सहरसा (बिहार)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सह सरकार्यवाह रामदत्त चक्रधर ने सहरसा के स्थानीय देव रिसॉर्ट में आयोजित ‘पर्यावरण संरक्षण एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका’ विषयक संगोष्ठी में युवाओं और छात्रों को संबोधित किया. इस दौरान उन्होंने राष्ट्र निर्माण, पर्यावरण चेतना और समाज में संघ के रचनात्मक दायित्वों पर विस्तार से मार्गदर्शन किया.
सह सरकार्यवाह ने छात्रों को पर्यावरण के वैज्ञानिक और व्यावहारिक महत्व को समझाते हुए कहा कि मानव जीवन के अस्तित्व के लिए जल और अन्न जितना आवश्यक है, उतनी ही जरूरी हमारे लिए शुद्ध हवा (ऑक्सीजन) है. उन्होंने वैश्विक महामारी कोरोना काल का स्मरण कराते हुए कहा कि उस संकट के समय हम सभी ने ऑक्सीजन की वास्तविक महत्ता को बहुत करीब से महसूस किया है. इस प्रकार के संकटों से भावी पीढ़ियों को बचाने का एकमात्र उपाय बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करना है.
सनातन धर्म की परंपराओं में वृक्षों की पूजा के पीछे गहरा विज्ञान
रामदत्त चक्रधर ने भारतीय संस्कृति और प्रकृति के अटूट संबंधों को रेखांकित करते हुए कहा कि सनातन धर्म में सदियों से प्रकृति को भगवान मानकर उसकी रक्षा का विधान है.
“हमारे यहाँ प्राचीन काल से ही तुलसी, पीपल, पाकड़, बरगद और नीम जैसे औषधीय व प्राणवायु देने वाले वृक्षों की पूजा-पाठ की परंपरा है. यहाँ तक कि हमारे वैवाहिक जीवन के मांगलिक व शुभ धार्मिक संस्कारों में भी आम और महुआ सहित अनेक प्रकार के वृक्षों का पूजन किया जाता है. यह केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि प्रकृति को सहेजने का हमारा गहरा वैज्ञानिक दृष्टिकोण है.”
उन्होंने इस दौरान देश के युवाओं और छात्र शक्ति से एक विशेष संकल्प लेने का आह्वान किया. उन्होंने कहा कि प्रत्येक युवा को पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए प्रति वर्ष कम से कम 10 पौधे लगाने चाहिए और न सिर्फ पौधे लगाने चाहिए, बल्कि उनके वृक्ष बनने तक उनकी पूर्ण देखभाल का जिम्मा भी उठाना चाहिए.
राष्ट्र निर्माण के लिए जीवन में उतारें ‘पंच परिवर्तन’
संगोष्ठी के दौरान सह सरकार्यवाह ने छात्रों के समक्ष संघ के ‘पंच परिवर्तन’ (Five Key Shifts) के विचार को प्रमुखता से रखा, जो समाज को बदलने और राष्ट्र को सशक्त बनाने की दिशा में एक नया महामंत्र है.
संघ के पंच परिवर्तन के पांच मुख्य आयाम:
- पर्यावरण संरक्षण: जल, जमीन, जंगल और हवा को शुद्ध रखने का निरंतर प्रयास.
- कुटुंब प्रबोधन: परिवार में आपसी संवाद, संस्कार और परिवार व्यवस्था को सुदृढ़ करना.
- सामाजिक समरसता: जातिगत भेदभाव से ऊपर उठकर संपूर्ण समाज को एक सूत्र में पिरोना.
- स्वदेशी व आत्मनिर्भरता: देश में निर्मित वस्तुओं को प्राथमिकता देकर आर्थिक संप्रभुता को बढ़ावा देना.
- नागरिक बोध: देश के कानूनों का पालन करना और नागरिक के रूप में अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहना.
उन्होंने युवाओं को उनके राष्ट्रीय दायित्वों का बोध कराते हुए कहा कि जब तक देश के हर नागरिक के भीतर ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ का भाव पूरी तरह से जागृत नहीं होगा, तब तक हम परम वैभव को प्राप्त नहीं कर सकते. नागरिक कर्तव्यों के इस जागरण से ही भारत को पुनः विश्वगुरु के सिंहासन पर आसीन किया जा सकता है.
इस विचारोत्तेजक समारोह में जिला संघ चालक सतीश चंद्र वर्मा, प्रांत सह प्रचारक प्रवीर, विभाग प्रचारक सुमित, मेजर डॉक्टर गौतम कुमार, ज्ञानू, आशीष टिंकू, रणधीर भगत, मनीष चौपाल, विजय सिंह एवं रंजीत दास सहित क्षेत्र के अनेक प्रबुद्धजन, सामाजिक कार्यकर्ता और बड़ी संख्या में छात्र उपस्थित रहे.

















