नागपुर (महाराष्ट्र)। भारतीय शिक्षण मंडल के तत्वावधान में नागपुर स्थित प्रसिद्ध धनवटे नेशनल कॉलेज में भव्य ‘व्यास पूजन’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया. इस प्रेरणादायी और चिंतनशील कार्यक्रम में भारतीय शिक्षण मंडल के राष्ट्रीय संगठन मंत्री बी. शंकरानंद जी ने मुख्य वक्ता के रूप में शिरकत की और भारतीय ज्ञान परंपरा, गुरु-शिष्य संबंध तथा जीवन मूल्यों पर सारगर्भित विचार व्यक्त किए.
अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि व्यास पूजन केवल महर्षि वेदव्यास का स्मरण करने का औपचारिक आयोजन नहीं है, बल्कि उनके विचारों, आदर्शों एवं जीवन मूल्यों को अपने दैनिक जीवन में उतारने का दृढ़ संकल्प है. भारतीय संस्कृति में ज्ञान दिशा दिखाता है और ज्ञान प्रदान करने वाले गुरु का स्थान अनन्य एवं सर्वोच्च है.
“सच्चा गुरु वही, जो जीवनभर सीखता रहता है”
बी. शंकरानंद जी ने गुरु तत्व की विशद व्याख्या करते हुए कहा कि ‘गुरु’ कोई पद, उपाधि अथवा प्रबंधन व्यवस्था नहीं है. सच्चा गुरु वही होता है जो जीवनभर विद्यार्थी बनकर सीखता रहता है और अपने ज्ञान, पवित्र आचरण तथा व्यक्तित्व से समाज का अटूट विश्वास अर्जित करता है.
उन्होंने रेखांकित किया कि ‘गुरु’ शब्द की व्यापकता और गहराई इतनी अधिक है कि दुनिया की किसी भी अन्य भाषा में इसका पूर्ण विकल्प नहीं मिला है, जिसके कारण कई पश्चिमी देशों ने भी इसे मूल रूप में ही अंगीकार किया है.
“यदि विद्यालयों के साथ-साथ बैंकों, उद्योगों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और समाज के प्रत्येक संस्थान में भी ‘गुरु-तत्त्व’ का सम्मान और व्यास पूजन का भाव प्रारंभ हो जाए, तो भारत को पुनः ‘विश्वगुरु’ के पद पर आसीन होने से कोई शक्ति नहीं रोक सकती।” – बी. शंकरानंद जी, संगठन मंत्री, भारतीय शिक्षण मंडल
एक नजर में समझें व्यास पूजन कार्यक्रम के मुख्य बिंदु
| पहलू | कार्यक्रम का विवरण |
|---|---|
| आयोजक संस्था | भारतीय शिक्षण मंडल (BSM). |
| कार्यक्रम का स्थान | धनवटे नेशनल कॉलेज, नागपुर (महाराष्ट्र). |
| मुख्य वक्ता | बी. शंकरानंद जी (संगठन मंत्री, भारतीय शिक्षण मंडल). |
| मुख्य संदेश | गुरु-शिष्य परंपरा का सम्मान, यज्ञमय जीवन और ‘नर’ से ‘नारायण’ बनने की दिशा में अग्रसर होना. |
यज्ञमय जीवन और स्वामी विवेकानंद का संदेश
भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद का उल्लेख करते हुए मुख्य वक्ता ने कहा कि गुरु-शिष्य का संबंध अद्वितीय है. व्यक्ति को सजीव एवं निर्जीव दोनों माध्यमों से सीखने की दृष्टि और सहज मानसिकता विकसित करनी चाहिए.
संबोधन के प्रमुख प्रेरक तत्व:
- यज्ञमय जीवन: जीवन केवल व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि परहित, समाज सेवा और लोकमंगल के लिए समर्पित होना चाहिए. यज्ञ का वास्तविक अर्थ अहंकार (‘मैं’) का त्याग करना है.
- Be Good, Do Good: स्वामी विवेकानंद के प्रसिद्ध संदेश का स्मरण कराते हुए स्वयं को श्रेष्ठ बनाने और समाज के लिए उपयोगी बनने का आह्वान किया गया.
- कर्म ही पूजा: पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पवित्र पद्धति है. जब प्रत्येक कार्य को पूजा के भाव से किया जाता है, तो मनुष्य ‘नर’ से ‘नारायण’ की ओर बढ़ता है.
धनवटे नेशनल कॉलेज में आयोजित यह कार्यक्रम उपस्थित शिक्षाविदों, विद्यार्थियों और नागरिकों में भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति अपार श्रद्धा और गौरव जागृत करने वाला साबित हुआ.
















