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विभाजन की विभाषिका  :  सैकड़ों एकड़ जमीन छोड़नी पड़ी

जब मैंने 12 साल की उम्र में अपने पिता हासानंद और मां कृष्णादेवी के साथ पाकिस्तान छोड़ा, तब यह सिर्फ एक देश से दूसरे देश जाने की यात्रा नहीं थी। हमें अपना घर, खेत, जमीन-जायदाद और पूरा संसार पीछे छोड़कर भारत आना पड़ा।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 19, 2026, 08:39 pm IST
inभारत
रजनी पंजाबी

रजनी पंजाबी

जब मैंने 12 साल की उम्र में अपने पिता हासानंद और मां कृष्णादेवी के साथ पाकिस्तान छोड़ा, तब यह सिर्फ एक देश से दूसरे देश जाने की यात्रा नहीं थी। हमें अपना घर, खेत, जमीन-जायदाद और पूरा संसार पीछे छोड़कर भारत आना पड़ा। मेरे पिता पाकिस्तान के पैडिदान इलाके के बड़े जमींदार थे। हमारे पास सैकड़ों एकड़ जमीन थी, जिस पर खेती होती थी और वहां मुस्लिम मजदूर काम करते थे। लेकिन विभाजन के बाद हालात ऐसे बने कि हमें अपनी जमीन और घर छोड़कर जान बचाने के लिए भारत आना पड़ा।

14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान ने अपना स्वतंत्रता दिवस मनाया। उसी समय सिंध में रह रहे हिंदुओं के सामने अपना घर-बार छोड़ने का संकट खड़ा हो गया। भारत से मुसलमान पाकिस्तान आ रहे थे, जिन्हें वहां ‘महाजर’ कहा गया। उनके पुनर्वास के लिए घर और जमीन चाहिए थी और इसके लिए पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदुओं की संपत्तियों को निशाना बनाया गया। सिंधियों के घर, दुकानें और जमीनें छीनी गईं। लोगों को घरों से निकालने के लिए मारपीट और लूटपाट हुई। महिलाओं और बेटियों के साथ भी अत्याचार हुए। पुलिस से शिकायत करने पर भी कोई मदद नहीं मिली।

उस समय पाकिस्तान में पंजाब, सिंध और बंगाल भी शामिल थे। हम वहां अखंड भारत के नागरिक के रूप में रहते थे, लेकिन विभाजन के बाद अचानक अपने ही घर में असुरक्षित हो गए। करीब सात लाख सिंधी पाकिस्तान से निकलकर भारत आए और अलग-अलग राज्यों में बस गए।

हालात इतने खराब थे कि लोग अपनी जान बचाने के लिए ट्रेनों में सवार हो गए। कई बार एक ही परिवार के सदस्य अलग-अलग स्टेशनों पर ट्रेन से उतर गए और परिवार बिखर गए।

मेरे पिता जब पाकिस्तान से भारत आए तो हम भी एक शरणार्थी शिविर में रहे। भारत से पाकिस्तान जाने वाले महाजर अपनी संपत्ति भारत में छोड़कर गए थे, जबकि हम जैसे हिंदू अपनी संपत्ति पाकिस्तान में छोड़कर भारत आए थे।

अहमदाबाद आने के कुछ वर्षों बाद मेरी शादी हंसराज पंजाबी से हुई। उनके परिवार की कहानी भी विभाजन और विस्थापन की ही कहानी थी। मेरे ससुर नेवंदराम तनवानी पाकिस्तान सरकार के पीडब्ल्यूडी विभाग में अधिकारी थे। पाकिस्तान छोड़ने के बाद वे सबसे पहले महाराष्ट्र में नासिक के पास एक गांव पहुंचे और 1949 में अहमदाबाद आ गए। पाकिस्तान में सरकारी नौकरी और अपनी स्थिति छोड़कर भारत आने के बाद उनके पास अपने साथ ले जाने के लिए मूल रूप से अपनी संस्कृति और सभ्यता ही बची थी।

अहमदाबाद में उन्होंने साइकिल के पंचर ठीक करने का काम शुरू किया। मेहनत करके उन्होंने अपने बेटे हंसराज को पढ़ाया और उन्हें एलआईसी में अधिकारी बनाया। आगे चलकर हंसराज पंजाबी सामाजिक कार्यकर्ता बने। आज अहमदाबाद नगर निगम ने कुबेरनगर में उनके नाम पर एक सड़क भी बनाई है।

पाकिस्तान से भारत आने वाले सिंधियों ने केवल अपना घर और जमीन नहीं खोई, बल्कि अपने जीवन की पूरी जमा-पूंजी पीछे छोड़ दी। भारत आने वाली ट्रेनों में सिंधियों के कत्लेआम की घटनाओं की स्मृतियां भी हमारे परिवारों में आज तक जीवित हैं।

हम भारत आ गए, नई जिंदगी शुरू की, मेहनत की और अपने बच्चों को आगे बढ़ाया। लेकिन पाकिस्तान में छूटे घर, खेत, जमीन और अपने लोगों की यादें आज भी हमारे साथ हैं। विभाजन हमारे लिए केवल इतिहास की एक तारीख नहीं, बल्कि वह दर्द है जिसे हमारे परिवारों ने अपनी आंखों से देखा और पीढ़ियों तक अपने भीतर ढोया।

Topics: महाजरपुनर्वास व विस्थापनअत्याचार व कत्लेआमअचल संपत्तिसिंधी विस्थापितमूल संस्कृतिmaainविभाजन की विभीषिकाशरणार्थी शिविरअल्पसंख्यक हिंदूपाञ्चजन्य विशेषजमींदार
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