सत्य को किसी प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती, सत्य स्वयं प्रकाशमान है। ब्रह्मांड का संतुलन और पृथ्वी का अस्तित्व को सत्य और शाश्वत नैतिक नियमों पर आधारित है। पढ़ें आज का श्लोक
श्लोक-
सत्येनोत्तभिता भूमिः सूर्येणोत्तभिता द्यौः।
ऋतेनादित्यास्तिष्ठन्ति दिवि सोमो अधिश्रितः॥ (ऋग्वेद)
भावार्थ –
सूर्य ने द्युलोक को धारण किया है, सोम द्युलोक के आश्रित है। देवता यज्ञ के आश्रित है। यज्ञ में यजमान द्वारा दी गई आहुति से देवताओं का पोषण होता है, उसी प्रकार पृथ्वी ‘सत्य’ पर आश्रित है। अर्थात् सत्य नियम में बंधी हुई भूमि समयानुसार शस्यादि को उत्पन्न कर प्राणियों को धारण करती है।
आज क्यों है प्रासंगिक
आज के समय में जब समाज भटकाव, झूठ और नैतिक पतन से जूझ रहा है तब यह श्लोक याद दिलाता है कि किसी भी समाज के, राष्ट्र के स्थायित्व के लिए सत्य की नींव जरूरी है। दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है, ऐसे में प्रकृति के शाश्वत नियमों का सम्मान और संरक्षण करना चाहिए।

















