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विभाजन की विभीषिका : अभी भी छलकती हैं आंखें

विभाजन केवल देश की सीमाओं का बंटवारा नहीं था, यह लाखों परिवारों के घर, रिश्ते, स्मृतियां और जीवन छीन लेने वाली त्रासदी थी। इसके घाव पीढ़ियों तक महसूस किए गए और आज भी अनेक परिवार उन यादों के साथ जी रहे हैं। पीड़ितों की दर्दभरी बातें पत्थर दिल इंसान को भी पिघला देती हैं

Written byअरुण कुमार सिंहअरुण कुमार सिंह
Aug 20, 2026, 05:41 pm IST
inभारत
1947 में दिल्ली का किंग्जवे कैंप, जहां हिंदू शरणार्थी रहते थे

1947 में दिल्ली का किंग्जवे कैंप, जहां हिंदू शरणार्थी रहते थे

आजादी मिलने के साथ ही भारत का विभाजन भी हुआ और पाकिस्तान नामक एक देश विश्व के मानचित्र पर आया। विभाजन के समय भारत में लगभग 30 करोड़ हिंदू और लगभग 5 करोड़ मुसलमान थे। उस समय भारत का क्षेत्रफल 43,19,263 वर्ग किलोमीटर था। चूंकि मुसलमानों ने मजहब के नाम पर देश का बंटवारा कराया था। इसलिए उनकी उस समय की आबादी के हिसाब से उन्हें 6,40,840 वर्ग किलोमीटर जमीन मिलनी चाहिए थी, लेकिन उन्हें 10,32,000 वर्ग किलोमीटर जमीन दी गई। यानी उनका जो हिसाब बनता था, उससे लगभग दोगुनी जमीन उन्हें दी गई। अपना हिस्सा लेने के बावजूद अधिकतर मुसलमान पाकिस्तान नहीं गए। यह हिंदुओं के साथ छल नहीं तो क्या है!

1951 की विस्थापित जनगणना के अनुसार विभाजन के तुरंत बाद 72,26,000 मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान गए और 72,49,000 हिंदू और सिख पाकिस्तान से भारत आए। अब भारत में मुसलमानों की जनसंख्या लगभग 20 करोड़ है, वहीं पाकिस्तान में हिंदू एक प्रतिशत से भी कम रह गए हैं, जबकि विभाजन के बाद भी पाकिस्तान में लगभग 22 प्रतिशत हिंदू थे। इस्लामिक गणराज्य पाकिस्तान में ऐसे हालात बना दिए गए कि वहां से हिंदुओं को पलायन करना पड़ा और वह सिलसिला अभी भी चल रहा है। ऐसा कोई दिन नहीं बीतता है कि जब कोई पाकिस्तानी हिंदू जान बचाने के लिए भारत न आता हो।

आज भी हैं घाव के निशान

विभाजन के दौरान पाकिस्तान से भारत आने वाले हिंदुओं के साथ, जो अत्याचार हुए, उसके उदाहरण पूरी दुनिया में नहीं मिलते हैं। 1947 में करीब साढ़े 10 साल के रहे पुरुषोत्तम लाल मेहता इस समय दिल्ली में रहते हैं। उन्होंने बताया, ‘‘मेरा परिवार सौवाल, झेलम में रहता था। परिवार में कुल 14 लोग थे। उनमें से 11 को मुसलमानों ने मार दिया। 23 सितंबर, 1947 को एक मालगाड़ी से हम लोग भारत के लिए चले। लाहौर और गुजरांवाला के बीच कामुकी मंडी में गाड़ी पर सैकड़ों मुसलमानों ने हमला कर दिया। मेरे सामने ही मेरी मां, मेरे चाचा और अन्य संबंधियों को मार दिया गया। मैं, मेरी चचेरी बहन और मेरे पिताजी ही बचे थे।

हमले के समय मेरे चाचा जी ने मुझे अपने पीेछे छिपा लिया था। इस कारण मेरी जान बच गई, लेकिन मैं भी घायल हो गया था। उसके निशान आज भी हैं मेरे शरीर में।” अपनी आपबीती बताते हुए श्री मेहता रोने लगते हैं। कहते हैं,”आज हिंदुओं को आपसी मतभेदों को भुलाकर विचार करना चाहिए कि आखिर विभाजन से हिंदुओं को क्या मिला और हिंदुओं ने क्या खोया। हिंदू एकता ही इस देश को फिर बंटने से बचा पाएगी।”

बेटियों ने दी जान

बंटवारे के समय ऐसा मजहबी उन्माद था कि कभी एक साथ रहने और खाने वाले लोग ही तलवार के बल पर पड़ोसी हिंदुओं की बहू-बेटियों को घसीट कर ले जाने लगे थे। जब इस तरह की अनेक घटनाएं हुईं, तो किसी हिंदू पिता ने खुद ही अपनी बेटियों की हत्या कर दी, तो किसी हिंदू पति ने अपनी पत्नी को मार दिया। कई लड़कियों ने अपमान के कारण खुद ही मौत को गले लगा लिया। विभाजन की पीड़ा सहने वाले प्रेमनाथ रावल बताते हैं, ”मेरी तीन मौसेरी बहनों ने कुएं में कूद कर जान दे दी। हुआ यह था कि एक दिन मोहल्ले के ही मुसलमान मेरी मौसी के घर घुस गए और उन्होंने बदतमीजी की सारी हदें पार कर दीं। हिंदुओं के प्रतिकार करने पर वे लोग उस वक्त तो चले गए, लेकिन इस घटना ने मौसी की बेटियों को परेशान कर दिया। उन तीनों ने कहा कि हमें मार दें, नहीं तो ये लोग छोड़ेंगे नहीं। घर वालों ने सोचा कि अभी ताजा घटना है, समय के साथ ये सब भूल जाएंगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उन तीनों बहनों ने घर के पास स्थित एक कुएं में कूद कर जा दे दी।”

कंगाली की स्थिति

1947 में सतीश दुरेजा की उम्र केवल सात साल थी। उनका परिवार मुल्तान के पास नवांशहर में रहता था। उनके साथ भी वही हुआ, जो अन्य हिंदुओं के साथ होता था। सतीश दुरेजा बताते हैं, “जुलाई, 1947 के खत्म होते-होते माहौल पूरी तरह खराब हो गया। कुछ दिनों गांव के सारे हिंदू एक बड़े घर में कैद रहे।

फिर वहां से निकले तो मालगाड़ी से भारत की ओर बढ़े। रास्ते में जगह-जगह गाड़ी पर हमले हुए और अनेक हिंदुओं को मार
दिया गया। जो बच गए, वे भारत आने के बाद कई वर्ष तक कंगाली की स्थिति में रहे।”

मां-बेटे का मिलन

विभाजन का दर्द कितना गहरा है, इसे कोई भुक्तभोगी ही समझ और बता सकता है। छोटे-छोटे बच्चों को उनकी मां, परिवार और भाई-बहनों से अलग रहने का दंश झेलना पड़ा। एक ऐसा ही बच्चा था-भारत स्वरूप आहूजा, जो अब वृद्ध हो चुके हैं। 1947 में भारत स्वरूप आहूजा लायलपुर जिले के कमालिया में एक गुरुकुल में पांचवीं में पढ़ते थे। माहौल खराब होने लगा, तो गुरुकुल के संचालकों को बच्चों की चिंता होने लगी। इसके बाद बच्चों को तुलंबा ले गए, लेकिन वहां और भी विकट स्थिति पैदा हो गई। बच्चे न तो अपने घर जा सकते थे और न ही वापस गुरुकुल। कई दिनों तक उन सबको भूखे-प्यासे तुलंबा में ही रहना पड़ा। अंत में गुरुकुल के संचालकों ने तय किया कि इन बच्चों को किसी भी तरह भारत पहुंचाया जाए।

इसके बाद एक रेलगाड़ी में बच्चों को बैठा दिया गया। वह गाड़ी लाहौर होते हुए भारत पहुंची। जिस बच्चे को जहां मन किया वहीं उतर गया। इस तरह बच्चे भी बिखर गए। भारत रूवरूप आहूजा पहले करनाल पहुंचे, फिर दिल्ली आ गए। शाम के समय दिल्ली की सड़कों में भटकते हुए एक सज्जन ने देखा तो उन्हें वे अपने घर ले गए। वहां उन्हें भोजन कराया और रात में अपने घर ही रखा। दूसरे दिन उन सज्जन ने भारत रूवरूप आहूजा को किंग्जवे कैंप पहुंचा दिया और कहा कि यहीं रहो, क्योंकि दिल्ली आने वाले अधिकांश शरणार्थी पहले यहीं आते हैं। वहां उन्हें खाना और सोने की जगह मिल जाती थी। जब भी शरणार्थियों का कोई झुंड वहां पहुंचता था तो वे भाग कर उन्हें देखने पहुंच जाते थे।

भारत स्वरूप डबडबाई आंखों के साथ बताते हैं, ”कैंप के एक कोने में मैं मायूस बैठा था, तभी कुछ लोगों के आने की खबर मिली, तो मैं उधर भागा। देखा मेरी मां और मेरे भाई खड़े हैं। मैंने मां को देखा और मां ने मुझे देखा। इसके बाद तो मुझे अपने सीने से चिपका कर वह कई घंटे तक रोती रहीं। मैं भी रोता रहा। यह भगवान की कृपा ही थी कि उन्होंने हम दोनों मां-बेटे की पुकार सुन ली और हम हजारों किलोमीटर दूर एक ऐसे स्थान पर मिले, जहां बिना दर्द कोई नहीं था। यह दर्द उन लोगों ने दिया था, जिन्हें जल्दी सत्ता चाहिए थी और जिनके लिए मानवता से बढ़कर मजहब ही सब कुछ है।”

सीख लेने की जरूरत

विभाजन के दर्द को वर्षों तक भोगने वाले भूषणलाल पाराशर की आयु इस समय 90 वर्ष है। बंटवारे की बात करते ही वे भावुक हो जाते हैं। कहते हैं, “भारत विभाजन दुनिया की एक मात्र ऐसी घटना है, जिसमें लाखों लोग मजहबी उन्माद की भेंट चढ़ गए और अनगिनत लोग दर्द के साथ अभी भी जी रहे हैं। कोई पीड़ित इस दर्द को चाह कर भी नहीं भुला सकता और भूलना भी नहीं चाहिए। बंटवारे में हिंदुओं के साथ जो हुआ, उसे बच्चों को पढ़ाया जाना चाहिए। यदि हिंदुओं के बच्चे भारत विभाजन को याद नहीं रखेंगे तो भारत आगे भी बंट सकता है।”

वे यह भी कहते हैं कि इतिहास को याद करने का उद्देश्य घृणा को बढ़ाना नहीं, बल्कि उन भयावह घटनाओं से सीख लेना और यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि ऐसी त्रासदी फिर कभी न दोहराई जाए।

Topics: पलायनपीड़ितों का दर्दमजहबी उन्मादआँखों में आँसू.विभाजन की विभीषिकादर्ददेश का बंटवारामानवीय त्रासदीपाञ्चजन्य विशेषकंगालीभारत विभाजन 1947विभाजन एवं त्रासदीऐतिहासिक विस्थापनविस्थापित जनगणना
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अरुण कुमार सिंह
समाचार संपादक, पाञ्चजन्य | अरुण कुमार सिंह लगभग 25 वर्ष से पत्रकारिता में हैं। वर्तमान में साप्ताहिक पाञ्चजन्य के समाचार संपादक हैं। [Read more]
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