
गोस्वामी तुलसीदास जयंती (चित्र एआई द्वारा निर्मित)
स्वाभिमानी महाकवि और संत गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी यानी आज 19 अगस्त को है। भारत में 16वीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास के रूप में एक ऐसे लोकनायक का उद्भव हुआ, जिन्होंने अपने कृतित्व और व्यक्तित्व से लोकमानस ही नहीं, लोकहृदय में भी जगह बनाई।
विंसेंट आर्थर स्मिथ ने अपनी पुस्तक ‘अकबर द ग्रेट मुगल ‘ में तुलसीदास के बारे में ठीक ही लिखा है, ‘तुलसीदास मध्यकालीन हिंदू काव्य के जादुई बगीचे के सबसे ऊंचे वृक्ष हैं। उनका नाम आईन-ए-अकबरी में या मुस्लिम विश्लेषकों के पन्नों में, अथवा फारसी इतिहासकारों के आख्यानों पर आधारित यूरोपीय लेखकों की पुस्तकों में नहीं मिलेगा। फिर भी, वह (हिंदू) भारत में अपने युग के सबसे महान व्यक्ति थे, यहां तक कि अकबर से भी अधिक महान, क्योंकि कवि द्वारा करोड़ों पुरुषों और महिलाओं के दिलों और दिमागों पर की गई विजय, सम्राट द्वारा युद्ध में प्राप्त की गई सभी विजयों की तुलना में असीम रूप से अधिक स्थायी और महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।”
इसलिए जॉर्ज ग्रियर्सन ने भी गोस्वामी तुलसीदास के संबंध में कहा है, ‘यदि हम वर्तमान समय में उनके द्वारा डाले गए प्रभाव को अपनी कसौटी मानें, तो (वह) एशिया के तीन या चार महान लेखकों में से एक हैं…पूरी गंगा घाटी में उनका महान कार्य (रामायण) इंग्लैंड में बाइबिल की तुलना में अधिक प्रसिद्ध है।’
16वीं शताब्दी के मध्यान्ह में अकबर मुगल साम्राज्य की पुनर्स्थापना कर भारत में येन- केन-प्रकारेण साम्राज्य विस्तार कर अपनी षड्यंत्रकारी कूटनीतियों के बल पर हिंदू साम्राज्य और धर्म को विघटित करने का प्रयास कर रहा था। हिंदुओं की दुर्दशा हो गई थी, वे अवसादग्रस्त थे और धर्म को लेकर प्रकारांतर अन्यान्य मतभेद थे। कोई राह नहीं दिख रही थी, तब गोस्वामी तुलसीदास एक देदीप्यमान नक्षत्र के रूप में अवतरित हुए और भगवान श्रीराम के आदर्शों के आलोक में रामचरितमानस की रचना कर लोकनायक बने। अपनी मेधा से हिंदुओं को एकत्व की राह दिखाई, एवं हिंदुत्व की रक्षा की।
गोस्वामी तुलसीदास जी उस युग के महान समन्वयवादी संत कवि हैं। उन्होंने शैव और वैष्णव, सगुण और निर्गुण को एक ही धागे में पिरोकर जो कार्य किया है, वह अनंत काल तक चिरस्थायी रहेगा। तुलसीदास ने किसी नवीन पंथ या संप्रदाय को जन्म नहीं दिया, वरन् हिंदुओं की विविध धाराओं को ‘विविधता में एकता’ का संदेश दिया। डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन लिखते हैं, ‘भारत के इतिहास में तुलसीदास के महत्व को अतिरंजित नहीं किया जा सकता: उनकी रामायण के साहित्यिक गुणों को एक तरफ रखकर देखें, तो भी सभी वर्गों द्वारा इसकी सार्वभौमिक स्वीकृति के तथ्य निश्चित रूप से ध्यान देने योग्य हैं।’
विद्वान कारपेंटर लिखते हैं, ‘तुलसीदास एक सुधारक नहीं थे। उन्होंने किसी नए संप्रदाय की स्थापना नहीं की और न ही किसी नए सिद्धांत को स्वर दिया। उनकी धार्मिक स्थिति इसके बजाय रामानंद की शिक्षाओं के एक संवाहक (प्रवक्ता) होने में निहित है।’ इस पर भी उनका नाम अमर हो गया। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार, ‘लोकनायक वही हो सकता है, जो समन्वय कर सके, क्योंकि भारतीय जनता में नाना प्रकार के परस्पर विरोधिनी संस्कृतियां, साधनाएं, जातियां,आचार निष्ठा और विचार पद्धतियां प्रचलित हैं, बुद्ध देव समन्वयकारी थे। कई थे, गीता में समन्वय की चेष्टा है, और तुलसीदास समन्वयकारी थे।’
गोस्वामी तुलसीदास के बढ़ते प्रभाव को देखकर अकबर सशंकित हो गया था, इसलिए उसने कूटनीतिक चालें खेलीं। परन्तु लोकनायक तुलसीदास और निरंकुश तथाकथित बादशाह अकबर में अंततः विजय लोक नायक की हुई। चालाक अकबर ने तुलसीदास जी को नवरत्न में शामिल करने के लिए कई बार प्रयास किए परंतु तुलसीदास ने यह कहकर पेशकश ठुकरा दी कि-
“हम चाकर रघुवीर के, पटौ लिखो दरबार।
तुलसी अब क्या होंयेंगे, नर के मनसबदार।।”
अकबर ने षड्यंत्रपूर्वक अपने दरबार में गोस्वामी तुलसीदास को लाने के लिए टोडरमल, बीरबल और रहीम को भेजा, परंतु असफल रहा। इसलिए अकबर ने गोस्वामी को गिरफ्तार कराया तथा उनसे अपनी गाथा रामचरितमानस जैसा लिखवाने का दबाव बनाया, इसमें भी वह असफल हुआ।
चालाक अकबर ने गोस्वामी तुलसीदास जी को बंदी बना लिया,जहाँ उन्होंने हनुमान चालीसा की रचना की। गोस्वामी तुलसीदास के समकालिक लिखते हैं कि हनुमान चालीसा के पाठ करते हुए हनुमान जी का स्मरण किया। फलस्वरूप वानरों के समूह का आक्रमण हुआ और जनविद्रोह की स्थिति निर्मित हो गई। अतः अकबर को गोस्वामी तुलसीदास को छोड़ना पड़ा।इस तरह स्व की विजय हुई और गोस्वामी तुलसीदास की।कालजयी रचना रामचरितमानस स्व के विजय की प्रतीक बनी। हिंदुत्व के विजय का प्रतीक बनी।
विन्सेंट स्मिथ लिखते हैं कि अकबर के काल में अकबर से भी महान एक व्यक्ति हुआ है वह गोस्वामी तुलसीदास है, क्योंकि अकबर ने युद्धों के कारण विजय प्राप्त की परंतु उस से ज्यादा विजय गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी रचनाओं से विजय प्राप्त की।
अकबर यह समझ ही नहीं सका कि ऐसा कभी-कभी होता है, जब कोई असाधारण आत्मा सामान्य स्तर से ऊपर उठकर ईश्वर के विषय में अधिक गहराई से प्रति संवेदन करती है, और दैवीय मार्गदर्शन के अनुरूप वीरतापूर्वक आचरण करती है, ऐसी महान आत्मा का आलोक अंधकारमय और अस्त-व्यस्त संसार के लिए प्रखर दीप का कार्य करती है, लोकनायक तुलसी की आत्मा इसी कोटि की उच्चतर मानक है।
राजनाथ शर्मा लिखते हैं कि “तुलसी की दृष्टि बड़ी तीव्र है, वे समाज के सजग प्रहरी थे, उन्हें कुटुम्ब प्रबोधन का ध्यान था, लोकहित का पूर्ण ज्ञान था, उनके राम पूर्ण मानव हैं। मानव के सुख-दुख राग-विराग की संपूर्ण भावनाएं उनमें हैं। राम के रूप में युग में जनता का पूर्ण रूप देखा। उसमें आदर्श का पूर्ण प्रतिबिंब देखकर लोक ने ललक कर उन्हें अपना लिया।”
वास्तव में तुलसी अपने युग के महान् व्यक्तित्व थे, उन्होंने अपने मानस में आदर्श राम राज्य का चित्रण किया और बताया कि राजा के क्या कर्तव्य हैं और प्रजा के क्या? तुलसीदास कवि और संत ही नहीं वरन् महान् समाज सुधारक भी थे। उन्होंने अपने समय की राजनीति की गंदगी को दूर करने का प्रयत्न किया, समाज के सम्मुख राजनीति के महान् आदर्श प्रस्तुत किए और राम राज्य की कल्पना द्वारा एक नवीन आशा की झलक दिखाई।
मुस्लिम राजनीति से हिंदू अत्यंत पीड़ित थे, तुलसी ने खल-विनाशक राम के शक्तिशाली जीवन द्वारा लोक शिक्षा का पाठ पढ़ाया। किस प्रकार अत्याचार का घड़ा भरने पर टूटता है और अत्याचार के युग के विरुद्ध विद्रोह होता है और शांति का युग आता है – यह ‘मानस’ में देखने को मिलता है। राजा का आदर्श प्रजा-पालन एवं दुष्टों का विनाश है। रामराज्य एक आदर्श कल्पना है।
वास्तव में तुलसी की प्रतिभा अद्भुत और अद्वितीय थी, उनकी मृत्यु को हुए युग बीत गए हैं, परंतु भारतीय समाज पर उनके विचारों की छाप अब तक पड़ रही है। उनका ‘मानस’ तो एक आचार संहिता है,और भारतीय जीवन का दर्शन।
गोस्वामी तुलसीदास ने सामाजिक,धार्मिक,दार्शनिक, राजनीतिक,साहित्यिक, और सांस्कृतिक सहित अनेक क्षेत्रों में भारतीय जनता को ऐसा कुछ प्रदान किया है, कि जिसके कारण जनता के गले का हार बन गए हैं, तभी तो अनेक देशी -विदेशी विद्वानों ने उनकी भूरि -भूरि प्रशंसा की है। विदेशी विद्वान नोम ने कहा है, “भारत का किसान भी दूसरे देश के नेताओं से अधिक सुसंस्कृत है।इ स बात का श्रेय बिना किसी पक्षपात के तुलसी को दिया जा सकता है,क्योंकि आज के भारत का धर्म और संस्कृति तुलसी सम्मत धर्म और संस्कृति है।”