राजस्थान की अरावली पर्वतमाला की सुरम्य वादियों में बसा है ‘देवमाली’ गांव। इस गांव को भारत सरकार ने सर्वश्रेष्ठ पर्यटन गांव घोषित कर रखा है। पहले यह गांव अजमेर जिले के अंतर्गत था। वर्तमान में ब्यावर जिले के मसूदा उपखंड में आता है। यह गांव अपनी सदियों पुरानी परंपराओं, अटूट आस्था और पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली के लिए पूरी दुनिया में विख्यात हो चुका है।
गांव का इतिहास
देवमाली गांव की पहचान और इसकी आत्मा यहां के लोक-देवता भगवान देवनारायण (भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है) से जुड़ी है। भगवान देवनारायण जी को गुर्जर समाज का आराध्य देव माना जाता है। गांव की सबसे ऊंची पहाड़ी पर भगवान देवनारायण का भव्य मंदिर स्थित है, जो सात बड़ी चट्टानों को जोड़कर बनाया गया है। यहीं पर रहकर भगवान देवनारायण जी ने साधना की थी। बताया जाता है कि तभी से उनकी पूजा का क्रम प्रारंभ हुआ।

मंदिर के पुजारी रायमल गुर्जर बताते हैं, “मान्यता है कि सदियों पूर्व भगवान देवनारायण इस पावन स्थल पर आए थे, तभी पत्थर और चट्टानें उन्हें नमन करने के लिए झुक गई थीं। आज भी झुकी हुई चट्टानें उस पौराणिकता का प्रमाण देती हैं। यह दृश्य श्रद्धालुओं को आज भी गहरी आस्था और भक्ति का एहसास कराता है। भगवान देवनारायण के नाम पर ही गांव का नाम ‘देवमाली’ रखा गया है।”
पौराणिक मान्यताओं और स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार भगवान देवनारायण ग्रामीणों की निस्वार्थ सेवा और भक्ति से बेहद प्रसन्न हुए। उन्होंने गांव वालों को सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद दिया, लेकिन साथ ही यह वचन भी लिया कि इस गांव में कोई भी व्यक्ति अपने लिए पक्की छत या कंक्रीट का मकान नहीं बनाएगा। तब से लेकर आज तक सदियां बीत गईं, पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन देवमाली के लोगों ने अपने पूर्वजों के उस वचन को आज भी निभा रखा है।
अनूठी परंपराएं और नियम
देवमाली में एक भी पक्का मकान नहीं है। गांव में रहने वाले कई परिवार आर्थिक रूप से बेहद संपन्न हैं, वे शहरों में भी संपत्तियां रखते हैं, लेकिन जब वे देवमाली में रहते हैं, तो पीली मिट्टी, पत्थर, और केलू (लाल टाइल) की छत वाले कच्चे घरों में ही निवास करते हैं। पीली मिट्टी और गाय के गोबर से समय-समय पर इनकी लिपाई-पुताई घर के शुद्धिकरण भाव को लेकर की जाती है। गांव में केवल भगवान का मंदिर और सरकारी इमारतें (विद्यालय, अस्पताल, पंचायत भवन, डाक घर, सरस डेयरी) ही पक्की बनी हुई हैं।
एक विशेषता यह भी है कि इसका पत्थर इसी गांव में काम आता है। गांव वाले न तो उसे बेच सकते हैं और न ही कोई बाहर वाला व्यक्ति उसे ले जा पाता है। एक विशेष बात यह भी है कि सभी ग्रामवासी एक ही कुंए का पानी पीते हैं। मंदिर कमेटी के अध्यक्ष सांवरलाल गुर्जर के अनुसार, “प्रत्येक शनिवार को हर घर से निकला दूध केवल भगवान को ही अर्पित किया जाता है। उस दिन उसे काम में नहीं लिया जाता, न ही बेचा जाता है। इस दूध की खीर बनाकर प्रसाद स्वरूप उसे बांट दिया जाता है। इस दिन मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या 50,000 से भी अधिक पहुंच जाती है। प्रतिवर्ष भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष की सप्तमी को यहां विशाल मेला भरता है जिसमें देश भर के श्रद्धालु बड़ी संख्या में आते हैं। मान्यता है कि यहां आकर मंदिर दर्शन करने से असाध्य रोग भी दूर होते हैं।”
भगवान के नाम जमीन
यह जानकर हर कोई हैरान रह जाता है कि देवमाली गांव की करीब 3,600 बीघा जमीन किसी किसान या व्यक्ति के नाम पर नहीं, बल्कि सरकारी कागजों में सीधे तौर पर ‘भगवान देवनारायण’ के नाम पर दर्ज है। यहां कोई भी व्यक्ति जमीन का मालिकाना हक नहीं जताता, सभी स्वयं को भगवान का सेवक मानकर रहते हैं।
घरों में नहीं लगते ताले
गांव में अपराध का आंकड़ा शून्य है। यदि कुछ होता भी है तो गांव की पंचायत में उसका समाधान हो जाता है। इसके लिए स्थान तय है। गांव के लोग अपने घरों के दरवाजों पर ताला तक नहीं लगाते। यहां चोरी या आपसी विवाद की घटनाएं न के बराबर हैं।
मांस-मदिरा पर पूर्ण प्रतिबंध
देवमाली गांव के निवासियों का जीवन आज भी पूरी तरह से सात्विक व शाकाहारी है। गांव की सीमा के भीतर किसी भी प्रकार के मांस-मंदिरा का सेवन या अन्य प्रकार का नशा पूरी तरह से वर्जित है। यह नियम इतना सख्त है कि गांव में बाहर से आने वाले लोगों को भी इसका पालन करना पड़ता है।
प्रकृति से गहरा प्रेम
पर्यावरण संरक्षण इस गांव की जीवनशैली का अभिन्न अंग है। यहां के लोग पेड़ों की पूजा करते हैं। गांव में एक विशेष नियम यह भी है कि यहां नीम की लकड़ी को जलाया नहीं जाता। इसके अलावा, पारंपरिक रूप से यहां के लोग मिट्टी के चूल्हे पर ही खाना बनाते हैं। केरोसिन, गैस जैसी अन्य ज्वलनशील पदार्थों का प्रयोग यहां नहीं किया जाता है। पशुपालन पर ही यहां के लोगों का जीवन निर्भर है।
पर्यटन और सिनेमा तक पहुंची लोकप्रियता
सितंबर, 2024 में ‘सर्वश्रेष्ठ पर्यटन गांव’ का पुरस्कार मिलने के बाद देवमाली राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पटल पर अपनी एक अलग पहचान बना चुका है। पूरे भारत से ही नहीं नेपाल, कनाडा, अमेरिका सहित अन्य स्थानों से भी बड़ी संख्या में पर्यटक यहां की शांति, शुद्ध हवा, मिट्टी के घरों की सुंदरता और स्थानीय लोगों के आतिथ्य-सत्कार को देखने खिंचे चले आते हैं। आधुनिक सुख-सुविधाओं (जैसे टीवी, फ्रिज, मोबाइल) का प्रयोग करने के बाद भी ग्रामीणों ने अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा है। हाल ही में, इस गांव की सुंदरता और सादगी से प्रभावित होकर बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार की फिल्म ‘जॉली एलएलबी 3’ की शूटिंग भी इसी गांव में हुई, जिससे इसकी लोकप्रियता और बढ़ गई।
सामाजिक ताना-बाना और भाईचारा
देवमाली गांव मुख्य रूप से गुर्जर बहुल है। इस गांव में लगभग 350 घर हैं और आबादी करीब 2,000 है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस गांव के सभी लोग एक ही गोत्र (लावड़ा) के हैं और खुद को एक ही पूर्वज (दादा) की संतान मानते हैं। यही कारण है कि पूरे गांव में एक परिवार जैसा माहौल रहता है। सभी के सुख-दु:ख में या कोई भी उत्सव हो तो पूरा गांव एक साथ खड़ा दिखाई देता है।
देवमाली सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि एक जीवंत संस्था है जिसने पूरी दुनिया के सामने सतत जीवन-शैली (सस्टेनेबल लिविंग) का एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया है। यह गांव इस बात का प्रमाण है कि भारत की वास्तविक सुंदरता आज भी उसके गांवों और उसकी मिट्टी में ही बसती है। इसे राजस्थान का ऐतिहासिक स्थल कहें या पर्यटन गांव एक बार अवश्य जाना चाहिए।
(लेखक ‘पाथेय कण’ के सह संपादक हैं)
















