यह श्लोक ‘संकट के समय नैतिक सिद्धांतों की रक्षा’ और ‘सांस्कृतिक स्वाभिमान’ का अद्भुत संदेश देता है।
श्लोक-
भारतीयं सदाचारं स्वधर्मश्चापि शाश्वतम्
न त्याज्यो देशभक्तैर्हि प्राणैः कण्ठगतैरपि॥
भावार्थ-
कण्ठगत प्राण होने पर भी अर्थात् प्राणों पर विपत्ति आने पर भी, अपने देश का सदाचार नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि आचार का त्याग देश के जीवन का हनन करता है। अतः देशभक्तों को सदाचार का कभी भी परित्याग नहीं करना चाहिए।
आज का प्रासंगिक-
किसी देश का उत्थान केवल आर्थिक या वैज्ञानिक प्रगति से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के नैतिक आचरण से होता है। “आचार का त्याग देश के जीवन का हनन करता है”—यह पंक्ति स्पष्ट करती है कि भ्रष्टाचार, स्वार्थ और चरित्रहीनता किसी भी राष्ट्र को आंतरिक रूप से कमजोर बनाती है।

















