गत 18 जुलाई को पाञ्चजन्य के सहयोगी संपादक रहे श्री आलोक गोस्वामी का निधन हो गया। यह दुखद सूचना उनके चचेरे बड़े भाई श्री ललित गोस्वामी ने पाञ्चजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर को दी। आलोक जी को जानने वाले सहसा इस खबर पर विश्वास नहीं कर सके। अभी तो उनके जाने की आयु बिल्कुल भी नहीं थी। वे कभी बीमार हुए, ऐसी भी बात नहीं थी। अंदर कुछ रखने वाले भी नहीं थे। मन में जो आया, उसे वे बोल देते थे। लेकिन प्रभु जब किसी को ले जाना चाहते हैं, तो कोई बहाना खोज ही लेते हैं। उन्हें नींद में ही सुबह करीब सात बजे हृदयाघात हुआ और केवल 61 वर्ष की उम्र में वे इस दुनिया को छोड़ गए।
इससे पहले उन्होंने लगभग पांच बजे आवाज लगाई थी कि अजवाइन पानी चाहिए। शुचिता भाभी (आलोक जी की धर्मपत्नी) ने पूछा भी कि सब ठीक है, तो उन्होंने कहा कि ठीक है, केवल अजवाइन पानी दे दो। वही पानी पीकर वे फिर से सो गए तो सोते ही रह गए। लगभग आठ बजे तक वे जगे नहीं, तो भाभी जी उनके पास गईं और कहा कि उठो, चाय बन गई है, लेकिन कोई हरकत नहीं हुई। छूने पर पता चला कि शरीर पूरी तरह ठंडा है। वे बदहवास हो गईं और आवाज लगाने लगीं। घर के लोग दौड़े और उन्हें अस्पताल ले जाया गया। वहां डॉक्टर ने कहा कि अब तो कुछ बचा ही नहीं। कागजी कार्रवाई होने तक उनकी मृत देह को अस्पताल के शव-गृह में रख दिया गया।
तब तक उनके परिवार और मित्र मंडली के लोग अस्पताल में जमा हो गए। वहां का माहौल बहुत ही गमगीन था। कोई कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था। सभी दंग कि यह क्या हो गया! श्रुति (आलोक जी की इकलौती पुत्री) बदहवास एक कुर्सी पर बैठी थी और परिवार के लोग ढांढस बंधा रहे थे। इसी बीच कागजी कार्रवाई पूरी हुई और उनके शव को गाजियाबाद के सूर्य नगर स्थित उनके घर ले जाया गया। वहां कुछ देर में विधि-विधान पूरा हुआ और इसके बाद उनका अंतिम संस्कार गीता कॉलोनी, श्मशान घाट, दिल्ली में कर
दिया गया।
आलोक जी की वाक्पटुता, सहनशीलता, बुद्धिमत्ता, स्मरणशक्ति, कर्तव्यनिष्ठा और निर्लिप्तता गजब की थी। वे जितने धर्म और संस्कृति के मर्मज्ञ थे, उतने ही सिनेमा, संगीत और विदेश मामलों के भी जानकार थे। हिंदी और अंग्रेजी भाषा पर उनकी जबर्दस्त पकड़ थी और पंजाबी तथा ब्रज भाषा अच्छी तरह बोलते थे। उन्होंने लगभग 30 वर्ष तक पाञ्चजन्य को अपनी सेवाएं दीं। वे अक्तूबर, 1996 में एक संवाददाता के रूप में ‘पाञ्चजन्य’ से जुड़े थे। इसके बाद उन्होंने ब्यूरो प्रमुख, सहयोगी संपादक जैसे दायित्वों को संभाला। फरवरी, 2008 में तरुण विजय जी ‘पाञ्चजन्य’ को छोड़कर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी न्यास में चले गए। करीब छह महीने बाद अगस्त, 2008 में बल्देव भाई शर्मा जी को ‘पाञ्चजन्य’ के संपादक की जिम्मेदारी मिली। इस दौरान लगभग छह महीने तक देवेंद्र स्वरूप जी के मार्गदर्शन और आलोक जी के संपादकत्व में ही ‘पाञ्चजन्य’ के अंक प्रकाशित हुए।
16 सितंबर, 2025 को वे सेवानिवृत्त हो गए थे। सेवानिवृत्ति के दिन उन्हें विधिवत विदाई अवश्य दी गई, लेकिन कार्य से मुक्त नहीं किया गया। संपादक हितेश जी ने उसी दिन घोषणा की कि ‘पाञ्चजन्य’ के अगले वार्षिक उत्सव के बाद ही आलोक जी कार्यमुक्त माने जाएंगे। ऐसा संस्थान में पहली बार हुआ। इस तरह उन्होंने जनवरी, 2026 तक ‘पाञ्चजन्य’ की सेवा की। वे काम के इतने पक्के थे कि सहकर्मियों में यह विश्वास था कि यदि आलोक जी ने देख लिया है, तो सब ठीक ही होगा। यह विश्वास उन्होंने अपने कर्मों और व्यवहार से जीता था। यही उनकी सबसे बड़ी पहचान थी।
आलोक जी की जड़ वृंदावन के गोस्वामी परिवार में है। उनका जन्म 16 सितंबर, 1965 को दिल्ली में ही हुआ था। उनके पिताजी डॉ. बाबूलाल गोस्वामी दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक थे। वे श्यामलाल कॉलेज के प्राचार्य पद से 1996 में सेवानिवृत्त हुए। इन दिनों वे आयु-जनित बीमारियों से पीड़ित हैं। एक वृद्ध पिता के कांपते हाथों ने पुत्र की अर्थी को घर से विदा किया। इससे बड़ा दु:ख उनके लिए और क्या हो सकता है। तीन भाइयों में आलोक जी मंझले थे। बड़े भाई अरविंद गोस्वामी जी सरकारी सेवा में थे। छोटे भाई अभिनव गोस्वामी जी एक रिफाइनरी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं। बिटिया श्रुति बी.टेक करके एक कंपनी में कार्यरत है। आलोक जी बातचीत में बताते थे कि बिटिया का विवाह हो जाए, तो गंगा नहा लेंगे, लेकिन उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो पाई।
ऐसे कर्मठ और समर्पित सहयोगी रहे स्व.आलोक गोस्वामी को पूरा ‘पाञ्चजन्य’ परिवार भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

















