से आज के समय तक की मानवीय संवेदना, स्वाधीनता और राष्ट्र-चेतना की वैश्विक तर्क में दूरी नहीं है, बल्कि वह अदृश्य हुई है।

टी. एस. इलियट का प्रसिद्ध निबंध है—‘Tradition and the Individual Talent’। उनकी मान्यता है कि किसी कवि को अपनी दृष्टि में महज युग का संज्ञान लेकर नहीं लिखना चाहिए, बल्कि उसकी अनुभूति से दीप्ति भी होनी चाहिए। सुब्रमण्यम भारती की जन्मशती 1982 में मनाई गई। उनकी कविताओं का हिंदी अनुवाद प्रकाशित हुआ। इस लेखक की पहली कविता ‘वंदे मातरम्’ ही है।

“पराधीनता का जीवन अति लज्जास्पद बात है। पराधीनता जीवन पर लज्जा है। सारा भारत एक साथ है-

अब हम यह संकल्प करेंगे,
दास वृत्ति का त्याग करेंगे,
कभी नहीं पराधीन रहेंगे,
हम ‘वंदे मातरम्’ कहेंगे।

…अपनी जननी जन्मभूमि को नमन करेंगे,
हम ‘वंदे मातरम्’ कहेंगे।”

और-

“जिस अमर धूलि में मेरी मैया पली,
जा रही मेरे बाप की क्रीड़ा-स्थली,
शत-सहस्र पूर्व पुरखों की जो जन्मभूमि,
शत-सहस्र पूर्व पुरखों की जो कर्मभूमि,

उन मनीषी मनों में समाहित हुई,
उनके उन्नत विचारों से विकसित हुई,
भूमि जो, वंदना आज उसकी करूँ,
आज उनका करूँ ध्यान, उनका ध्यान धरूँ।

वंदे मातरम्, वंदे मातरम्—
हर्ष में गा उठूँ वंदे मातरम्।”

भारती का संदर्भ यह मानता रहा कि आंतरिक बंधनों में इतनी ऊर्जा है कि वह देश को शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में विकसित कर सके। अपनी बौद्धिकता और लोक-लयों की स्थानिक झलक के साथ उनकी निष्ठा भारतीय परिवार में नागरिक कर्तव्यों का परोक्ष संदेश देती है। इसलिए चाहे 150 वर्ष हो गए हों, किंतु ‘वंदे मातरम्’ जैसा मंत्र राष्ट्रीय चेतना का प्रसार करने में सहायक होगा।

जैसा महादेवी जी ने कहा था—“चीनी आक्रमण के समय साहित्य में व्याप्त राष्ट्रीय चेतना का ऐसा प्रभाव था कि ‘हिमाद्रि तुंग-शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयं प्रभा, समुज्ज्वला, स्वतंत्रता पुकारती’।” उम्मीद है कि सत्ता-प्राप्ति के लिए उन्मादी चेतना के अपने तरीकों के कुत्सित रूप, राष्ट्रीय सम्मान के मुद्दे पर लगातार असहमतियों के बावजूद, एकजुट होते दिखाई देंगे।

Topics: वंदे मातरम्Vande Mataramभारतीय स्वतंत्रता संग्रामदेशभक्ति गीतभारतीय संस्कृतिबंकिमचंद्र चट्टोपाध्यायस्वतंत्रता आंदोलनआनंदमठलोकमान्य तिलकबंगाल विभाजनस्वतंत्रता आंदोलन का इतिहासभारतीय राष्ट्रवादराष्ट्रगीतसुब्रमण्यम भारतीरवींद्रनाथ टैगोर
प्रदीप पंडित
प्रदीप पंडित
हिन्दी और अंग्रेजी पत्रकारिता में 37 वर्ष का अनुभव। जनसत्ता, संडे मेल, दैनिक भास्कर, स्वदेश ग्वालियर और दिल्ली से प्रका​शित राष्ट्रीय पत्रिका शुक्रवार के संपादक। अनेक रेडियो नाटक, दर्जनों टेली फिल्म, उपन्यास, प्रतिप्रश्न, हिन्दी अकादमी दिल्ली से 1988-89 में साहि​​​त्यिक कृति पुरस्कार से सम्मानित। भारतीय ज्ञानपीठ की अनेक पुस्तकें संपादित। टैगोर और स्टीफन स्पेंडर के अनुवाद और अनेक पुस्तकें। [Read more]
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