सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कर्नाटक सरकार की उस योजना को परियों की कहानी जैसी बेतुकी बताया, जिसमें UAPA के एक मामले में गवाहों की गवाही पूरी करने में एक साल लगने की बात कही गई थी। कोर्ट ने साफ कहा कि UAPA के मामलों की सुनवाई के लिए बनाई गई स्पेशल कोर्ट पर 12-15 से ज्यादा केस नहीं डाले जाने चाहिए।
चार साल से जेल में बंद आरोपी
यह मामला पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के एक कार्यकर्ता शाहिद खान से जुड़ा है। उन्हें 22 सितंबर 2022 को गिरफ्तार किया गया था। आरोप है कि उन्होंने युवाओं को उग्र बनाने और हिंसक गतिविधियों में शामिल होने का काम किया। साथ ही 2011 से 2019 के बीच PFI के लिए फंड जुटाने में मदद की और कर्नाटक, तमिलनाडु व केरल में CAA, NRC, हिजाब फैसले और बाबरी विध्वंस से जुड़े हमलों की प्लानिंग करने वाले ग्रुप्स की मदद की।
शाहिद खान करीब चार साल से जेल में हैं। अभियोजन पक्ष ने 700 गवाहों के नाम दिए हैं, लेकिन अभी तक उनकी गवाही शुरू भी नहीं हुई है।
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कोर्ट ने नाराजगी जताई थी
एक हफ्ते पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने इसी मामले में देरी पर नाराजगी जताई थी। तब कोर्ट ने कहा था कि किसी आपराधिक मुकदमे की उम्र कछुए जैसी नहीं हो सकती। 5 अगस्त को कोर्ट ने कर्नाटक सरकार से कहा था कि वह बताए कि कितने सुरक्षित गवाहों की गवाही लेनी है और कितने समय में।
सरकार का जवाब और कोर्ट की टिप्पणी
बुधवार को कर्नाटक की ओर से वकील रूह-ए-हिना दुआ ने बताया कि सरकार तीन सुरक्षित गवाहों और 50 अन्य गवाहों की गवाही लेना चाहती है। इसमें लगभग एक साल लग सकता है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने कहा कि इससे राज्य का सुस्त रवैया साफ दिखता है। आरोपी चार साल से बिना ट्रायल जेल में पड़ा है, फिर भी अभियोजन पक्ष ट्रायल का साफ प्लान नहीं बता पा रहा।
कोर्ट का निर्देश
कोर्ट ने कहा कि आरोप गंभीर हैं। इसलिए अभियोजन पक्ष तीन सुरक्षित गवाहों की गवाही तीन महीने में पूरी करे। साथ ही आरोपी, अभियोजन और जमानत पर रहे सह-आरोपियों से कहा गया कि बार-बार अर्जी न लगाएं। याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट आदित्य सोंधी ने बताया कि हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज करते समय स्वतंत्रता और जल्दी ट्रायल के अधिकार पर ध्यान नहीं दिया।














