अमेरिका के भारत में राजदूत सर्जियो गोर ने जम्मू-कश्मीर को “भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा” कहा है, जिसके बाद पाकिस्तान की बौखलाहट बढ़ गई है। उसने सर्जियो गोर के इस कथन का विरोध शुरु कर दिया है। उसने इस्लामाबाद में अमेरिकी चार्ज डी’अफेयर्स को विदेश मंत्रालय में बुलाकर औपचारिक विरोध दर्ज कराया।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने बयान में कहा कि अमेरिकी राजदूत का यह बयान जम्मू-कश्मीर विवाद पर अमेरिका की लंबे समय से चली आ रही और अच्छी तरह दर्ज स्थिति के खिलाफ है। यह अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर की श्रेष्ठता के प्रति अमेरिका की प्रतिबद्धता के भी विपरीत है। यह घटना उस समय हुई है जब पाकिस्तान और अमेरिका के संबंध अपेक्षाकृत अच्छे चल रहे हैं। पाकिस्तान डोनाल्ड ट्रंप के मध्यस्थता के प्रस्तावों का समर्थन कर रहा है और अमेरिका-ईरान के बीच मध्यस्थता भी कर रहा है।
गोर का बयान क्यों है खास?
गोर का यह बयान दो वजहों से खास माना जा रहा है। पहला, वह ट्रंप के करीबी माने जाते हैं। दूसरा, वे सिर्फ भारत में अमेरिकी राजदूत नहीं हैं, बल्कि दक्षिण और मध्य एशियाई मामलों के विशेष दूत भी हैं। इस पद पर वे अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, भारत, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान से जुड़े अमेरिकी विदेश नीति की निगरानी करते हैं। जनवरी 2025 से पाकिस्तान में अमेरिकी राजदूत का पद खाली है।
पहले क्या था रुख
विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, 1947 में भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर युद्ध शुरू हुआ। उस समय अमेरिका का रुख द्विपक्षीय समाधान का समर्थन करने का था, लेकिन जरूरत पड़ने पर संयुक्त राष्ट्र की भूमिका का भी समर्थन करता था। जब भारत ने लॉर्ड माउंटबेटन की सलाह पर कश्मीर मुद्दा संयुक्त राष्ट्र में उठाया, तो अमेरिका और ब्रिटेन पाकिस्तान के पक्ष में ज्यादा सहानुभूति रखते दिखे। भारत-पाकिस्तान के लिए संयुक्त राष्ट्र आयोग के पांच सदस्यों में चेकोस्लोवाकिया, बेल्जियम, कोलंबिया, अर्जेंटीना और अमेरिका शामिल थे।
जनवरी 1948 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधिमंडल प्रमुख एन. गोपालस्वामी अयंगर को तार में लिखा था कि अमेरिका का कश्मीर मुद्दे पर रुख मुद्दे के गुण-दोष से कम और रणनीतिक हितों से ज्यादा प्रभावित होगा। अमेरिका ग्रीस से ईरान तक मध्य पूर्वी देशों का समर्थन कर रहा था ताकि सोवियत संघ के साथ संभावित संघर्ष में वे आधार और सहयोग दें। अगर पाकिस्तान भी ऐसा सहयोग देने को तैयार हो, तो अमेरिका कश्मीर विवाद में पाकिस्तान का समर्थन करने की कोशिश करेगा।
शीत युद्ध के ज्यादातर समय यही स्थिति रही। भारत की गुटनिरपेक्ष नीति से वाशिंगटन संशय में रहता था। पाकिस्तान भौगोलिक स्थिति की वजह से महत्वपूर्ण था क्योंकि वहां से सोवियत संघ, चीन और फारस की खाड़ी पर नजर रखी जा सकती थी। पाकिस्तान अमेरिकी सैन्य गठबंधनों में शामिल हुआ और अमेरिकी हथियार पाने लगा।
पहले अमेरिका ने मोटे तौर पर पाकिस्तान का यह रुख स्वीकार किया था कि कश्मीर विवादित क्षेत्र है। संयुक्त राष्ट्र में जनमत संग्रह सहित प्रस्तावों का समर्थन करता रहा।
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1960 और 1970 के दशक
जुलाई 1961 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान अमेरिका गए और जॉन एफ. केनेडी से मिले। अयूब ने नेहरू पर कश्मीर को लेकर दबाव डालने की मांग की। अमेरिकी विदेश विभाग के अभिलेखों के अनुसार केनेडी ने कहा कि कश्मीर नेहरू के लिए बहुत गहरा मुद्दा है, इसलिए अमेरिका का प्रभाव सीमित है, लेकिन कोशिश करेंगे।
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद अमेरिका को समझ में आ गया कि दोनों देशों के साथ करीबी रणनीतिक संबंध रखते हुए कश्मीर विवाद को संभालना मुश्किल है। वियतनाम युद्ध की वजह से दक्षिण एशिया में अमेरिका की भूमिका कम हो गई।
1971 के युद्ध के बाद 1972 में शिमला समझौता हुआ। इसमें भारत और पाकिस्तान ने मतभेदों को द्विपक्षीय रूप से सुलझाने और कश्मीर में नियंत्रण रेखा का सम्मान करने पर सहमति जताई। अमेरिका ने इस दृष्टिकोण को स्वीकार करना शुरू कर दिया। 1979 में सोवियत संघ के अफगानिस्तान पर हमले के बाद पाकिस्तान फिर से अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो गया। 1980 के दशक में भारत-अमेरिका संबंध भी सुधरने लगे।
शीत युद्ध के बाद
शीत युद्ध खत्म होने के बाद अमेरिका ने जनमत संग्रह की सार्वजनिक मांग का समर्थन लगभग छोड़ दिया। बिल क्लिंटन के पहले प्रशासन ने कश्मीर में भारत के मानवाधिकार रिकॉर्ड की आलोचना की, लेकिन कारगिल युद्ध के बाद क्लिंटन ने आक्रामकता के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया और भारत के तर्कों के प्रति ज्यादा खुला रुख अपनाया।
2000 में क्लिंटन भारत आए। उन्होंने भारत में पांच दिन और पाकिस्तान में कुछ घंटे बिताए। संसद के संयुक्त सत्र में उन्होंने साफ कहा कि वे कश्मीर विवाद की मध्यस्थता के लिए नहीं आए हैं। यह मुद्दा केवल भारत और पाकिस्तान ही सुलझा सकते हैं। इसके बाद 2019 में ट्रंप ने फिर मध्यस्थता का मुद्दा उठाया। इमरान खान से मुलाकात में उन्होंने कहा कि दोनों देश मांगें तो वे मध्यस्थता करने को तैयार हैं। भारत ने तुरंत इसे खारिज कर दिया और कहा कि यह द्विपक्षीय मुद्दा है।
2020 के एक अमेरिकी कांग्रेस दस्तावेज में (आर्टिकल 370 हटाने के बाद) कहा गया कि कश्मीर पर अमेरिका की लंबे समय से स्थिति यह है कि क्षेत्र का दर्जा भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत से तय होना चाहिए, साथ ही कश्मीरी लोगों की इच्छाओं को भी ध्यान में रखा जाए।
















