देश के विभाजन में सत्ता और राजनीतिक नेतृत्व की महत्वाकांक्षाओं ने भी निर्णायक भूमिका निभाई। मोहम्मद अली जिन्ना लंबे समय तक मुस्लिम लीग के लिए सत्ता में निर्णायक हिस्सेदारी और मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की अलग राजनीतिक पहचान की मांग करते रहे।
1940 के लाहौर प्रस्ताव के बाद पाकिस्तान की मांग उनकी राजनीति का केंद्र बन गई। 1946 की कैबिनेट मिशन योजना एक ऐसे संघ की संभावना लेकर आई थी, जिसमें भारत एक रह सकता था, लेकिन केंद्र की सीमित शक्तियों और प्रांतीय समूहों की व्यवस्था पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मतभेद गहरे हो गए।
नेहरू के जुलाई 1946 के वक्तव्य ने जिन्ना की आशंकाओं को और बढ़ाया। नेहरू ने कहा कि संविधान सभा किसी पूर्व समझौते से बंधी नहीं होगी और वह अपनी इच्छा के अनुसार संविधान में परिवर्तन कर सकती है। इसके बाद जिन्ना ने कैबिनेट मिशन योजना से पीछे हटकर पाकिस्तान की मांग को और तीखा किया।
ब्रिटिश सरकार ने सत्ता हस्तांतरण की समय-सीमा पहले 1948 रखी थी, लेकिन माउंटबेटन ने इसे 1947 तक आगे कर दिया। इसके बाद विभाजन की प्रक्रिया अत्यंत तेजी से पूरी हुई। जिन्ना की मांग, कांग्रेस की स्वीकृति और माउंटबेटन के क्रियान्वयन ने मिलकर वह परिस्थिति बनाई, जिसके चलते देश का विभाजन हुआ।















