नागपुर। स्वतंत्रता दिवस पर नागुपर स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने तिरंगा फहराया। उन्होंने अमर बलिदानियों और स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान को याद करते हुए कहा कि देश की आजादी को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी हर नागरिक की है।
डॉ. भागवत ने कहा कि स्वतंत्रता दिवस देश के लिए गर्व और खुशी का अवसर है। 1857 के विद्रोह से लेकर 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति तक करीब 90 वर्षों तक देशवासियों ने अलग-अलग स्तरों पर संघर्ष किया और अनेक लोगों ने अपना जीवन बलिदान किया। स्वतंत्रता के लिए किए गए इस संघर्ष और बलिदान को हमेशा याद रखा जाना चाहिए।
श्री भागवत ने कहा कि भारत स्वतंत्र हो चुका है और उसकी स्वतंत्रता कायम रहेगी, लेकिन देश को मजबूत, सुरक्षित और खुशहाल बनाने की जिम्मेदारी अभी पूरी नहीं हुई है। भागवत ने कहा कि भारत के सामने आज भी कई चुनौतियां हैं। इन चुनौतियों का सामना करते हुए देश को अपने मूल विचारों और सिद्धांतों से जुड़े रहना होगा। उन्होंने देश की एकता, सुरक्षा और विकास के लिए नागरिकों से जिम्मेदारी के साथ योगदान देने का आह्वान किया।
“स्वतंत्रता दिवस हम सबके लिए गौरव का और उत्सव का विषय़ है। 1857 से गिनेंगे तो लगातार 90 वर्ष अनेक प्रकार का त्याग बलिदान देकर हमारे पूर्वजों ने स्वातंत्र्य की प्राप्ति की। उस त्याग और बलिदान का गौरव हमारे मन में है। लेकिन इसके साथ एक भान मन में चाहिए, कि इतना त्याग-परिश्रम करके… pic.twitter.com/1s5t2Jrz3C
— RSS (@RSSorg) August 15, 2026
सरसंघचालक जी ने कहा कि भारत को ऐसा राष्ट्र बनना चाहिए जो विश्व में महत्वपूर्ण और सकारात्मक भूमिका निभा सके। उन्होंने भारत को ‘विश्वगुरु’ बनाने की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही। उन्होंने कहा कि भारत की प्रगति केवल आर्थिक या राष्ट्रीय विकास तक सीमित नहीं होनी चाहिए। देश को अपनी क्षमता और मूल्यों के माध्यम से पूरी मानवता के कल्याण में योगदान देने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। मोहन भागवत ने देशवासियों को आजादी के महत्व को समझने, स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को याद रखने और राष्ट्र के भविष्य को मजबूत बनाने के लिए अपने दायित्वों का निर्वहन करने का संदेश दिया।
सरसंघचालक जी ने कहा कि 1857 से गिनेंगे तो लगातार 90 वर्ष अनेक प्रकार का त्याग बलिदान देकर हमारे पूर्वजों ने स्वातंत्र्य की प्राप्ति की। उस त्याग और बलिदान का गौरव हमारे मन में है। लेकिन इसके साथ एक भान मन में चाहिए, कि इतना त्याग-परिश्रम करके स्वतंत्रता हमको मिली है, उस स्वतंत्रता को कायम रखना और जैसा सावरकर जी ने कहा है – “जे जे उत्तम, उदात्त, उन्नत, महन्मधुर ते ते। स्वतंत्रते भगवती, सर्व तव सहचारी होते” — तो स्वतंत्रता का परिणाम जो-जो उत्तम, उदात्त, उन्नत, महन्मधुर है, वह सब कुछ हमारे देश में अवतीर्ण हो। इसकी आवश्यकता पूर्ण करने का दायित्व भी हमारा बनता है।















