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Explainer: पेपर लीक की जांच के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट अच्छा और सशक्त विचार, क्या बदलेगी स्थिति?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेपर लीक की समस्या पर बड़ा ऐलान किया है। फास्ट ट्रैक कोर्ट से जांच एजेंसियों की कमियों, धीमी ट्रायल और कमजोर कानून पर क्या असर पड़ेगा?

Published by
कुलदीप सिंह

परीक्षा पेपर लीक की समस्या भारत में सालों से चली आ रही है। लाखों स्टूडेंट्स और युवाओं का भविष्य इससे प्रभावित होता है। इस समस्या से निपटने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज बड़ा कदम उठाते हुए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की घोषणा की है। ये कोर्ट पुरानी समस्याओं को दूर करने की कोशिश करेंगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ये कदम बेहद सराहनीय है, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। आज इस बात को समझने की कोशिश करते हैं कि ये कोर्ट किन मुद्दों पर फोकस कर सकती हैं।

जांच एजेंसियों की कमियां

पेपर लीक के ज्यादातर मामलों में जांच एजेंसियां ठीक से काम नहीं कर पातीं। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट पिछले महीने आई थी, जिसकी मानें तो 2002 से 2025 के बीच 45 बड़े लीक हुए (हर एक में कम से कम 1 लाख कैंडिडेट प्रभावित)। इनमें सिर्फ 2 मामलों में ही सजा हुई। बाकी में या तो केस बंद हो गए या बहुत धीरे चल रहे हैं।

कोर्ट अक्सर जांच एजेंसियों के ‘क्लोजर रिपोर्ट’ को खारिज कर देती हैं। और इसके पीछे अक्सर सबूतों की कमी या जांच में गलतियां होने का तर्क दिया जाता है। जैसे UGC NET 2024: दिल्ली की कोर्ट ने मई 2026 में CBI की क्लोजर रिपोर्ट को आलोचना की। कोर्ट का कहना था कि लीक के सबूत मौजूद थे, फिर भी रिपोर्ट दी गई।

2016 कर्नाटक PUC केमिस्ट्री पेपर लीक: बेंगलुरु सेशंस कोर्ट ने मई 2024 में 19 आरोपियों को बरी कर दिया। इनमें बड़े अधिकारी और मास्टरमाइंड शामिल थे। कोर्ट ने KCOCA (सख्त कानून) के तहत भी जांच की कमियों को गंभीर बताया।

कानूनी प्रावधान भी कमजोर

ऐसा देखा जाता है कि अधिकारी सरकार के द्वारा लाए गए बीएनएस और बीएनएसएस के तहत कड़ी कार्रवाई की जगह अधिकांश केस में पुराने IPC की धाराओं का इस्तेमाल करते हैं, जैसे 420 (धोखाधड़ी), 467-468 (जालसाजी), 120B (साजिश)। ये सामान्य अपराध माने जाते हैं। इनमें जमानत आसानी से मिल जाती है। हालांकि, कुछ राज्यों ने सख्त कदम भी उठाए हैं, जिसके तहत ED को मनी लॉन्ड्रिंग के तहत शामिल करना। UP में तो कभी-कभी गैंगस्टर एक्ट भी कार्रवाई की गई है।

ऐसे मामलों में फास्ट ट्रैक कोर्ट यहां तेज सुनवाई कर सकती हैं, लेकिन अगर कानून में बदलाव नहीं हुआ तो सजा देने में दिक्कत रहेगी।

ट्रायल की धीमी गति

चार्ज फ्रेम होने के बाद भी केस सालों तक लटक जाते हैं। जैसे 2006 रेलवे ग्रुप-D का केस। 2012 से 2026 तक 142 सुनवाई हो चुकी हैं, फिर भी अभी गवाहों की स्टेज पर है। इस तरह के मामलों में फास्ट ट्रैक कोर्ट की बड़ी भूमिका हो सकती है।

व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता

सबसे अहम बात ये है कि जो सामाजिक व्यवस्था बनी हुई है, उसके अंदर ही काफी सड़न भरी हुई है। उदाहरण के तौर पर देखें तो 2021 राजस्थान SI एग्जाम लीक में राजस्थान हाई कोर्ट ने RPSC के सदस्यों को खुद शामिल पाया, अपराधी भी अब हो चुके हैं हाईटेक, जिससे उन्हें पकड़ पाना बेहद जटिल हो गया है।

बहरहाल, केंद्र सरकार के द्वारा फास्ट ट्रैक कोर्ट अच्छा कदम है। ये जांच की कमियों, धीमी प्रक्रिया और क्लोजर रिपोर्ट की समस्याओं को कुछ हद तक संभाल सकती हैं। लेकिन सिर्फ कोर्ट से पूरा हल नहीं निकलेगा। लेकिन, इसके मजबूत कानून की भी आवश्यकता है।

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