तब हम लोग सियालकोट में रहते थे। मैं दस बरस की थी। एक सुबह हमारे पिता जी किसी काम से कराची गए हुए थे। अचानक घर के आस-पास शोरगुल मचने लगा। पता चला मुसलमानों ने हमला कर दिया है। हम सब बहुत डर गए। आनन-फानन में मेरी मां हम छह बहनों और चाचा जी की दो लड़कियों को साथ लेकर घर से निकल पड़ी।
हमें कुछ पता नहीं था। कहां जाना है। हम रोते हुए, बस भीड़ जिस दिशा में जा रही थी, हम लोग चले जा रहे थे। पहले हम रेलगाड़ी से अटारी तक आए। उसके बाद पैदल चलना शुरू हुआ।
कच्चे रास्ते में मेरे पांव में एक कील चुभ गई थी। मुझे दर्द हो रहा था। पर माता जी ने अपने हाथ से कील तो निकाल दी, पर मुझे घाव को देखने नहीं दिया। उस हालत में हम लोग दो महीने तक पैदल चलते रहे थे।
मुझे याद है, रास्ते में कहीं शरणार्थी शिविर में हम रुके थे। मां किसी से चावल और पतीला मांगकर लाई। चावल पकाए। अब बर्तन तो थे नहीं सो उन्होंने अपनी ओढ़नी को जमीन पर बिछाया और उस पर चावल फैला दिए। हमें सूखे चावल ही खाने पड़े।
दो महीनों तक हम ऐसे ही चलते रहे। कभी कुछ खाने को मिलता, कभी नहीं मिलता। जैसे-तैसे हम हम दिल्ली पहुंचे, यहां बहुत भीड़ थी। हम लोग बहुत घबरा गए थे।
मैं और मेरी छोटी बहन रोने लगे। छह महीने के बाद हमें पिताजी दिल्ली में मिले। उन्होंने बताया कि वह जिस रेलगाड़ी में चढ़े, उसके डिब्बे हिंदुओं की लाशों से पटे हुए थे। लाशों के बीच लेटकर किसी तरह उन्होंने अपनी जान बचाई और दिल्ली पहुंचे।
















