नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली स्थित कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया के डिप्टी चेयरमैन हॉल में सांस्कृतिक गौरव संस्थान की ओर से एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया. इस संगोष्ठी का विषय “किशोरावस्था में सहमति-आधारित संबंध: चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं कानूनी परिप्रेक्ष्य” था. इसमें देश की न्यायपालिका, चिकित्सा, मनोविज्ञान, शिक्षा और कानून क्षेत्र के शीर्ष विशेषज्ञों ने समकालीन भारत में किशोरों से जुड़ी चुनौतियों पर गंभीर मंथन किया.
विस्तृत विचार-विमर्श के बाद संगोष्ठी में शामिल सभी विशेषज्ञों ने सर्वसम्मति से यह निष्कर्ष दिया कि सहमति की वर्तमान कानूनी आयु (18 वर्ष) में कोई बदलाव या ढील नहीं दी जानी चाहिए. विशेषज्ञों का स्पष्ट मत था कि किशोरावस्था एक संवेदनशील भावनात्मक विकास की अवस्था है और बाल सुरक्षा कानूनों से कोई समझौता नहीं होना चाहिए.

विशिष्ट पैनल और विशेषज्ञों के मुख्य वक्तव्य
संगोष्ठी की अध्यक्षता सांस्कृतिक गौरव संस्थान के अध्यक्ष कपिल खन्ना ने की तथा संचालन धर्मशास्त्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (जबलपुर) के प्रोफेसर डॉ. अनिमेष झा ने किया. पैनल में शामिल दिग्गजों ने अपने विचार रखे:
“कानून में नाबालिगों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बनी रहनी चाहिए। सहमति की वैधानिक आयु 18 वर्ष ही रहनी चाहिए ताकि किशोरों को किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार या शोषण से बचाया जा सके।” – न्यायमूर्ति विनीत सरन, पूर्व न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय
- वरिष्ठ अधिवक्ता आलोक कुमार: सहमति की आयु में किसी भी प्रकार की ढील बच्चों को प्राप्त कानूनी संरक्षण को कमजोर कर सकती है. बाल संरक्षण कानूनों का संतुलित और संवेदनशील क्रियान्वयन बेहद आवश्यक है.
- प्रो. डॉ. राजेंद्र के. धमीजा (निदेशक, IHBAS): किशोरों का मस्तिष्क, भावनात्मक और तंत्रिका संबंधी विकास वयस्कता तक जारी रहता है. कानूनी उम्र घटाने के बजाय मानसिक स्वास्थ्य सहायता, परामर्श और पारिवारिक मार्गदर्शन अधिक प्रभावी उपाय हैं.
- साध्वी प्रज्ञा भारती: चरित्र, संयम और पारिवारिक मूल्य ही स्वस्थ समाज का आधार हैं. नैतिक शिक्षा, आध्यात्मिक जागरूकता तथा संबंधों के प्रति सम्मान बच्चों के संस्कारों का हिस्सा बनने चाहिए.
- डॉ. सुरेंद्र जैन (प्रख्यात शिक्षाविद्): विद्यालयों और शिक्षण संस्थानों को केवल किताबों तक सीमित न रखकर मूल्य-आधारित शिक्षा, जीवन-कौशल और भावनात्मक बुद्धिमत्ता को मुख्यधारा के पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए.
भारतीय नैतिक मूल्यों और परिवार संस्था को सुदृढ़ करने पर बल
संगोष्ठी में इस बात को प्रमुखता से रेखांकित किया गया कि केवल कानून के बल पर सामाजिक चुनौतियों का समाधान संभव नहीं है. पैनल ने माना कि समाधान सहमति की आयु कम करने में नहीं, बल्कि भारतीय पारंपरिक पारिवारिक व्यवस्था को सशक्त बनाने और जिम्मेदारी व अनुशासन पर आधारित संस्कारों को बढ़ावा देने में है.

संगोष्ठी की प्रमुख सिफारिशें व निष्कर्ष:
- कानून का निष्पक्ष क्रियान्वयन: वर्तमान बाल संरक्षण कानूनों (POCSO आदि) का संवेदनशीलता और निष्पक्षता के साथ पालन हो.
- मूल्य-आधारित शिक्षा: स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रमों में नैतिक मूल्यों और जीवन-कौशल को अनिवार्य किया जाए.
- अभिभावकीय सहभागिता: माता-पिता और अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ खुला व पारदर्शी संवाद बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाए.
- डिजिटल साक्षरता व परामर्श: किशोरों के लिए व्यवस्थित काउंसिलिंग, डिजिटल साक्षरता और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता अभियान चलाए जाएं.
संस्थान के अध्यक्ष कपिल खन्ना ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि भारत की सभ्यतागत चेतना अधिकारों और कर्तव्यों के बीच संतुलन सिखाती है. सहमति की आयु 18 वर्ष बनाए रखते हुए पारिवारिक मार्गदर्शन और सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत करना ही हमारे युवाओं के सुरक्षित भविष्य की कुंजी है.











