पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में जो भी हो रहा है, वह अप्रत्याशित नहीं है। आतंकवाद को औजार और फौजी बूटों के नीचे आधारभूत अधिकारों के लिए उठती आवाजों को कुचल देने के अति-आत्मविश्वास ने अन्य इलाकों की तरह अधिक्रांत कश्मीर में भी पाकिस्तान विरोधी हवा को बवंडर बना दिया है। लगभग डेढ़ माह से अधिक समय हो चुका है और आंदोलन थमने का नाम नहीं ले रहा। फौजी कार्रवाई में बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने और आंदोलन का नेतृत्व करने वाले पहली और दूसरी पंक्ति के नेताओं को गिरफ्तार कर लिए जाने के बाद भी विरोध प्रदर्शन और व्यापक हो गया है। अन्याय और जुल्म से आजादी के नारे धीरे-धीरे पाकिस्तान से आजादी में बदलते जा रहे हैं।
पीओजेके में समय-समय पर बुनियादी जरूरतों के लिए विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं और यह सब विशेष रूप से तब शुरू हुआ जब भारत ने अनुच्छेद 370 और 35-ए को हटाकर कश्मीर को जनहितकारी योजनाओं के लिए खोल दिया और पूरे क्षेत्र में विकास गतिविधियों ने जोर पकड़ा, आम लोगों का जीवन बेहतर हुआ। लेकिन इस वर्ष जून में अधिक्रांत कश्मीर में जो विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ, वह हर बीतते दिन के साथ और व्यापक होता चला गया। हाल के वर्षों में पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर में कोई भी विरोध प्रदर्शन इतना लंबा नहीं चला। स्थिति यह है कि फौज ने मुजफ्फराबाद को जोड़ने वाले सभी राजमार्गों पर सेना की बख्तरबंद गाड़ियां और कंटीली बाड़ लगाकर प्रदर्शनकारियों को शहर में आने से रोकने का इंतजाम किया है जबकि लोग छोटे-छोटे जत्थों में पैदल रास्तों से लगातार राजधानी पहुंच रहे हैं। यही कारण है कि मुजफ्फराबाद में प्रदर्शनकारियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पाकिस्तान की नीतियों ने पीओजेके को मुट्ठी की रेत जैसा बना दिया है जिसे जितना कसकर पकड़ो, उतनी ही तेजी से फिसलती जाती है।
नारों की जुबानी
पीओजेके कैसे पाकिस्तान के हाथ से निकलता जा रहा है, इसे नारों की यात्रा से समझा जा सकता है। 2023 के आंदोलन में मुख्य रूप से आटा-बिजली और सब्सिडी की मांग को लेकर नारे लगे। जैसेः “महंगाई बंद करो, सब्सिडी बहाल करो”, “आटा-बिजली हमारा हक है, भीख नहीं ये अधिकार है”, “बिजली हमारी, दरें तुम्हारी- नहीं चलेगी, नहीं चलेगी”, “मुफ्त बिजली हमारा हक है”, “हमारे हक पर डाका डालना बंद करो”। लेकिन जब पाकिस्तान ने समझौतों पर अमल नहीं किया और 2024 में फिर से विरोध फूटा, तब नारों में अलगाववादी पुट आ गया। उस वर्ष मई में जब ‘जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी’ (जैक) ने मुजफ्फराबाद की ओर मार्च किया और पाकिस्तानी रेंजर्स की गोलियों में कई लोगों की जान चली गई, तब पहली बार बड़े पैमाने पर सीधे-सीधे पाकिस्तान से आजादी के नारे लगे: “हम क्या चाहते? – आजादी!”, “छीन के लेंगे आजादी!”, “गासिब (कब्जा करने वाला) पाकिस्तान – वापस जाओ, वापस जाओ!”, “आजाद कश्मीर को गुलाम बनाना – बंद करो, बंद करो!”
जब इससे भी बात नहीं बनी और फिर से हुए समझौते पर भी अमल नहीं हुआ तो 2025 के सितंबर-अक्तूबर में हुए प्रदर्शन के दौरान नारों की जुबान और आक्रामक हो गई। तब नारे लगे- “हम क्या चाहें, पाक फौज से आजादी”, “इस्लामाबाद की गुलामी- नामंजूर, नामंजूर”, “यह जो दहशतगर्दी है, उसके पीछे वर्दी है”, “पाकिस्तान का कब्जा मंजूर नहीं, मंजूर नहीं”, “कारगिल का रास्ता खोलो- अपनों से मिलने दो”।
अभी चल रहे आंदोलन के दौरान जो नारे लग रहे हैं, वे इसी क्रम में आगे बढ़ते, लेकिन पाकिस्तानी कब्जे को पीछे धकेलते दिख रहे हैं। इस बार नारे लग रहे हैं- “कश्मीर पाकिस्तान की रियासत का हिस्सा नहीं, हिस्सा नहीं ”, “हम जानें, हिन्दुस्तान जाने, जम्मू-कश्मीर जाने”, “हमारा मसला है, हमारा मुल्क है, तुम्हारा क्या काम है”, “तुम रियासत से बाहर निकलो”, “आर पार का रास्ता खोलो, अपनों से मिलने दो”, “इससे बेहतर तो हम भारत के कश्मीर से जुड़ जाएं”। स्पष्ट है, पीओजेके में पाकिस्तान के अवैध कब्जे की बेड़ियों को तोड़ने की भावना मजबूत होती जा रही है।
वक्त नया, गलती पुरानी
पाकिस्तान ने हमेशा की तरह इस बार भी हालात और आंदोलन की प्रकृति का गलत अनुमान लगाया। उसने मान लिया कि यदि विरोध प्रदर्शन का आयोजन करने वाली ‘जैक’ की मुश्कें कस दी जाएं तो आंदोलन खत्म हो जाएगा। इसी गलतफहमी में उसने आतंकवाद विरोधी कानून के अंतर्गत जैक को प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया और फिर संगठन के नेता शौकत नवाज मीर समेत शीर्ष लोगों को गिरफ्तार कर लिया। फौज ने ‘जैक’ की पहली और दूसरी पंक्ति के नेताओं को पकड़कर मान लिया कि नेतृत्वविहीनता में आंदोलन बिखर जाएगा। लेकिन हुआ इसका उलटा। स्थानीय व्यापारी संघों, वकील संघों और छात्र संघों ने अपने-अपने स्तर पर कमान संभाल ली और इसका परिणाम यह हुआ कि आंदोलन और व्यापक हो गया। स्थिति यह है कि न केवल मुजफ्फराबाद बल्कि रावलकोट, तरारखल, पुंछ सेक्टर, नीलम घाटी, कोटली समेत अधिक्रांत कश्मीर के विभिन्न शहरों में आम लोगों और फौज के बीच सीधी झड़पें हो रही हैं।
दशकों का दर्द
पीओजेके का यह विद्रोह कोई अचानक उठी राजनीतिक लहर नहीं है, बल्कि यह दशकों से जारी आर्थिक शोषण, औपनिवेशिक मानसिकता और बार-बार की गई वादाखिलाफी से टूटे अवाम के सब्र का विस्फोट है। ‘जैक’ के नेतृत्व में जब लाखों लोग सड़कों पर उतरे, तो उसके पीछे दैनिक जीवन को दूभर बना देने वाली बेतहाशा कीमतें थीं। अधिक्रांत कश्मीर की अपनी नदियों और जल संसाधनों से महज 2.50 रुपये प्रति यूनिट की लागत पर पनबिजली पैदा होती है, लेकिन इस्लामाबाद का नेशनल ग्रिड उसे स्थानीय नागरिकों को ही 20 से 48 रुपए प्रति यूनिट की दरों पर बेचता है। इसी तरह, गेहूं पर मिलने वाली सरकारी सब्सिडी खत्म किए जाने से 40 किलोग्राम आटे के थैले की कीमत 3,000 से 3,200 रुपये तक पहुंच गई।
इस जनाक्रोश के बार-बार उबलने का सबसे बड़ा कारण इस्लामाबाद का विश्वासघात है। पिछले आंदोलनों के दौरान पाकिस्तान सरकार और स्थानीय कठपुतली प्रशासन ने ‘जैक’ के साथ कम से कम दो बार औपचारिक समझौते किए थे। दिसंबर 2023 और फिर मई 2024 के समझौतों में यह लिखित वादा था कि लोगों को उत्पादन लागत पर बिजली दी जाएगी और आटे पर सब्सिडी बहाल की जाएगी। लेकिन दोनों ही बार जैसे ही प्रदर्शन ठंडा पड़ा, इस्लामाबाद वादों से मुकर गया और लोगों के विरोध को दबाने के लिए दमन का रास्ता चुना। बार-बार तोड़े गए इन समझौतों ने जनता के भीतर सरकार के प्रति भरोसे को पूरी तरह खत्म कर दिया, जिससे लोग इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि अब बिना आर-पार की लड़ाई के कुछ हासिल नहीं होने वाला।
हाल कंगाली का
लेकिन इस पूरे मामले की एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि पाकिस्तान सरकार चाहकर भी अपने वादों को पूरा करने की स्थिति में नहीं है। पाकिस्तान की आर्थिक कंगाली इतनी विकराल हो चुकी है कि वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के 7 अरब डॉलर के बेलआउट पैकेज की अत्यंत सख्त शर्तों में बंधा हुआ है। कोष की स्पष्ट शर्त है कि सरकार बिजली, ईंधन या खाद्यान्न पर किसी भी तरह की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सब्सिडी नहीं दे सकती और करों की वसूली बढ़ाएगी। कंगाली के इस आलम में इस्लामाबाद के पास इतना वित्तीय कोष नहीं है कि वह अलग से राहत दे सके। मंगला और नीलम-झेलम बांधों से पैदा होने वाली सस्ती बिजली को भी पाकिस्तान अपने पंजाब प्रांत के उद्योगों और सैन्य प्रतिष्ठानों में खपाने के लिए मजबूर है। पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति आज उस वेंटिलेटर पर है, जिसकी ऑक्सीजन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और खाड़ी देशों से मिलने वाली खैरात पर टिकी है। इस तरह, पाकिस्तान ऐसे दुष्चक्र में फंसा है जहां राहत देना उसकी आर्थिक क्षमता से बाहर है और बल प्रयोग करने पर उसका अंतरराष्ट्रीय नरेटिव ध्वस्त होता है।
इस आर्थिक बदहाली और शोषण ने अधिक्रांत कश्मीर के लोगों के दृष्टिकोण में एक दूरगामी ऐतिहासिक बदलाव ला दिया है। अनुच्छेद 370 हटने के बाद भारत के जम्मू-कश्मीर में बुनियादी ढांचे के विकास, मुफ्त राशन, निर्बाध बिजली और 4जी/5जी सेवाओं के विस्तार को देखकर अधिक्रांत कश्मीर के लोग खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। गिलगित-बाल्टिस्तान और स्कर्दू में “कारगिल का रास्ता खोलो” और “रारंग-कारगिल राह खोलो” जैसे नारों के पीछे यही तुलनात्मक हताशा और आक्रोश है। इस बीच, इस्लामाबाद ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) की सुरक्षा और चीनी निवेश को कानूनी आवरण देने के लिए गिलगित-बाल्टिस्तान को अपना ‘पांचवां प्रांत’ बनाने का विवादास्पद प्रस्ताव पारित करवाया है जिससे गिलगित बालतिस्तान में भी असंतोष की आग और भड़क गई है।
बलूचिस्तान दो कदम आगे
पाकिस्तान के लिए बलूचिस्तान ऐसा सैन्य दलदल साबित हो रहा है जहां फौज जितना जोर लगा रही है, उतनी ही धंसती जा रही है। बलूचिस्तान में आजादी की लड़ाई अब अपने सबसे घातक दौर में पहुंच चुकी है। बलूच लिबरेशन आर्मी द्वारा चलाए जा रहे ‘ऑपरेशन हेरोफ’ के तहत उसके लड़ाकों ने क्वेटा, ग्वादर, मस्तुंग, नुश्की, पसनी और खारान समेत दर्जनों जिलों को एक साथ निशाना बनाया है। हाल ही में बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सैन्य काफिले और चेकपोस्ट पर हुए एक भीषण समन्वित हमले में 45 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों और अर्धसैनिक बलों के जवानों की मौत हो गई। बार-बार हो रहे हमलों ने यही साबित किया है कि बलूचिस्तान में फौजी नियंत्रण कागजों में ही रह गया है।
जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने संसद और जनसभाओं में खुलेआम कहा हैः “इस्लामाबाद की गलत नीतियों और सैन्य बल प्रयोग की वजह से आज बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में पाकिस्तान सरकार की कोई संप्रभुता या नियंत्रण नहीं बचा। हुकूमत ने अवाम को दुश्मन बना लिया है”। ऐसे ही बलूचिस्तान नेशनल पार्टी के प्रमुख अख्तर मेंगल ने नेशनल असेंबली में सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि “आपने बलूचिस्तान को जलाकर राख कर दिया है। अब बलूचों के पास अलग होने का अलावा रास्ता नहीं।”
दूसरी ओर, विदेश में सक्रिय मीर यार बलोच जैसे निर्वासित नेताओं ने ‘स्वतंत्र बलूचिस्तान’ का ऐलान करते हुए दावा किया कि बलोच लड़ाकों ने 85 फीसद भू-भाग पर कब्जा कर लिया है। वैसे, मीर यार बलोच समय-समय पर अतिरंजित दावे करते रहे हैं, लेकिन इस बात में शक नहीं कि बलूचिस्तान में फौजी नियंत्रण लगातार कमजोर होता जा रहा है और शाम ढलते ही फौज दुबक जाती है।
सुलगता खैबर
उत्तर-पश्चिम में खैबर पख्तूनख्वा प्रांत आज एक ऐसी बारूदी सुरंग पर बैठा है, जिसका रिमोट कंट्रोल तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के हाथों में है। खैबर में आज जो अशांति है, वह पाकिस्तान की ‘रणनीतिक नीति’ का आत्मघाती परिणाम है। 1980 के दशक में सोवियत संघ का मुकाबला करने के लिए अमेरिका के साथ मिलकर मुजाहिदीन तैयार करने और 1990 के दशक में अफगान तालिबान को जन्म देने वाला पाकिस्तान आज अपने ही बुने जाल में फंस चुका है।
पाकिस्तान का गणित था कि अगस्त 2021 में काबुल पर तालिबान का कब्जा होते ही उसकी पश्चिमी सीमा सुरक्षित हो जाएगी, लेकिन दाव उलटा पड़ा। काबुल की तालिबान हुकूमत ने ‘डूरंड लाइन’ को मानने से साफ इनकार कर दिया और टीटीपी को शरण दी। आज टीटीपी स्वात, बन्नू और वजीरिस्तान में समानांतर सरकारें चला रहा है, टैक्स वसूल रहा है और पाकिस्तानी सेना व पुलिस चौकियों पर आए दिन हमले कर रहा है।
संक्षेप में कहें तो पाकिस्तान आज अपने ही बोए कांटों को काटने पर मजबूर है। जिस आतंकवाद और दमन को उसने सरकारी नीति बनाकर पाला-पोसा, आज वही भस्मासुर उसके अंगों को जला रहा है। बंदूक के बल पर भूगोल को बांधकर रखने की सैन्य सनक का परिणाम भुगत चुका पाकिस्तान एक बार फिर वही गलती दोहरा रहा है।

















