"व्यक्ति नहीं, विचार और त्याग का प्रतीक भगवा ध्वज ही परम गुरु": गुरु पूर्णिमा पर जानिए संघ में गुरु दक्षिणा का महत्व
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“व्यक्ति नहीं, विचार और त्याग का प्रतीक भगवा ध्वज ही परम गुरु”: गुरु पूर्णिमा पर जानिए संघ में गुरु दक्षिणा का महत्व

आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा पर जानिए भारतीय संस्कृति में गुरु परंपरा का महत्व और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में 'भगवा ध्वज' को परम गुरु मानने का वैचारिक दर्शन।

Written byShivam DixitShivam Dixit
Jul 28, 2026, 06:33 pm IST
inभारत, मत अभिमत, संघ @100

नई दिल्ली। भारत में गुरु पूर्णिमा (आषाढ़, शुक्ल पक्ष, पूर्णिमा) का पर्व केवल एक तिथि नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और वैचारिक चेतना का जीवंत मूल स्रोत है. प्राचीन काल से ही धर्मग्रंथों, महाकाव्यों और दर्शन शास्त्रों में गुरु का स्थान सर्वोच्च स्वीकार किया गया है. यह दिन केवल किसी हाड़-मांस के व्यक्ति के पूजन तक सीमित नहीं है, बल्कि उस ‘तत्त्व’ की आराधना का पर्व है जो अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश (तमसो मा ज्योतिर्गमय) की ओर ले जाता है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में गुरु पूर्णिमा का विशेष सांगठनिक और वैचारिक महत्व है. यह संघ के छह आधिकारिक उत्सवों (वर्ष प्रतिपदा, विजयादशमी, मकर संक्रांति, हिंदू साम्राज्य दिवस, गुरु पूर्णिमा और रक्षाबंधन) में से एक प्रमुख पर्व है. संघ की स्थापना के समय ही डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने किसी व्यक्ति के बजाय भगवा ध्वज (केसरिया झंडे) को सर्वोच्च गुरु का दर्जा दिया था.

महर्षि वेदव्यास ‘व्यास पूर्णिमा’ और सनातन ग्रंथों में गुरु की महिमा

गुरु पूर्णिमा को ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहा जाता है. महर्षि वेदव्यास जी ने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का संकलन किया तथा मानव जाति को धर्म और नीति का शाश्वत मार्ग दिखाया. पुराणों में कहा गया है— “व्यासोनारायणं स्वयं” यानी महर्षि व्यास साक्षात भगवान नारायण का ही रूप हैं.

प्राचीन ग्रंथों और दर्शन में गुरु की अवधारणा:

  • रामायण व महाभारत: महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र ने प्रभु श्रीराम को धर्मराज्य और लोककल्याण की दीक्षा दी. वहीं महाभारत में द्रोणाचार्य और श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण (शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्) अर्जुन के परम गुरु बने.
  • शास्त्रों के श्लोक: “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः” (शिव पुराण) और “ध्यानमूलं गुरुर्मूर्तिः” (स्कंद पुराण) गुरु को परम ब्रह्म का प्रत्यक्ष स्वरूप सिद्ध करते हैं.
  • संत साहित्य: कबीर, तुलसीदास, मीराबाई और सूरदास से लेकर मध्यकालीन संत परंपरा तक गुरु कृपा के बिना ईश्वर-प्राप्ति को असंभव माना गया.

त्याग और शौर्य का प्रतीक है ‘भगवा ध्वज’

भगवा ध्वज भारत की आध्यात्मिक, सैन्य और सांस्कृतिक विरासत का निर्विवाद प्रतीक है. ऋग्वेद में वर्णित ‘अरुणकेतु’ से लेकर मध्यकाल तक छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप, गुरु गोविंद सिंह और महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में यह केसरिया ध्वज ही राष्ट्रीय पुनर्जागरण और पराक्रम की प्रेरणा बना.

“अग्नि की ज्वालाओं का प्रतिरूप ही हमारा परमपवित्र ‘भगवा ध्वज’ है। व्यक्तिगत जीवन को राष्ट्र और समाज रूपी समष्टि में होम कर देना ही वास्तविक यज्ञ है। इसी त्याग और निष्काम सेवा के कारण ध्वज को ‘गुरु’ के रूप में स्वीकार किया गया है।” – माधव सदाशिव गोलवलकर (श्रीगुरु जी)

RSS ने व्यक्ति के स्थान पर ध्वज को क्यों माना गुरु?

सन् 1925 में जब संघ की स्थापना हुई, तब कई स्वयंसेवक चाहते थे कि सर्व आदरणीय डॉ. हेडगेवार ही संगठन के गुरु बनें. परंतु डॉ. हेडगेवार ने यह सुनिश्चित किया कि संगठन कभी ‘व्यक्ति-केंद्रित’ न बने. सन् 1928 में संघ में पहली बार गुरुपूजा का आयोजन हुआ और भगवा ध्वज का स्थान सरसंघचालक से भी ऊपर रखा गया.

व्यक्ति के स्थान पर ध्वज को गुरु मानने के तीन प्रमुख कारण:

  1. ऐतिहासिकता व निरंतरता: यह ध्वज सदियों से हिंदू समाज के सतत संघर्षों और विजयश्री का साक्षी रहा है.
  2. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: भगवा ध्वज त्याग, तपस्या, सेवा और अखण्ड भारत की सांस्कृतिक भावना का सर्वोच्च संवाहक है.
  3. व्यक्ति-पूजा से मुक्ति: सर्वोच्च पद पर ध्वज को स्थापित करने से संगठन में शीर्ष नेतृत्व या उत्तराधिकार को लेकर पिछले 100 वर्षों में कभी कोई विवाद नहीं हुआ.

गुरु दक्षिणा: चंदा या दान नहीं, स्वेच्छा और समर्पण की कसौटी

गुरु पूर्णिमा से आरंभ होकर लगभग एक माह तक चलने वाले गुरु दक्षिणा कार्यक्रमों में स्वयंसेवक पारंपरिक भारतीय परिधान (धोती-कुर्ता/पाजामा-कुर्ता) में उपस्थित होते हैं. अचिह्नित लिफाफे में अपनी सामर्थ्य अनुसार समर्पण राशि और पुष्प अर्पित करते हैं.

श्रीगुरु जी के शब्दों में—

“गुरुदक्षिणा कोई अनिवार्य धनराशि या चंदा नहीं है। यह पूर्णतः स्वेच्छा का भाव है। यदि कोई अत्यंत निर्धन व्यक्ति भी अंतःकरण की श्रद्धा से केवल एक पुष्प अर्पित करता है, तो वह धनिकों के हजारों रुपयों से अधिक मूल्यवान है।”

सरसंघचालक जी के विचार व संस्मरण:

स्वावलंबी संगठन: सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी बताते हैं कि आरएसएस अपने दैनिक कार्यों और कार्यालयों के निर्माण के लिए बाहर से चंदा या आर्थिक अनुदान स्वीकार नहीं करता. संगठन का संपूर्ण व्यय स्वयंसेवकों के इसी वार्षिक गुरु दक्षिणा समर्पण से चलता है.

त्याग का भाव: सरसंघचालक जी ने श्यामू पवार नाम के एक निर्धन बालक का प्रेरक प्रसंग साझा किया, जिसने 21 रुपये गुरु दक्षिणा हेतु जुटाने के लिए टॉकीज के बाहर मूंगफली बेची और वह राशि गुरु चरणों में समर्पित की. उन्होंने स्पष्ट किया कि बच्चे और स्वयंसेवक वर्षभर अपने छोटे-छोटे खर्चों की कटौती करके यह समर्पण करते हैं.

तिरंगे और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान: सरसंघचालक जी ने बताया कि वर्ष 1931 के फैजपुर कांग्रेस अधिवेशन में जब 80 फीट ऊंचे खंभे पर अटका तिरंगा सुलझाने का काम स्वयंसेवक किशन सिंह राजपूत ने किया था, तब डॉ. हेडगेवार जी ने स्वयं उनका अभिनंदन किया था. राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के जन्म और सम्मान से स्वयंसेवक प्रथम दिन से निष्ठापूर्वक जुड़े हुए हैं.

गुरु पूर्णिमा का यह पावन पर्व हमें स्मरण कराता है कि राष्ट्र का निर्माण किसी क्षणिक उत्साह से नहीं, बल्कि सतत् त्याग, समर्पण और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति अटूट निष्ठा से ही संभव है.

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Shivam Dixit
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अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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