सोनम वांगचुक की पत्नी ने ‘आंदोलनजीवियों’ की दुकान उजाड़ दी
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सोनम वांगचुक की पत्नी ने ‘आंदोलनजीवियों’ की दुकान उजाड़ दी

सोनम वांगचुक की 21 दिन की भूख हड़ताल के बाद पत्नी गीतांजलि आंग्मो का bomba फटने वाला बयान: सिर्फ संसद में शिक्षा जवाबदेही उठाने का आश्वासन चाहिए। राजनीतिक ड्रामा का अंत।

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु' — edited by कुलदीप सिंह
Jul 20, 2026, 02:43 pm IST
inविश्लेषण

08 जुलाई 2026 की शाम लद्दाख के प्रसिद्ध शिक्षा सुधारक और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक लगभग 21 दिनों की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के बाद, स्वास्थ्य बिगड़ने पर दिल्ली पुलिस द्वारा कोर्ट आदेश के तहत सफदरजंग अस्पताल पहुंचा दिए गए। 59 वर्षीय वांगचुक नीट-यूजी 2026 पेपर लीक, आईआईटी—जी जैसी परीक्षाओं में अनियमितताओं, बढ़ती शिक्षा लागत, छात्र आत्महत्याओं और शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही की मांग को लेकर भूखे थे। उन्होंने कॉकरोच जनता पाटी (सीजेपी) के युवा आंदोलन के साथ एकजुटता जताई थी।

उनकी पत्नी गीतांजलि आंग्मो ने माइक संभाला और एक साधारण-सा, लेकिन बम की तरह फटने वाला बयान दिया। उस एक वाक्य ने पूरे राजनीतिक थिएटर को हवा में उड़ा दिया:

“अगर राजनीतिक नेता अस्पताल जाकर सोनम से मिलें और उन्हें भरोसा दिला दें कि संसद के मानसून सत्र में शिक्षा की जवाबदेही का मुद्दा उठाएंगे, तो सोनम कल अपनी भूख हड़ताल खत्म कर देंगे।”

बस। इतना ही।

कोई इस्तीफे की मांग नहीं। खासकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा तो सोनम वांगचुक के शब्दों या मांगों में कहीं दर्ज ही नहीं था। न कोई चक्का जाम, न कोई इस्तीफा, न कोई सत्ता के खिलाफ व्यक्तिगत हमला। सिर्फ संसद में मुद्दा उठाने का आश्वासन। जैसे किसी ने अरुंधति रॉय, योगेंद्र यादव, कॉलिन गोंसाल्वेस और अन्य ‘क्रांतिकारी’ स्क्रिप्ट-राइटर्स का पूरा ड्रामा बीच में फाड़कर फेंक दिया हो।

राजनीतिक बिरयानी की दुकानें बंद

कल तक जंतर-मंतर पर जो माहौल था, वह ‘जन-आंदोलन’ का सुनहरा मौका लग रहा था। राकेश टिकैत, अभिजीत दिपके (सीजेपी के संस्थापक), चंद्रशेखर आजाद, विजेता दहिया, संजय सिंह, मनोज झा और अन्य विपक्षी चेहरे सोनम को अपना ‘हथियार’ बना रहे थे। नारे लग रहे थे – “मोदी सरकार शिक्षा का गला घोंट रही है, प्रधान इस्तीफा दो!” कुदरती बिरयानी बंट रही थी, वायरल क्लिप्स बन रही थीं, और राजनीतिक स्टॉक में उछाल आने वाला था।

तथ्य यह है कि नीट-यूजी 2026 पेपर लीक ने पूरे देश में लाखों छात्रों और परिवारों का भरोसा तोड़ा था। छात्र आत्महत्याओं की खबरें, कोचिंग सेंटर्स की महंगाई और परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल उठे थे। सोनम वांगचुक, जो 30 वर्षों से लद्दाख में एक एनजीओ चला रहे हैं, इस मुद्दे पर चुप नहीं रह सके। उन्होंने सीजेपी के साथ मिलकर जंतर-मंतर पर धरना दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, हड़ताल के दौरान उन्होंने 8-8.5 किलो वजन गंवाया, ब्लड ग्लूकोज लेवल गिरा, लेकिन उन्होंने आईवी (इन्ट्रावेनस) फ्लूइड्स लेने से इनकार कर दिया।

लेकिन गीतांजलि आंग्मो के बयान ने सब बदल दिया। अब ‘आंदोलनजीवी’ योद्धाओं के पास क्या बचा? कोई बड़ा नारा नहीं, कोई इस्तीफा नहीं, सिर्फ ‘संसद में चर्चा’ का मामूली आश्वासन। यह बयान राजनीतिक थिएटर का क्लाइमेक्स था – जहां नायक (सोनम) ने खुद स्क्रिप्ट बदल दी, और सपोर्टिंग एक्टर्स (विपक्षी नेता) बिना डायलॉग के स्टेज पर खड़े रह गए।

अस्पताल में नया अध्याय: हकीकत बनाम ड्रामा

18 जुलाई को दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश और मेडिकल सलाह के आधार पर सोनम को अस्पताल शिफ्ट किया गया। गीतांजलि आंग्मो ने तुरंत अस्पताल पहुंचकर सवाल उठाए – “बिना परिवार की सहमति के इलाज नहीं होगा। रिपोर्ट्स दिखाओ।” उन्होंने कहा कि कल शाम तक सोनम के विटल्स नॉर्मल थे (पोटैशियम 4.3), अचानक 2.9 कैसे हो गया? उन्होंने बाहरी लैब से टेस्ट कराने की बात कही और स्पष्ट किया कि सोनम अभी भी उपवास पर हैं – सिर्फ नमक वाला पानी ले रहे हैं।

यह बयान तथ्यात्मक रूप से महत्वपूर्ण है। सोनम ने अस्पताल को ‘अवैध हिरासत’ बताया (अपनी पत्नी के माध्यम से) और 20 जुलाई के संसद मार्च को ‘दूसरी आजादी की लड़ाई’ करार दिया। विपक्षी नेता राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल ने शिफ्टिंग को ‘जबरदस्ती’ बताया, जबकि सरकार और पुलिस ने इसे शुद्ध मेडिकल और कोर्ट-डायरेक्टेड बताया।

जो लोग सोनम को ‘मोदी सरकार विरोधी’ हथियार बनाना चाहते थे, उन्हें खुद सोनम (या उनकी पत्नी) ने समझा दिया – मुद्दा शिक्षा की जवाबदेही है, न कि व्यक्तिगत इस्तीफे या सत्ता परिवर्तन का। यह ‘जन-नेताओं’ के पुराने फॉर्मूले को पंचर कर गया: मुद्दा पकड़ो, चेहरा आगे करो, पीछे से वोट और वायरल फेम बटोर लो। इस बार फॉर्मूला फेल।

क्या विपक्ष संसद में मुद्दा उठाएगा

सोनम वांगचुक कोई नया चेहरा नहीं। उन्होंने कहा – परीक्षा घोटालों ने युवाओं का भविष्य छीन लिया है। लेकिन उन्होंने कभी इसे ‘मोदी-विरोध’ का मुद्दा नहीं बनाया। इसके विपरीत, कुछ ‘आंदोलनजीवी’ इसे अपना राजनीतिक रथ बनाने में लगे थे। सीजेपी के अभिजीत दिपके जैसे युवा चेहरे जंतर-मंतर पर हजारों छात्रों को जुटा रहे थे। 20 जुलाई को ‘चलो संसद’ मार्च की तैयारी थी। लेकिन गीतांजलि के बयान ने माहौल शांत कर दिया। अब सवाल यह है – क्या विपक्ष संसद में मुद्दा उठाएगा, या फिर नया ड्रामा रचेगा?

हकीकत की हवा और दुकानों का बिखरना

जंतर-मंतर पर जो हवा चली, वह क्रांति की नहीं – शिक्षा जवाबदेही की थी। सोनम की हड़ताल ने परीक्षा सुधार, एनटीए की जवाबदेही और छात्र मानसिक स्वास्थ्य जैसे वास्तविक मुद्दों को हाइलाइट किया। लेकिन राजनीतिक शोषण ने इसे ‘सरकार विरोध’ का नाटक बना दिया। गीतांजलि आंग्मो का बयान उस नाटक का अंत था। सोनम की हड़ताल 17-21 दिनों तक चली। उन्होंने 8+ किलो वजन गंवाया। अस्पताल शिफ्टिंग के बाद भी वे उपवास पर अड़े रहे। गीतांजलि ने परिवार की सहमति और पारदर्शिता पर जोर दिया। विपक्ष ने इसे राजनीतिक मुद्दा बनाया, लेकिन सोनम ने इसे मुद्दा-केंद्रित रखा।

अब ‘षड्यंत्रकारियों’ का गिरोह क्या करेगा? मंच के पीछे छिपे लोग धीरे-धीरे आगे आ रहे थे, लेकिन एक बयान ने उनके गुब्बारे को पंचर कर दिया। अब कौन सा नया बखेड़ा खड़ा होगा? देखते रहिए।

Topics: सोनम वांगचुक भूख हड़तालगीतांजलि आंग्मो बयानशिक्षा जवाबदेहीसोनम वांगचुक सफदरजंग अस्पताल
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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