फ्रांस के दक्षिण-पश्चिमी जंगलों में लगी भयानक आग द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की सबसे बड़ी त्रासदी बन गई है, जिससे 2,20,000 से अधिक लोग बेघर हो गए हैं, जिन्हें सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया है। लगभग 42,000 हेक्टेयर भूमि जलकर राख हो गई है। गिरोंडे और लैंड्स क्षेत्र के बाद ऐतिहासिक शहर बोर्दो के पास तक आग पहुंच गई है। फ्रांस सरकार ने 1,500 सैनिकों और हजारों दमकलकर्मियों को बचाव के लिए लगाया है। स्पेनिश सीमा को जोड़ने वाला ए63 राजमार्ग और कई रेल सेवाएं बंद हुई हैं।
आग के भयानक होने के कारण
भीषण हीटवेव है और तापमान 38°C से ऊपर जाने के कारण सूखे पेड़ों और घास ने आग पकड़ ली। आग की भयानकता फ्रांस और स्पेन तक ही सीमित नहीं है। इटली ने अपने एड्रियाटिक तट से सैकड़ों लोगों को निकाला क्योंकि अलग-अलग जगहों पर लगी आग पुगलिया में फैल गई, जबकि स्कॉटलैंड और अन्य भूमध्यसागरीय देशों ने भी आग भड़कने की सूचना दी है।
दक्षिण-पश्चिमी यूरोप दशकों में सबसे भीषण जंगल की आग की ऐसी स्थिति का सामना कर रहा है।
फ्रांस में 22 जुलाई को मेडोक के सौमोस के पास लगी आग लेगे-कैप-फेरेट की ओर तेजी से बढ़ी, जिससे पूरे अर्काशोन खाड़ी क्षेत्र को खाली कराना पड़ा। 26 जुलाई तक आग की लपटें बोर्डो से केवल 15 किमी दूर थीं।
फ्रांस में पहली बार बना ‘फायर क्लाउड’, बढ़ी मुश्किलें
फ्रांस में पहली बार आग वाले बादलों (Fire Cloud) से स्थिति और भयावह हुई है। आग से बनने वाले ये बादल बड़ी आग या ज्वालामुखी फटने से निकलने वाली तेज गर्मी से बनते हैं। इनसे बिजली कड़कती है व जलते हुए अंगारे निकलते हैं, जिनसे और आग लग सकती है। साथ ही इनसे तेज एवं अनिश्चित हवाएं चलती हैं, जो आग को और भड़काती हैं व अंगारों को फैलाती हैं।
हालांकि कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में इस तरह की आग अक्सर लगती रहती है, लेकिन फ्रांस में यह पहली बार हुआ है। फायर क्लाउड की घटना अग्निशमन कर्मियों के लिए बहुत बड़ी चुनौतियां पैदा करती है। नासा के अनुसार, ये बादल आग बुझाने की कोशिशों में रुकावट डालते हैं।
फ्रांस और स्पेन में बड़े स्तर पर राहत एवं बचाव अभियान
फ्रांस में लगभग 2,20,000 लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया गया है, जबकि स्पेन में एक लाख लोगों को अपने घर छोड़ने या सुरक्षित ठिकाना तलाशने के लिए कहा गया है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा है कि आने वाले दिन अधिक मुश्किल भरे होंगे, परन्तु हमें डटे रहना होगा। हम सब मिलकर यह लड़ाई जीतेंगे। पूरा देश साथ है।
स्पेन में आग बुझाने के काम में तुर्किये, इटली और ग्रीस के विमानों के साथ-साथ पुर्तगाल की टीम भी शामिल हो रही है। पेरिस के अनुरोध पर स्विट्जरलैंड, फ्रांस की मदद के लिए दो सुपर प्यूमा हेलीकॉप्टर व उनके क्रू भेज रहा है। फ्रांस में यह आग पेरिस से चार गुना बड़े इलाके को अपनी चपेट में ले चुकी है, जबकि मैड्रिड के पश्चिम में अविला के पहाड़ी और ग्रामीण इलाकों में लगी आग स्पेन के इतिहास की सबसे बड़ी आग बन गई है। इसके चपेट में आया क्षेत्र बार्सिलोना के आकार से पांच गुना बड़ा है।
क्या होती है जंगल की आग?
जंगल की आग, झाड़ियों में लगने वाली आग या बुशफायर ज्वलनशील वनस्पति वाले क्षेत्र में लगने वाली एक अनियोजित और अनियंत्रित आग होती है। आधुनिक वन प्रबंधन अक्सर आग के खतरे को कम करने और प्राकृतिक वन चक्रों को बढ़ावा देने के लिए नियंत्रित आग लगाता है। यदि नियंत्रित आग नियंत्रण रेखाओं से बाहर निकल जाती है, तो वह जंगल की आग में बदल जाती है।
साइबेरिया (रूस), कैलिफ़ोर्निया, वाशिंगटन, ओरेगन, टेक्सास, फ़्लोरिडा (संयुक्त राज्य अमेरिका), ब्रिटिश कोलंबिया (कनाडा) और ऑस्ट्रेलिया सहित कुछ क्षेत्रों में जंगल की आग एक सामान्य आपदा है। इसके प्रभावों में धुएं और आग के प्रत्यक्ष स्वास्थ्य संबंधी प्रभाव, संपत्ति का विनाश (विशेषकर वन्यभूमि-शहरी सीमावर्ती क्षेत्रों में) और आर्थिक हानि सम्मिलित हैं। जल और मिट्टी के दूषित होने की भी संभावना रहती है।
जंगल की आग और जलवायु परिवर्तन का संबंध
वैश्विक स्तर पर मानवीय गतिविधियों ने जंगल की आग के प्रभावों को और भी बदतर बना दिया है, जिससे प्राकृतिक स्तरों की तुलना में जंगल की आग से झुलसे भूमि क्षेत्र में दोगुनी वृद्धि हुई है। जंगल की आग से निकलने वाला कार्बन वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता को बढ़ाता है और इस प्रकार ग्रीनहाउस प्रभाव में योगदान कर सकता है। इससे जलवायु परिवर्तन का प्रतिफल बनता है।
जंगल की आग के प्राकृतिक और मानवजनित कारण
प्राकृतिक घटनाएं, जो मानव हस्तक्षेप के बिना जंगल की आग को प्रज्वलित कर सकती हैं, उनमें बिजली गिरना, ज्वालामुखी विस्फोट, चट्टान गिरने से निकलने वाली चिंगारियां और स्वतः दहन सम्मिलित हैं।
मानवजनित आग के स्रोतों में आगजनी, आकस्मिक प्रज्वलन, या भूमि-सफाई और कृषि में आग का अनियंत्रित उपयोग जैसे कि स्लैश-एंड-बर्न खेती शामिल हो सकते हैं। उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में किसान अक्सर शुष्क मौसम के दौरान खेतों को साफ करने के लिए स्लैश-एंड-बर्न विधि का अभ्यास करते हैं। मध्य अक्षांशों में जंगल की आग के सबसे आम मानवीय कारण चिंगारी उत्पन्न करने वाले उपकरण (चेनसॉ, ग्राइंडर, घास काटने की मशीन आदि), ओवरहेड बिजली लाइनें और आगजनी हैं। मानवजनित आगजनी के कारण 20% से अधिक आग लग सकती है, हालांकि शिविरों में आग जलाना, बिजली लाइन की विफलता और उपकरणों का उपयोग जैसी मानवीय गतिविधियां लगभग 85% जंगल की आग के लिए जिम्मेदार हैं। इन ज्वलन स्रोतों का शुष्क परिस्थितियों के साथ संयोजन अधिक बार और भीषण आग का कारण बनता है।
कोयला खदानों की आग भी बनती है बड़ी वजह
दुनिया भर में हजारों कोयले की खदानों में आग लगी रहती है, जैसे कि बर्निंग माउंटेन (न्यू साउथ वेल्स), सेंट्रलिया (पेंसिल्वेनिया) और चीन में। कोयले से प्रेरित ये आग अप्रत्याशित रूप से भी भड़क सकती हैं और आसपास के ज्वलनशील पदार्थों को प्रज्वलित कर सकती हैं।
विश्व युद्ध के गोले भी मिले
फ्रांस के दक्षिण-पश्चिम में बसे गांव ले पोर्जे में विश्व युद्ध-2 के 400 से अधिक गोले और अन्य विस्फोटक मिले हैं। भीषण आग के कारण गांव के लगभग 3,500 परिवारों को घर छोड़ना पड़ा था। आग शांत होने के बाद हो रही जांच में यह सब मिला। अधिकारियों के अनुसार तेज आग के कारण कुछ गोलों के फटने से ही इस विषय में पता चला है।
इतिहास की सबसे भीषण जंगल की आग
इतिहास की सबसे बड़ी और भीषण जंगल की आग में 2003 की साइबेरियाई टैगा आग (रूस) और 2019-2020 की ऑस्ट्रेलियाई जंगल की आग सम्मिलित हैं, जिन्होंने 42 मिलियन एकड़ जमीन को प्रभावित किया। साइबेरियाई टैगा (रूस) में अत्यधिक गर्मी और सूखे के कारण लगी भयंकर आग ने लगभग 5.5 करोड़ एकड़ (55 मिलियन एकड़) क्षेत्र को बर्बाद कर दिया था, जिससे भारी संख्या में वन्यजीव और इमारतें नष्ट हुईं।
1910 में इडाहो और मोंटाना राज्यों में लगी आग ने लगभग 30 लाख एकड़ जंगल को कुछ ही दिनों में जलाकर खाक कर दिया था।
भारत में भी हर वर्ष लगती हैं भीषण जंगल की आग
भारत के जंगलों में भीषण आग की घटनाएं गर्मियों (मार्च से जून) में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा और मध्य प्रदेश राज्यों में होती रहती हैं। वर्ष 2016 में उत्तराखंड राज्य के विभिन्न जिलों में भीषण आग लगी थी, जिसमें 3,500 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र जलकर राख हो गया था। बांदीपुर टाइगर रिजर्व (कर्नाटक) में फरवरी 2019 में भयंकर आग लगी थी, जिससे 10,000 एकड़ से अधिक का जंगल बर्बाद हो गया था। वर्ष 2021 में जनवरी में जुकोऊ घाटी (नागालैंड-मणिपुर सीमा), फरवरी-मार्च में सिमलीपाल राष्ट्रीय उद्यान (ओडिशा) और अप्रैल में उत्तराखंड के जंगलों में बड़े स्तर पर आग की घटनाएं हुईं।
भारत के पहाड़ी राज्यों में भीषण गर्मी और सूखे मौसम के कारण वर्ष 2026 में जंगलों में भयंकर आग लगी, जिससे शिमला, राजौरी और रुद्रप्रयाग के वन क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। आग इतनी विकराल हो गई कि वायुसेना के एमआई-17 हेलीकॉप्टरों को पानी का छिड़काव कर आग बुझानी पड़ी।
जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे का संकेत
जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं का ही एक प्रभाव जंगल की आग है, जिस पर विशेष ध्यान न दिया गया तो शहर भी नहीं बचेंगे।













