विभाजन की विभीषिका : 'हिंदू अपनी बेटियों को मार देते थे
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विभाजन की विभीषिका : ‘हिंदू अपनी बेटियों को मार देते थे’

भारत विभाजन के समय मेेरी आयु छह वर्ष थी। महमूद कोट में मेरा परिवार रहता था। 1947 की बात है। एक दिन मेरी मां मुझे हनुमान मंदिर ले गईं। वहां हनुमान जी के सामने दो लाशें पड़ी हुई थीं। वे शव मेरे चाचा दीनानाथ कठपालिया के सबसे बड़े साले गिरिधारी लाल की मां और पत्नी के थे।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 18, 2026, 02:00 pm IST
inभारत
डॉ. शाम लाल कठपालिया

डॉ. शाम लाल कठपालिया

भारत विभाजन के समय मेेरी आयु छह वर्ष थी। महमूद कोट में मेरा परिवार रहता था। 1947 की बात है। एक दिन मेरी मां मुझे हनुमान मंदिर ले गईं। वहां हनुमान जी के सामने दो लाशें पड़ी हुई थीं। वे शव मेरे चाचा दीनानाथ कठपालिया के सबसे बड़े साले गिरिधारी लाल की मां और पत्नी के थे। उन्होंने खुद ही मंदिर ले जाकर उनकी हत्या कर दी थी। ऐसे हालात बन गए थे कि हिंदू अपने घर की महिलाओं की हत्या करने को मजबूर थे। मुसलमानों का काफिला आता था, आग लगाता था, मजहबी नारे लगाता था, लूट-पाट करता था और महिलाओं को जबरन उठाकर ले जाता था।

उन दिनों हिंदू जमींदार थे। गांव में 8-10 हिंदू परिवारों के बड़े-बड़े घर थे। हिंदू आबादी गांव में रहती थी, और मुसलमान गांव के बाहर कच्चे मकानों में रहते थे। खेतों में मुसलमान मुजारा (बटाईदार किसान) काम करते थे, वही पशुओं की देखभाल भी करते थे। जब माहौल खराब होने लगा तो हिंदू स्वयं को बचाने के लिए निझावन परिवार की हवेली की छत पर इकट्ठे हो गए। वहीं रोटी-सब्जी भी बन रही थी और तेल की कड़ाई भी गर्म हो रही थी, ताकि गली में दंगाइयों के घुसने पर उन पर गर्म तेल डाला जा सके।

मेरी मां ने मुझे निक्कर पहना रखी थी। बांयीं जेब में खाने के लिए छोले और मीठी खील होती थी और दायीं जेब में पिसी हुई मिर्च होती थी। मिर्च देते हुए मां ने कहा था कि किसी दंगाई को देखते ही उस पर मिर्च का पाउडर फेंकना, ताकि तुम्हारी जान बच सके।

मार-काट के बीच ही एक दिन मेरे परिवार ने भारत आने के लिए रेलगाड़ी पकड़ी। परिवार में पिताजी, माताजी, नानी और दो बहनें थीं। रात के समय अचानक मिंटगुमरी में गाड़ी को रोक दिया गया और सभी को उतार दिया गया। हम लोग स्टेशन के हॉल में पूरी रात एक कोने में दुबके रहे। सुबह हुई तो लोग खुले में ही शौच करने लगे। पास ही एक नहर बह रही थी। सभी लोग उसी का पानी उपयोग कर रहे थे। यह देखकर मुसलमानों ने नहर पर बने एक लकड़ी के पुल पर दो कुत्तों को काट कर लटका दिया। उनके खून से नहर का पानी लाल हो गया और उसी को हम लोगों ने पीया भी। जैसे-तैसे भारत आए, तो जान बची।

-डॉ. शाम लाल कठपालिया
मूल निवासी : महमूद कोट, पाकिस्तान

Topics: विभाजन की त्रासदीभारत-पाकिस्तान विभाजन 1947मजहबी दंगे और हिंसाडॉ. शाम लाल कठपालियामहमूद कोटआत्मरक्षा और महिला बलिमिंटगुमरी स्टेशनविस्थापन और पलायनशरणार्थी और जीवन संघर्षविभाजन की विभीषिकाजमींदार और मुजारापाञ्चजन्य विशेष
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