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मुद्दा :  चर्च भूमि की जांच !

नासिक में हुए एक कथित घोटाले के बाद महाराष्ट्र सरकार ने चर्च और ईसाई मिशनरियों की संपत्तियों की जांच करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति के गठन का निर्णय लिया। यह समिति तीन महीने के भीतर पता लगाएगी कि किन स्थितियों में चर्चों और मिशनरियों को जमीन दी गई और जो शर्तें हैं, उनका पालन हो रहा है या नहीं

Published by
डी.के.दुबे

भारत में धार्मिक-पांथिक संस्थाओं के स्वामित्व वाली भूमि और उनकी कानूनी स्थिति समय-समय पर सार्वजनिक बहस का विषय रही है। मंदिर, वक्फ, गुरुद्वारे और चर्च-सभी के पास ऐतिहासिक कारणों से बड़ी मात्रा में भूमि और संपत्तियां हैं। इन संपत्तियों का प्रबंधन अलग-अलग कानूनों के अंतर्गत होता है, जिसके कारण समय-समय पर इनके स्वामित्व, उपयोग और प्रशासन को लेकर विवाद भी सामने आते रहे हैं।

इसी क्रम में महाराष्ट्र सरकार द्वारा चर्च और ईसाई मिशनरी संस्थाओं के स्वामित्व वाली भूमि का 90 दिन का राज्यव्यापी लेखा-परीक्षण (ऑडिट) शुरू करने का निर्णय राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। सरकार के अनुसार इस अभियान का उद्देश्य किसी पंथ विशेष को निशाना बनाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि ऐतिहासिक रूप से दी गई सरकारी या सार्वजनिक ट्रस्ट की भूमि का उपयोग मूल पट्टा और कानूनी शर्तों के अनुरूप ही हो रहा है।

यह कदम केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश, केरल तथा अन्य राज्यों में भी चर्च और मिशनरी संस्थाओं से संबंधित भूमि के स्वामित्व, पट्टे की वैधता तथा कथित अनियमितताओं को लेकर प्रशासनिक और न्यायिक कार्रवाई देखने को मिली है। इन घटनाओं ने एक व्यापक प्रश्न खड़ा किया है कि ब्रिटिश शासनकाल में चर्च से जुड़ी संस्थाओं को दी गई भूमि की वर्तमान कानूनी स्थिति क्या है, और उन पर वास्तविक अधिकार किसका है?

लेखा-परीक्षण की शुरुआत

महाराष्ट्र सरकार के इस व्यापक लेखा-परीक्षण अभियान के पीछे एक घटनाक्रम बताया जाता है। इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि नासिक जिले से जुड़ी उन शिकायतों में दिखाई देती है, जिनमें चर्च से संबंधित कुछ भूमि के हस्तांतरण और उपयोग को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए गए। विधानसभा में यह मुद्दा प्रमुखता से उठने के बाद सरकार ने मामले की जांच को व्यापक स्तर पर ले जाने का निर्णय लिया। कई तरह के आरोप हैं-पहला, कथित अवैध भूमि का हस्तांतरण किया गया। दूसरा, कथित फर्जी एनओसी लिए गए और प्रशासनिक अनियमितताएं बरती गईं। तीसरा, पुराने भूमि अभिलेख गायब हैं।

सरकार का दृष्टिकोण

महाराष्ट्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह अभियान किसी पांथिक संस्था के विरुद्ध कार्रवाई नहीं है। सरकार का कहना है कि जहां वैध भूमि अभिलेख, पट्टा दस्तावेज और स्वामित्व संबंधी रिकॉर्ड उपलब्ध हैं, वहां चिंता की कोई आवश्यकता नहीं है। हालांकि, यदि जांच के दौरान यह पाया जाता है कि सरकारी भूमि का उपयोग मूल पट्टे की शर्तों के विपरीत किया गया है, अथवा भूमि का हस्तांतरण कानून के अनुरूप नहीं हुआ है, तो संबंधित मामलों में कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। सरकार ने इस उद्देश्य से विभागीय आयुक्तों की अध्यक्षता में उच्च-स्तरीय समितियों के गठन की घोषणा की है।

मामला केवल महाराष्ट्र तक नहीं

पहली दृष्टि में यह एक राज्य स्तरीय राजस्व जांच प्रतीत होती है, लेकिन वास्तव में इसका महत्व कहीं अधिक व्यापक है। भारत के अनेक बड़े शहरों-विशेषकर पुरानी छावनियों, सिविल लाइंस, हिल स्टेशनों और औपनिवेशिक नगरों-में चर्च, मिशनरी विद्यालयों, अस्पतालों और कब्रिस्तानों के लिए विशाल भूमि ब्रिटिश शासनकाल में उपलब्ध कराई गई थी। इनमें से अनेक संपत्तियां आज भी देश के सबसे महंगे शहरी क्षेत्रों में स्थित हैं। इसी कारण इन भूमि का स्वामित्व, उपयोग और कानूनी स्थिति केवल स्थानीय प्रशासन का विषय नहीं, बल्कि भारतीय ट्रस्ट कानून, राजस्व कानून, सार्वजनिक संपत्ति और संवैधानिक प्रशासन से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न बन चुका है।

विवाद की वास्तविक जड़

यदि महाराष्ट्र सरकार द्वारा शुरू किए गए चर्च भूमि लेखा-परीक्षण को केवल वर्तमान प्रशासनिक कार्रवाई के रूप में देखा जाए, तो यह विषय अधूरा रह जाएगा। वास्तव में, इस विवाद की जड़ें लगभग एक शताब्दी पुराने ब्रिटिश कानूनों और स्वतंत्र भारत में हुए विधायी परिवर्तनों में छिपी हैं। आज जिस भूमि के स्वामित्व और प्रबंधन पर प्रश्न उठ रहे हैं, उसका अधिकांश हिस्सा ब्रिटिश शासनकाल में चर्च संस्थाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य, पांथिक गतिविधियों और सामाजिक सेवा के लिए उपलब्ध कराया गया था। इसलिए वर्तमान विवाद को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि इन संपत्तियों का कानूनी ढांचा समय के साथ कैसे विकसित हुआ।

ब्रिटिश शासन और चर्च संपत्ति

ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में कार्यरत अधिकांश एंग्लिकन चर्च सीधे चर्च ऑफ इंग्लैंड के अधीन थे। उस समय चर्च केवल पांथिक संस्था नहीं था, बल्कि ब्रिटिश प्रशासनिक ढांचे का भी एक महत्वपूर्ण अंग माना जाता था। इसी कारण देशभर में अनेक चर्च, मिशनरी विद्यालय, अस्पताल, कब्रिस्तान और पांथिक परिसरों के लिए बड़ी मात्रा में भूमि उपलब्ध कराई गई। इनमें से अधिकांश संपत्तियां छावनी क्षेत्रों, सिविल लाइंस, हिल स्टेशनों और प्रमुख नगरों में स्थित थीं, जिनका आज अत्यधिक व्यावसायिक महत्व है।

एक महत्वपूर्ण मोड़

बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक तक भारत में स्वतंत्रता आंदोलन तेज हो चुका था। ब्रिटिश सरकार यह समझ चुकी थी कि भारत में चर्च प्रशासन को ब्रिटेन से अलग एक स्वतंत्र संरचना देना आवश्यक होगा। इसी उद्देश्य से ब्रिटिश संसद ने इंडियन चर्च एक्ट- 1927 तथा उससे संबंधित व्यवस्थाएं लागू कीं, जो 1 मार्च, 1930 से प्रभावी हुईं। इस कानून का प्रमुख उद्देश्य भारत में कार्यरत चर्चों के प्रशासन को ब्रिटेन के प्रत्यक्ष नियंत्रण से अलग करना था। इसके परिणामस्वरूप ‘चर्च ऑफ इंग्लैंड इन इंडिया’ के स्थान पर ‘चर्च ऑफ इंडिया, बर्मा, एंड सिलोन (सीआईबीसी)’ का गठन हुआ, जिसने पांथिक गतिविधियों का संचालन संभाला। यह परिवर्तन केवल नाम का नहीं था। इसके साथ संपत्तियों के प्रबंधन के लिए भी एक अलग व्यवस्था बनाई गई।

ब्रिटिश सरकार के सामने एक व्यावहारिक प्रश्न था। यदि चर्च एक पांथिक संस्था है, तो सरकारी अनुदान, पट्टे पर मिली भूमि और सार्वजनिक ट्रस्ट की संपत्तियों का कानूनी प्रबंधन कौन करेगा? इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए इंडियन चर्च ट्रस्टीज (आईसीटी) की स्थापना एक वैधानिक निकाय के रूप में की गई। इस व्यवस्था में पांथिक कार्य और संपत्ति प्रबंधन को अलग-अलग रखा गया। सीआईबीसी का दायित्व पांथिक गतिविधियों, प्रार्थना, पादरियों की नियुक्ति और आध्यात्मिक प्रशासन तक सीमित था। आईसीटी का कार्य चर्च से संबंधित भूमि, भवनों और अन्य संपत्तियों को विधिक रूप से धारण करना तथा उनका प्रबंधन करना था। यह विभाजन उस समय की कानूनी व्यवस्था का महत्वपूर्ण सिद्धांत था। इससे पांथिक संस्था और संपत्ति प्रबंधन के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित किया गया।
आईसीटी स्वतः समाप्त हो गया?

स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने अनेक ब्रिटिशकालीन कानूनों को समाप्त करने की प्रक्रिया प्रारंभ की। इसी क्रम में ब्रिटिश स्टडीज (एप्लीकेशन टू इंडिया) रिपील एक्ट- 1960 के माध्यम से इंडियन चर्च एक्ट-1927 को निरस्त कर दिया गया। यहीं से सबसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न उत्पन्न होता है- यदि मूल कानून समाप्त हो गया, तो क्या उसके अंतर्गत स्थापित इंडियन चर्च ट्रस्टीज (आईसीटी) भी स्वतः समाप्त हो गया? दस्तावेज में इस प्रश्न का उत्तर दो प्रमुख कानूनी सिद्धांतों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है।

पहला, ‘सेविंग क्लाउज’, जिसके अनुसार किसी कानून के निरस्त होने से उसके अंतर्गत पहले से स्थापित अधिकारों या संस्थाओं का अस्तित्व स्वतः समाप्त नहीं माना जाता, जब तक नया कानून स्पष्ट रूप से ऐसा न कहे। दूसरा, जनरल क्लाउज एक्ट- 1897 की धारा 6, जिसके अनुसार किसी कानून के निरसन का प्रभाव पहले से निर्मित अधिकारों और संस्थाओं पर सामान्यतः प्रतिगामी नहीं होता, जब तक विधायिका ऐसा स्पष्ट रूप से न कहे।

इसी आधार पर कई कानूनी चर्चाओं में यह तर्क सामने आता है कि आईसीटी का अस्तित्व स्वतः समाप्त नहीं हुआ। हालांकि, इस प्रश्न के व्यावहारिक और न्यायिक पहलुओं की व्याख्या विभिन्न मामलों में अलग-अलग संदर्भों में हुई है।

चर्च संपत्तियों पर न्यायपालिका की टिप्पणियां

यदि इतिहास किसी विवाद की पृष्ठभूमि तैयार करता है, तो न्यायालय उसके कानूनी स्वरूप को स्पष्ट करते हैं। चर्च और मिशनरी संपत्तियों से जुड़े विवाद में भी यही हुआ। ब्रिटिश काल की व्यवस्थाओं-आईसीटी,सीएनआई,सीएसआई के गठन तथा संपत्तियों के दावों को लेकर देश की विभिन्न अदालतों में अनेक मुकदमे पहुंचे। इन मामलों में न्यायालयों ने कुछ ऐसे विधिक सिद्धांत स्थापित किए, जो आज भी चर्च संपत्तियों से जुड़े विवादों की आधारशिला माने जाते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने 2013 में विनोद कुमार एम. मालवीय बनाम मगनलाल मंगलदास गमेटी मामले में एक निर्णय, जिसे चर्च संपत्तियों से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों में गिना जाता है। मामले में यह दावा किया गया कि विभिन्न चर्च संस्थाओं के विलय के बाद उनकी संपत्तियां स्वतः चर्च आफ नार्थ इंडिया के नियंत्रण में आ गईं। मुख्य प्रश्न यह था कि क्या केवल संगठनात्मक या पांथिक विलय से सार्वजनिक ट्रस्ट की संपत्तियां बिना किसी विधिक प्रक्रिया के नई संस्था को हस्तांतरित मानी जा सकती हैं!

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पांथिक या प्रशासनिक विलय और संपत्ति का विधिक हस्तांतरण दो अलग-अलग कानूनी विषय हैं। यदि कोई संस्था सार्वजनिक ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत है, तो उसकी संपत्तियों का हस्तांतरण केवल संबंधित ट्रस्ट कानूनों और वैधानिक प्रक्रिया के अनुसार ही किया जा सकता है। केवल किसी प्रस्ताव या आंतरिक निर्णय के आधार पर संपत्ति का स्वामित्व स्वतः नहीं बदल जाता। इस निर्णय ने एक महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किया कि पांथिक निरंतरता और कानूनी स्वामित्व समानार्थी नहीं हैं।

चर्च आफ नार्थ इंडिया बनाम लवाजी भाई रतनजी भाई मामले में 2005 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक निर्णय दिया। यह चर्च संपत्तियों के प्रबंधन और न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र से संबंधित एक महत्वपूर्ण मुकदमा था। इस मामले में चर्च आफ नार्थ इंडिया ने यह तर्क रखा कि वह पूर्ववर्ती चर्च संस्थाओं की उत्तराधिकारी होने के कारण संबंधित संपत्तियों पर अधिकार रखती है तथा कुछ विवादों में दीवानी न्यायालयों की भूमिका सीमित होनी चाहिए।

इस पर सर्वोच्च न्यायालय कहा कि किसी सार्वजनिक ट्रस्ट या वैधानिक रूप से संरक्षित संपत्ति पर स्वामित्व का दावा केवल पांथिक उत्तराधिकार के आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि सीआईबीसी की संपत्ति और अधिकार आईसीटी को स्थानांतरित किए गए, क्योंकि आईसीटी को विशेष रूप से इस उद्देश्य से बनाया गया था कि वह भारत में चर्च की संपत्तियों का विधिक ट्रस्टी बने। सीएनआई और सीएसआई को मान्यता दी गई कि वे अपने-अपने क्षेत्र में चर्चों के पांथिक और प्रशासनिक उत्तराधिकारी हैं, लेकिन सीआईबीसी की संपत्ति का विधिक उत्तराधिकारी आईसीटी ही है।

डॉ. पीटर बल्देव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (इलाहाबाद उच्च न्यायालय, 2022)। यह मामला चर्च संपत्तियों से जुड़े सबसे चर्चित आपराधिक मामलों में से एक रहा। याचिका में एक बिशप के विरुद्ध दर्ज प्राथमिकी को चुनौती दी गई थी। आरोप था कि चर्च से संबंधित कुछ संपत्तियों के संबंध में कथित जालसाजी और अवैध हस्तांतरण हुआ। संबंधित पक्ष ने एफआईआर निरस्त करने की मांग की। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उपलब्ध सामग्री के आधार पर एफआईआर को प्रथम दृष्टया जांच योग्य माना और हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। न्यायालय ने यह नहीं माना कि केवल पांथिक पद या संगठनात्मक स्थिति के आधार पर किसी व्यक्ति को जांच से छूट मिल सकती है। परिणामस्वरूप, आपराधिक जांच जारी रहने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

सीएनआई और सीएसआई का गठन

1970 में विभिन्न प्रोटेस्टेंट परंपराओं से जुड़े कई चर्च संगठनों ने एक नए संगठनात्मक ढांचे के अंतर्गत स्वयं को पुनर्गठित किया। इसके परिणामस्वरूप चर्च ऑफ नार्थ इंडिया (सीएनआई) और दक्षिण भारत में चर्च ऑफ साउथ इंडिया (सीएसआई) जैसी संस्थाओं का गठन हुआ। ये संस्थाएं विभिन्न ट्रस्ट एवं सोसायटी कानूनों के अंतर्गत पंजीकृत निकायों के रूप में कार्य करने लगीं।

लेखा-परीक्षण का व्यापक महत्व

महाराष्ट्र सरकार की वर्तमान पहल का सबसे बड़ा महत्व यह है कि इससे दशकों पुराने भूमि अभिलेखों, ऐतिहासिक पट्टे, सार्वजनिक ट्रस्टों और सरकारी राजस्व रिकॉर्ड की व्यवस्थित समीक्षा का अवसर प्राप्त होगा। यदि किसी संपत्ति का उपयोग मूल उद्देश्य के अनुरूप पाया जाता है और उसके दस्तावेज विधि सम्मत हैं, तो ऐसे मामलों में ऑडिट से पारदर्शिता और विश्वास बढ़ेगा। वहीं जहां रिकॉर्ड, स्वामित्व अथवा पट्टा शर्तों को लेकर विवाद सामने आएंगे, वहां अंतिम निर्णय संबंधित न्यायालयों, राजस्व प्राधिकारियों और लागू कानूनों के अनुसार ही होगा। ब्रिटिश काल में दी गई संपत्तियों का वर्तमान कानूनी स्वरूप, स्वतंत्र भारत के कानूनों के साथ उनका संबंध तथा समय के साथ हुए संस्थागत परिवर्तनों ने अनेक जटिल प्रश्न उत्पन्न किए हैं। इन प्रश्नों के उत्तर केवल ऐतिहासिक दावों से नहीं, बल्कि अभिलेखों, विधिक प्रक्रियाओं और न्यायालयों के निर्णयों से ही निर्धारित होंगे।

महाराष्ट्र सरकार की पहल इस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम है। किंतु किसी भी संपत्ति पर अंतिम स्वामित्व, अधिकार अथवा वैधता का निर्धारण भारतीय कानून और सक्षम न्यायालयों के अधीन ही रहेगा। यही संवैधानिक व्यवस्था का मूल सिद्धांत है।

 

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