"मैकॉले की नीति ने छीनी मौलिक सोच": जानिए 'धर्म' और 'रिलिजन' का असली अंतर!
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“मैकॉले की नीति ने छीनी मौलिक सोच”: MLSU उदयपुर में बोले चंद्रकांत जी, जानिए ‘धर्म’ और ‘रिलिजन’ का असली अंतर!

मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय (MLSU), उदयपुर में 'शोध और भारत का पुनरुत्थान' विषय पर व्याख्यान आयोजित किया गया। मुख्य वक्ता चंद्रकांत जी ने औपनिवेशिक मानसिकता और शोध दृष्टिकोण पर विचार व्यक्त किए।

Written byShivam DixitShivam Dixit — edited by Shivam Dixit
Jul 23, 2026, 06:58 pm IST
inभारत, शिक्षा, राजस्थान
MLSU Udaipur Lecture Research and Bharat Resurgence Chandrakant Pragya Pravah Prof Kailash Daga Panchjanya

उदयपुर (राजस्थान)। मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय (MLSU), उदयपुर के स्नातकोत्तर अध्ययन अधिष्ठाता कार्यालय द्वारा विश्वविद्यालय के बप्पा रावल सेमिनार हॉल में ‘शोध और भारत का पुनरुत्थान’ विषय पर एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया. कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. कैलाश डागा ने की.

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता ‘प्रज्ञा प्रवाह’ के अखिल भारतीय सह संयोजक चंद्रकांत जी रहे. उन्होंने अपने संबोधन में भारत की वर्तमान और पुरातन शिक्षा व्यवस्था, शोध दृष्टिकोण तथा सदियों पुरानी औपनिवेशिक मानसिकता के प्रभावों पर अत्यंत गहन और विचारोत्तेजक विश्लेषण प्रस्तुत किया.

मैकॉले की शिक्षा नीति और औपनिवेशिक मानसिकता पर कड़ा प्रहार

मुख्य वक्ता चंद्रकांत जी ने लॉर्ड मैकॉले द्वारा लागू की गई शिक्षा व्यवस्था के दुष्परिणामों पर चर्चा करते हुए कहा कि इस नीति ने भारतीयों की मौलिक सोच और शोध दृष्टिकोण को गहरा नुकसान पहुंचाया है.

उन्होंने बताया कि ब्रिटेन में संस्कृत अध्ययन के लिए ‘बोडेन चेयर’ की स्थापना भारतीय ज्ञान परंपरा के संबंध में भ्रांतियां और गलत धारणाएं फैलाने के उद्देश्य से की गई थी. उन्होंने ‘आर्य आक्रमण सिद्धांत’ (Aryan Invasion Theory) को ऐतिहासिक गलत धारणा का एक प्रत्यक्ष उदाहरण बताया.

MLSU Udaipur Lecture Research and Bharat Resurgence Chandrakant Pragya Pravah Prof Kailash Daga Panchjanya

भाषा और सोच में औपनिवेशिक प्रभाव का उदाहरण:

चंद्रकांत जी ने कहा कि ‘ब्लैक’ केवल एक रंग है, लेकिन अंग्रेजी मानसिकता ने इसे ‘ब्लैकमेलिंग’, ‘ब्लैक मार्केटिंग’ और ‘ब्लैक लिस्टिंग’ जैसे नकारात्मक शब्दों से जोड़ दिया। भाषा और विचारों के ऐसे प्रयोगों को व्यापक सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ में समझने की सख्त जरूरत है।

‘धर्म’ और ‘रिलिजन’ के बुनियादी अंतर को समझना जरूरी

चंद्रकांत जी ने भारतीय चिंतन में ‘धर्म’ की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि धर्म कोई संकीर्ण मजहबी या धार्मिक पहचान नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का एक नैतिक मार्गदर्शक और कर्तव्यबोध है.

“भारतीय परंपरा में धर्म जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नैतिकता से जुड़ा है। ‘धर्मचक्र’, ‘धर्मशाला’, ‘धर्मकांटा’, ‘धर्मभाई’ और ‘धर्मबहन’ जैसे शब्द इस बात का प्रमाण हैं कि धर्म को केवल पश्चिमी ‘रिलिजन’ (Religion) के सीमित अर्थ में देखना सर्वथा अनुचित है।”

भारतीय समाज की मूल इकाई ‘परिवार’ है, ‘व्यक्ति’ नहीं

विगत एक हजार वर्षों के विदेशी आक्रमणों और चुनौतियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज भारतीयों में आत्मविस्मृति को दूर कर आत्मविश्वास का पुनर्निर्माण करना बेहद आवश्यक है. उन्होंने कहा कि अतीत की उपलब्धियों पर गौरव करना अच्छी बात है, लेकिन केवल गौरवगान से काम नहीं चलेगा; भारत को वर्तमान समस्याओं के समाधान हेतु अपनी ज्ञान परंपरा से प्रेरित होकर नया शोध करना होगा.

उन्होंने पश्चिमी और भारतीय दृष्टि का अंतर बताते हुए कहा:

  • सामाजिक इकाई: पश्चिमी समाज में व्यक्ति (Individual) को सबसे छोटी सामाजिक इकाई माना गया है, जबकि भारतीय दर्शन में ‘परिवार’ समाज की मूल इकाई है.
  • जीवन का लक्ष्य: भारतीय दर्शन में ‘आनंद’ को मानव जीवन का अंतिम और सर्वोच्च लक्ष्य स्वीकार किया गया है.

भारतीय दृष्टिकोण और वैश्विक समझ का समन्वय आवश्यक: प्रो. कैलाश डागा

कार्यक्रम के अध्यक्ष और कुलगुरु प्रो. कैलाश डागा ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा और वैश्विक वैज्ञानिक समझ के समन्वय से विद्यार्थियों तथा शोधार्थियों के लिए नए अवसरों के द्वार खोले जा सकते हैं.

कार्यक्रम के प्रारंभ में स्नातकोत्तर अध्ययन के अधिष्ठाता के. बी. जोशी ने अतिथियों का स्वागत किया और समकालीन सामाजिक व वैज्ञानिक चुनौतियों के समाधान पर केंद्रित विषयों में गुणवत्तापूर्ण शोध की आवश्यकता पर बल दिया.

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Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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