
एक लोकोक्ति है- व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वम्। यह सर्वविदित है, किंतु इसके वास्तविक आशय से बहुत कम लोग परिचित हैं। इसका तात्पर्य यह है कि इस संसार में ऐसा कोई विषय नहीं है, जिसका प्रतिपादन महर्षि वेदव्यास ने न किया हो। यहां ‘उच्छिष्ट’ शब्द का अर्थ ‘शेष या बचा हुआ’ नहीं, अपितु ‘जिसका मनन, चिंतन और ज्ञानपूर्वक स्पर्श किया गया हो’ है। यह उक्ति महर्षि व्यास की सर्वतोमुखी प्रतिभा तथा भारतीय ज्ञान-परंपरा पर उनके अमिट प्रभाव का उद्घोष करती है। वस्तुतः यह उनके प्रति व्यक्त सर्वोच्च श्रद्धांजलि है।
भारतीय वाङ्मय-परंपरा में महर्षि व्यास केवल एक महर्षि ही नहीं, अपितु ज्ञान, दर्शन और साहित्य के विराट शिल्पी हैं। भारतीय संस्कृति, दर्शन और साहित्य का इतिहास उनके उल्लेख के बिना पूर्ण नहीं हो सकता। जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने उनके प्रति अपनी श्रद्धा इन शब्दों में व्यक्त की है-
नमोऽस्तु ते व्यास विशालबुद्धे फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्र।
येन त्वया भारततैलपूर्णः प्रज्वालितो ज्ञानमयः प्रदीपः॥
अर्थात्, हे विशालबुद्धि महर्षि व्यास! आपको नमस्कार है। आपने महाभारत रूपी तेल से ज्ञानमय दीप प्रज्ज्वलित कर संपूर्ण मानवता के जीवन को आलोकित कर दिया।
महर्षि व्यास ने वेदों का ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद- इन चार विभागों में विभाजन किया। प्रत्येक वेद की अनेक शाखाएं हैं। महर्षि पतञ्जलि के महाभाष्य के अनुसार वेदों की 1131 शाखाएं थीं। प्रत्येक शाखा के चार अंग- संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक तथा उपनिषद् हैं। यह कार्य केवल संपादन नहीं था, अपितु भारतीय ज्ञान-परंपरा के संरक्षण और संवर्धन का युगांतरकारी उपक्रम था। इसी कारण आषाढ़ पूर्णिमा का दिन ‘व्यास पूर्णिमा’ अथवा ‘गुरु पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाता है। महर्षि व्यास भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा के आद्यगुरु माने जाते हैं।
महर्षि व्यास की सर्वश्रेष्ठ कृति महाभारत है। लगभग एक लाख श्लोकों से युक्त यह महाग्रंथ मानव जीवन का विश्वकोश है। धर्म-अधर्म, न्याय-अन्याय, सत्ता, कर्तव्य, प्रेम, त्याग, परिवार, राज्यशास्त्र, युद्धनीति तथा अध्यात्म-जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं है। इसीलिए महाभारत में कहा गया है- ‘यदिहास्ति तदन्यत्र, यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्॥’
अर्थात् जो यहां है, वह अन्यत्र भी मिलेगा; किंतु जो यहां नहीं है, वह कहीं भी उपलब्ध नहीं होगा। महर्षि व्यास की निष्पक्ष दृष्टि उनकी विशिष्टता है। उन्होंने किसी पात्र का अंध-समर्थन अथवा अकारण विरोध नहीं किया। भीष्म की प्रतिज्ञा, कर्ण की दानशीलता, विदुर की नीति, द्रौपदी का स्वाभिमान, युधिष्ठिर की धर्मनिष्ठा और दुर्योधन का अहंकार-सभी का उन्होंने समान निष्पक्षता से चित्रण किया। यही कारण है कि महाभारत केवल इतिहास नहीं, बल्कि मानव-स्वभाव और मनोविज्ञान का भी अनुपम ग्रंथ है।
महाभारत का सर्वाधिक प्रकाशमान रत्न श्रीमद्भगवद्गीता है। अर्जुन के विषाद का निवारण करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म, ज्ञान और भक्ति का जो अद्वितीय समन्वय प्रस्तुत किया, वह आज भी संपूर्ण विश्व के विचारकों और साधकों के लिए प्रेरणास्रोत है।
गीता का उपदेश महाभारत के भीष्मपर्व में वर्णित है। युद्धारंभ से पूर्व धृतराष्ट्र संजय से कुरुक्षेत्र की स्थिति का वर्णन पूछते हैं और वहीं से गीता का दिव्य संवाद प्रारंभ होता है।
महर्षि व्यास अठारह महापुराणों के रचयिता माने जाते हैं। श्रीमद्भागवत, विष्णुपुराण, स्कन्दपुराण, मार्कण्डेयपुराण आदि ग्रंथों के माध्यम से उन्होंने वेदों के गूढ़ तत्त्वज्ञान को कथा-शैली में जनसामान्य तक पहुंचाया तथा समाज को धर्म, सदाचार और आदर्श जीवन का मार्ग दिखाया।
महर्षि व्यास ‘ब्रह्मसूत्र’ के रचयिता हैं, जो वेदान्त दर्शन का आधारभूत ग्रंथ है। इसी कारण उन्हें वेदान्त दर्शन का प्रवर्तक माना जाता है। भारतीय दर्शन की प्रस्थानत्रयी- उपनिषद्, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र में से एक महान ग्रंथ के वे रचयिता हैं।
यद्यपि वर्तमान युग विज्ञान, प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का युग है, तथापि मानव जीवन के मूल प्रश्न आज भी वही हैं- कर्तव्य या स्वार्थ? सत्ता या सेवा? संपत्ति या संतोष? इन सभी प्रश्नों के उत्तर महर्षि व्यास के ग्रंथों में उपलब्ध हैं। इसीलिए उनका साहित्य कालातीत है। वह किसी एक संप्रदाय, देश अथवा काल की सीमा में बंधा नहीं, अपितु संपूर्ण मानवजाति की अमूल्य धरोहर है। महर्षि व्यास को चिरंजीव माना गया है। उन्होंने मानव को केवल धर्म और कर्तव्य का उपदेश ही नहीं दिया, अपितु जीवन जीने की कला भी सिखाई।
आषाढ़ पूर्णिमा के दिन महर्षि व्यास का अवतरण हुआ। अतः यह दिवस ‘गुरु पूर्णिमा’ अथवा ‘व्यास पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाता है। हिंदू संस्कृति में उन्हें ‘जगद्गुरु’ का गौरव प्राप्त है। अपने गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का यह पावन पर्व महर्षि व्यास की स्मृति को समर्पित है। उनका मूल नाम कृष्ण द्वैपायन था। गंगा के मध्य स्थित एक द्वीप पर जन्म लेने के कारण वे ‘द्वैपायन’ तथा श्यामवर्ण होने के कारण ‘कृष्ण’ कहलाए।
वेदों का चतुर्विभाजन कर उन्होंने ज्ञान की सुव्यवस्थित परंपरा का सूत्रपात किया, इसलिए वे ‘वेदव्यास’ के नाम से विश्वविख्यात हुए। बदरीवन से संबद्ध होने के कारण उन्हें ‘बादरायण’ भी कहा जाता है। नाम अनेक हैं, किंतु व्यक्तित्व एक ही-महर्षि वेदव्यास। वे केवल एक ऋ षि नहीं, बल्कि मानवता को ज्ञान का अमूल्य निधि प्रदान करने वाले महान दार्शनिक, चिंतक और साहित्य-मनीषी थे।
इस लेख को भी पढ़ें