कारगिल विजय दिवस विशेष: कारगिल समीक्षा समिति की रिपोर्ट, जिसने बदल दिया भारत का पूरा रक्षा ढांचा!
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कारगिल समीक्षा समिति की रिपोर्ट: अटल सरकार का वो एतिहासिक फैसला, जिससे बदला भारत का पूरा रक्षा-सुरक्षा ढांचा!

कारगिल समीक्षा समिति (KRC) की रिपोर्ट और अटल सरकार के वे बड़े फैसले, जिन्होंने CDS पद के गठन के साथ भारत के सुरक्षा तंत्र को बदला।

Written byलेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)लेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत) — edited by Shivam Dixit
Jul 26, 2026, 09:10 am IST
inभारत, रक्षा, विश्लेषण, मत अभिमत
Kargil Vijay Diwas

Kargil Vijay Diwas

कारगिल युद्ध (3 मई 1999-26 जुलाई 1999) में पाकिस्तान पर भारत की कठिन लेकिन ऐतिहासिक जीत हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के रूप में पूरे देश में मनाई जाती है। लेकिन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने जुलाई 1999 में ही कारगिल समीक्षा समिति (Kargil Review Committee, KRC) का गठन किया, जिसमें खुफिया समन्वय, रक्षा खरीद प्रक्रियाओं, उच्च रक्षा प्रबंधन और संयुक्त सैन्य संरचनाओं सहित राष्ट्रीय सुरक्षा के विभिन्न पहलुओं की जांच की गई।

कारगिल समीक्षा समिति की सिफारिशों का प्रभाव

पिछले साल मई में ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान पर भारत की शानदार सैन्य जीत का श्रेय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकारों द्वारा केआरसी रिपोर्ट के सफल कार्यान्वयन को दिया जा सकता है। मेरी पीढ़ी के सैन्य अधिकारियों ने अपनी सेवा के दौरान जमीनी स्तर पर लागू किए जा रहे रक्षा सुधारों को देखा है और एक उच्च पेशेवर सेना का हिस्सा होने पर गर्व महसूस करते हैं।

के. सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में तैयार हुई ऐतिहासिक रिपोर्ट

रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ के. सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में केआरसी ने लगातार कार्य किया और फरवरी 2000 में संसद में अपनी ऐतिहासिक रिपोर्ट प्रस्तुत की। कई मायनों में समिति की सिफारिशों ने देश में रक्षा सुधारों का मार्ग प्रशस्त किया, जिसने भारतीय सशस्त्र सेनाओं को आज एक आधुनिक, युद्ध के लिए तैयार सैन्य बल बना दिया है।

केआरसी ने ‘रक्षा प्रबंधन’ शीर्षक वाली रिपोर्ट के अध्याय VI में कुल 75 सिफारिशें की थीं। सुधारों की अनुवर्ती कार्रवाई की निगरानी राष्ट्रीय सुरक्षा पर मंत्रियों के समूह (Group of Ministers, GoM) द्वारा की गई। इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड के निर्माण को छोड़कर अधिकांश सिफारिशों को अब तक लागू कर दिया गया है। थिएटर कमांड की रूपरेखा पर काफी काम हो चुका है और इसे भी शीघ्र स्थापित किया जाना चाहिए।

वाजपेयी सरकार ने रखी राष्ट्रीय सुरक्षा सुधारों की मजबूत नींव

यह प्रधानमंत्री वाजपेयी सरकार (1999-2004) को श्रेय जाता है कि पेशेवरों की एक विशेषज्ञ टीम द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौतियों का गंभीर अध्ययन किया गया और उसे संसद के पटल पर सार्वजनिक किया गया।

वाजपेयी सरकार ने भारतीय सेना, भारतीय नौसेना और भारतीय वायु सेना के बीच संयुक्त योजना, प्रशिक्षण और खुफिया जानकारी साझा करने के लिए अक्टूबर 2001 में मुख्यालय एकीकृत रक्षा स्टाफ (Integrated Defence Staff) की स्थापना की।

सरकार ने 8 अक्टूबर 2001 को अंडमान और निकोबार कमांड (ANC) नामक भारत की पहली त्रि-सेवा थिएटर कमांड की भी स्थापना की। इसके बाद संयुक्त खुफिया तंत्र को मजबूत करने के लिए मार्च 2002 में रक्षा खुफिया एजेंसी (Defence Intelligence Agency, DIA) का गठन किया गया।

प्रधानमंत्री वाजपेयी द्वारा पूर्व में बनाई गई राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (National Security Council, NSC) ने भी अपने कामकाज को और बेहतर किया तथा ब्रजेश मिश्रा पूर्णकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) बने।

संक्षेप में, प्रधानमंत्री वाजपेयी ने राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे में दीर्घकालिक बहुआयामी सुधारों की मजबूत नींव रखी।

यूपीए सरकार के दौरान धीमी पड़ गई कारगिल सुधार प्रक्रिया

2004 से 2014 तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान कारगिल सुधार एजेंडा धीमा पड़ गया और केवल आंशिक रूप से लागू किया गया।

सबसे उल्लेखनीय सुधार तकनीकी निगरानी को मजबूत करने के लिए अक्टूबर 2004 में राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन (National Technical Research Organisation, NTRO) की स्थापना था।

इस अवधि के दौरान भारत ने लगभग एक दशक का महत्वपूर्ण समय खो दिया, खासकर जब चीन ने अपनी सेना के आधुनिकीकरण और सुधार में बड़ी प्रगति की। पाकिस्तान भी सैन्य रूप से आधुनिक हुआ और जम्मू-कश्मीर तथा शेष भारत में आतंकवादी कृत्यों के माध्यम से भारत का खून बहाना जारी रखा।

नतीजतन, नवंबर 2008 में 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के बाद भी भारत में पाकिस्तान को सबक सिखाने के राष्ट्रीय नेतृत्व के संकल्प में अभाव दिखाई दिया। भारत ने डोजियर कूटनीति के जरिए पाकिस्तान से लड़ाई जारी रखी, लेकिन कोई विशेष सफलता नहीं मिली।

एनआईए और एनएसजी हब की स्थापना

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की स्थापना 2009 में की गई और उसके बाद राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) के क्षेत्रीय केंद्र भी बनाए गए।

मुझे नए एनएसजी हब अच्छी तरह याद हैं, क्योंकि मैंने उस अवधि के दौरान अधिकारी कैडर की पोस्टिंग की थी।

इस प्रकार, केआरसी की सिफारिशों को लागू करने में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरकार के रिकॉर्ड को केवल क्रमिक (Incremental) और सतर्क (Cautious) कहा जा सकता है।

मोदी सरकार ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर दिया जोर

मई 2014 में सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्यताओं को शीघ्र समझ लिया। उन्होंने महसूस किया कि भारत दुनिया के सबसे बड़े रक्षा आयातकों में से एक बन गया है, जिसके पास आत्मनिर्भरता के लिए कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं है।

उन्होंने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने का मंत्र दिया और पहले की यूपीए सरकार के समय के गतिरोध को दूर किया। रक्षा उत्पादन के पूरे इकोसिस्टम को बदलने पर विशेष फोकस किया गया।

इस दिशा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को स्वचालित मार्ग से बढ़ाकर 49 प्रतिशत तथा कुछ क्षेत्रों में 100 प्रतिशत किया गया। अच्छे प्रोत्साहनों के माध्यम से रक्षा क्षेत्र में निजी उद्योग को बढ़ावा दिया गया।

परिणामस्वरूप, मोदी 1.0 सरकार के दौरान भारत के रक्षा निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। स्वदेशीकरण को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने बंदूकों, टैंकों, जहाजों और रडार जैसे रक्षा उपकरणों की ऐसी सूची तैयार की, जिन्हें अब आयात नहीं किया जा सकता था।

मेक इन इंडिया और रक्षा खरीद प्रक्रिया में बड़ा बदलाव

रक्षा मंत्री के रूप में मनोहर पर्रिकर (नवंबर 2014 से मार्च 2017) ने रक्षा खरीद प्रक्रिया (Defence Procurement Procedure, DPP-2016) के माध्यम से पारदर्शिता, गति और आत्मनिर्भरता के उद्देश्य से रक्षा क्षेत्र में मेक इन इंडिया की मजबूत नींव रखी।

नई नीति में स्वदेशी रूप से डिजाइन, विकसित और निर्मित (Indigenously Designed, Developed and Manufactured, IDDM) नामक नई श्रेणी बनाई गई, जिसमें आईडीडीएम के लिए अर्हता प्राप्त करने हेतु कम से कम 40 प्रतिशत उत्पाद का भारत में निर्माण आवश्यक किया गया।

इसके अतिरिक्त, महत्वपूर्ण रक्षा उपकरणों के लिए फास्ट ट्रैक अधिग्रहण को भी मंजूरी दी गई। उदाहरण के लिए, हमारे विशेष बल इसी प्रक्रिया के माध्यम से विश्वस्तरीय सैन्य उपकरणों से लैस हो पाए।

परिणामस्वरूप, भारतीय विशेष बलों ने 29 सितंबर 2016 को उरी सर्जिकल स्ट्राइक को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत के पास 2019 में पाकिस्तान के भीतर बालाकोट एयर स्ट्राइक करने की सैन्य क्षमता भी विकसित हो चुकी थी।

इस प्रकार, DPP-2016 रक्षा खरीद को मेक इन इंडिया के साथ जोड़ने का पहला बड़ा प्रयास था।

आज भारत के पास कलपुर्जों और रखरखाव के लिए रक्षा खरीद नियमावली (DPM-2025) के तहत एक सुव्यवस्थित रक्षा खरीद प्रक्रिया है। साथ ही सभी प्रमुख सैन्य हार्डवेयर के अधिग्रहण के लिए रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP-2020) लागू है।

मोदी 2.0 में सीडीएस और सैन्य मामलों के विभाग का गठन

मोदी 2.0 सरकार (2019-2024) के दौरान रक्षा सुधारों ने संयुक्तता, आत्मनिर्भरता और पुनर्गठन पर ध्यान केंद्रित करते हुए व्यापक स्वरूप ग्रहण किया।

सबसे महत्वपूर्ण कदम जनवरी 2020 में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) का गठन तथा जनरल बिपिन रावत को प्रथम सीडीएस नियुक्त करना था।

सीडीएस तीनों सेनाओं के मामलों पर रक्षा मंत्री और भारत के प्रधानमंत्री के एकल सूत्रीय सलाहकार हैं।

इसके अतिरिक्त, सैन्य मामलों का विभाग (Department of Military Affairs, DMA) विशेष रूप से सीडीएस के अधीन कार्य करने के लिए बनाया गया।

डीएमए के तहत तीनों सेनाओं की खरीद, संयुक्त प्रशिक्षण, मानव संसाधन, भूतपूर्व सैनिक कल्याण सहित अनेक महत्वपूर्ण विषयों का दायित्व रखा गया।

प्रधानमंत्री मोदी ने डीएमए को इतनी व्यापक जिम्मेदारियों के साथ सशक्त बनाने के लिए नौकरशाही के विरोध को दरकिनार किया और सीडीएस को सशस्त्र सेनाओं में व्यापक परिवर्तन लाने के लिए पर्याप्त अधिकार और कार्यक्षेत्र प्रदान किया।

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