गत 1 अगस्त को तस्लीमा नसरीन लगभग 19 वर्ष बाद कोलकाता लौटीं। रवींद्र सदन में आयोजित ‘कट्टरता-विरोधी कवि-लेखक सम्मेलन’ में उनका सार्वजनिक स्वागत हुआ। यह केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं था, बल्कि पश्चिम बंगाल की नई राजनीतिक दिशा का प्रतीक बन गया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी सहित अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे।
बता दें कि 1993 में तस्लीमा का उपन्यास ‘लज्जा’ प्रकाशित हुआ। इसमें उन्होंने बाबरी ढांचा विध्वंस के बाद बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचारों का चित्रण किया है। इसके बाद उनके लेखों और सार्वजनिक वक्तव्यों को लेकर कट्टरपंथी संगठनों ने उनके विरुद्ध आंदोलन शुरू कर दिया। फतवे जारी हुए, जान से मारने की धमकियां मिलीं और 1994 में उन्हें अपना देश बांग्लादेश छोड़ना पड़ा। अब तक वह बांग्लादेश वापस नहीं लौट पाई हैं।
कोलकाता बना दूसरा घर
करीब एक दशक विदेश में रहने के बाद 2004 में तस्लीमा भारत आईं। केंद्र सरकार ने उन्हें अस्थायी निवास की अनुमति दी और उन्होंने कोलकाता को अपना निवास बनाया। बांग्ला उनकी मातृभाषा थी, बंगाल की सांस्कृतिक परंपरा से उनका गहरा भावनात्मक संबंध था और वे बंगाली समाचारपत्रों में नियमित रूप से लिखने लगीं। कई अवसरों पर उन्होंने कहा कि कोलकाता उन्हें अपने खोए हुए घर का अहसास कराता है, लेकिन यह सुख अधिक समय तक टिक नहीं सका।
‘द्विखंडितो’ और बढ़ता विवाद
तस्लीमा की आत्मकथा के दूसरे भाग ‘द्विखंडितो’ के प्रकाशन के बाद विवाद और तीखा हो गया। पुस्तक के कुछ अंशों पर मजहबी भावनाएं आहत करने का आरोप लगाया गया। इस पर कानूनी विवाद शुरू हुआ और तत्कालीन बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार ने यह कहते हुए पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया कि इससे सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है। बाद में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने इस प्रतिबंध को निरस्त करते हुए माना कि पुस्तक पर लगाया गया प्रतिबंध उचित नहीं था।
कट्टरपंथ का दबाव और राज्य की परीक्षा
2006 में कोलकाता की टीपू सुल्तान मस्जिद के तत्कालीन इमाम सैयद नूर-उर-रहमान बरकती ने तस्लीमा के विरुद्ध सार्वजनिक रूप से इनाम की घोषणा की। विभिन्न संगठनों ने उन्हें भारत से बाहर भेजने की मांग शुरू कर दी। 2007 में हैदराबाद में उनके एक कार्यक्रम पर हमला हुआ। उसी वर्ष नवंबर में कोलकाता में ऑल इंडिया माइनॉरिटी फोरम के नेतृत्व में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। कई स्थानों पर हिंसा, आगजनी और सड़क जाम की घटनाएं हुईं।
स्थिति इतनी गंभीर हुई कि प्रशासन को सेना की सहायता लेनी पड़ी। यही पश्चिम बंगाल की तत्कालीन वाममोर्चा सरकार की सबसे कठिन परीक्षा थी। लोकतांत्रिक राज्य के सामने दो रास्ते थे-पहला, हिंसा करने वालों पर कठोर कार्रवाई कर कानून का शासन स्थापित करना; दूसरा, विवाद के केंद्र में मौजूद लेखिका को ही शहर से बाहर कर देना।
सरकार ने दूसरा रास्ता चुना
राजनीतिक दबाव के बीच तत्कालीन माकपा नेताओं ने सार्वजनिक रूप से तस्लीमा से कोलकाता छोड़ने की अपील की। अंततः वे दिल्ली पहुंच गईं। जिस शहर को वे अपना दूसरा घर कहती थीं, उसके द्वार उनके लिए बंद हो गए। यहीं से यह विवाद केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं रहा; यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राज्य की वैचारिक प्रतिबद्धता का प्रश्न बन गया।
वामपंथी राजनीति स्वयं को लोकतंत्र, पंथनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा प्रहरी बताती रही है। किंतु तस्लीमा प्रकरण ने यह प्रश्न खड़ा किया कि यदि किसी लेखक की सुरक्षा और अभिव्यक्ति भीड़ के दबाव में सुनिश्चित नहीं की जा सकती, तो उन आदर्शों का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है? इसी संदर्भ में तत्कालीन वरिष्ठ वाम नेता ज्योति बसु का एक चर्चित कथन बार-बार उद्धृत किया जाता है-‘यदि सरकार न चाहे, तो दंगे नहीं होते।’ तो क्या यह मान लेना चाहिए कि तस्लीमा के विरुद्ध उग्र प्रदर्शन में वामपंथी सरकार की भी मिलीभगत थी?
चयनात्मक चुप्पी
तस्लीमा प्रकरण का ‘सबसे पीड़ादायक पक्ष केवल उनका कोलकाता छोड़ना नहीं था, बल्कि उस समय पश्चिम बंगाल के तथाकथित प्रगतिशील और बुद्धिजीवी समाज का मौन भी था। यही वह वर्ग था, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कलाकारों के अधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सबसे मुखर रहता था। किंतु जब एक लेखिका को कट्टरपंथी दबाव के कारण अपना प्रिय शहर छोड़ना पड़ा, तब अधिकांश साहित्यिक संस्थाएं, सांस्कृतिक मंच और विश्वविद्यालय मौन रहे। यही वह बिंदु है, जहां वामपंथ की आलोचना केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक भी बन जाती है।
ममता बनर्जी का दौर
2011 में पश्चिम बंगाल में सत्ता बदली। वाममोर्चा की जगह तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई। अनेक लोगों को उम्मीद थी कि तस्लीमा के लिए कोलकाता के दरवाजे फिर खुलेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वर्षों तक वे इस शहर में स्वतंत्र रूप से नहीं लौट सकीं। यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि एक महिला मुख्यमंत्री, स्वयं कवयित्री और साहित्य-संस्कृति की प्रतिनिधि मानी जाने वाली नेता के शासनकाल में भी एक महिला लेखिका अपने प्रिय शहर से दूर क्यों रही? ममता बनर्जी ने भी मुस्लिम तुष्टिकरण और वोट बैंक के दबाव में लोकतांत्रिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटा।
बदला हुआ बंगाल, बदला हुआ संदेश
4 मई, 2026 को पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हुआ। पश्चिम बंगाल में भाजपा की पहली बार सरकार बनी। इसके बाद लगने लगा कि अब तस्लीमा कोलकाता अवश्य आएंगी और यह दिन जल्दी ही आ गया। 1 अगस्त को कोलकाता के लोगों ने तस्लीमा का जोरदार स्वागत कर फिर से एक नया अध्याय लिखा। तस्लीमा ने भावुक होते हुए कहा, ”आज मैं कोलकाता लौट आई हूं। इन शब्दों को कहने में मुझे उन्नीस वर्ष लग गए। इतने लंबे इंतजार के बाद कोलकाता की धरती पर फिर कदम रखना, मानो अपने जीवन का खोया हुआ अध्याय वापस पा लेना है।”
उन्होंने सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए राज्य सरकार का धन्यवाद देते हुए एक महत्वपूर्ण बात भी कही, ”कृतज्ञता किसी के प्रति राजनीतिक निष्ठा का अनुबंध नहीं होती।” उन्होंने अपनी वापसी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, स्वतंत्र चिंतन और सामान्य लोगों के स्नेह की विजय बताया और कहा, “आज आपने केवल मुझे कोलकाता वापस नहीं बुलाया, बल्कि मेरा खोया हुआ जीवन भी मुझे लौटा दिया है।”
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने तस्लीमा का स्वागत करते हुए कहा, ”पश्चिम बंगाल में आपका हार्दिक स्वागत है। आप जब चाहें, जितनी बार चाहें, यहां आइए। आपकी सुरक्षा की जिम्मेदारी मेरी है।” उन्होंने आगे कहा, “तस्लीमा जी की वापसी केवल सरकार बदलने का संकेत नहीं है, बल्कि यह बताती है कि व्यवस्था भी बदल चुकी है। यह बंगाल अब किसी प्रकार की बेड़ियों और भय से मुक्त है। यहां संविधान का प्रत्येक स्तंभ सुरक्षित है और प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का न्यायसंगत अवसर प्राप्त है।”
राजनीतिक दृष्टि से यह संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण था। जिस भाजपा को वर्षों तक वामपंथी राजनीति ‘सांप्रदायिक’ और ‘फासीवादी’ कहती रही, उसी सरकार ने सार्वजनिक रूप से यह संदेश देने का प्रयास किया कि राज्य का दायित्व किसी लेखक के विचारों से सहमत होना नहीं, बल्कि उसकी सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है।

















