फीफा विश्वकप में इस्लामिक देशों के प्रशंसक क्यों हुए खफा?
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फीफा विश्वकप में इस्लामिक देशों के प्रशंसक क्यों हुए खफा?

अब अर्जेन्टीना के खिलाफ इस्लामिक मुल्क और वामपंथी लोग सामने आ गए हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि मिस्र को जान-बूझकर हराया गया और अर्जेन्टीना के पक्ष में लामबंदी फीफा द्वारा की जा रही है।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Jul 15, 2026, 05:50 pm IST
inविश्व, खेल
अर्जेंटीना के फुटबॉल खिलाड़ी मेसी।

अर्जेंटीना के फुटबॉल खिलाड़ी मेसी।

इस्लामिक देशों में खेलकूद की प्रतिस्पर्धा को खेत तक ही नहीं बल्कि उसे मुस्लिम पहचान के लिए लड़ाई भी मान लिया जाता है। इसके उदाहरण अक्सर देखतने को मिलते भी हैं। कुछ साल पहले जब भारत के खिलाफ पाकिस्तान ने क्रिकेट में दस विकेट से जीत दर्ज की थी, तो उसे मुसलमानों की जीत बताया गया था। मुसलमान की जीत या हार पर इनकी दुनिया टिक जाती है, फिर चाहे वह क्रिकेट का विश्वकप हो या फिर फीफा का।

इस्लामिक एजेंडे में रंगा नजर आया फीफा

फीफा इस बार इस्लामिक एजेंडे में रंगा हुआ नजर आया। जहां इससे पहले कतर में हुआ फीफा विश्वकप इसलिए विवादों में रहा था कि कतर ने इस्लामिक तौर तरीकों के अनुसार ही फीफा के आयोजनों को ढाल लिया था, इस बार भी यही बहुत कुछ हुआ है, क्योंकि इस बार इस टूर्नामेंट में 14 मुस्लिम मुल्कों की टीमें शामिल थीं। अल्जीरिया, बोस्निया और हर्जेगोविना, मिस्र (इजिप्ट), ईरान, इराक, जॉर्डन, मोरक्को, कतर, सऊदी अरब, सेनेगल, ट्यूनीशिया, तुर्की, उज़्बेकिस्तान और आइवरी कोस्ट की टीमें फीफा विश्वकप में शामिल थीं। लोगों को ऐसा लग भी रहा था कि इनमें से कोई न कोई टीम तो सेमीफाइनल या फाइनल तक पहुंचेगी। लेकिन मिस्र की अर्जेन्टीना के हाथों 3-2 से पराजय ने सारे सपने तोड़ दिए।

अब अर्जेन्टीना के खिलाफ इस्लामिक मुल्क और वामपंथी लोग सामने आ गए हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि मिस्र को जान-बूझकर हराया गया और अर्जेन्टीना के पक्ष में लामबंदी फीफा द्वारा की जा रही है। यह विवाद बढ़ रहा है कि लोकप्रिय खिलाड़ी मेसी को लेकर फीफा पक्षपात कर रहा है।

मुस्लिम मुल्कों की अंतिम उम्मीद था मिस्र

दरअसल मुस्लिम मुल्कों की अंतिम उम्मीद मिस्र की टीम रह गई थी। मैच के अंतिम पंद्रह मिनट तक मिस्र की टीम 2 गोल की बढ़त बनाए हुए थी। अर्जेन्टीना की टीम ने एक भी गोल नहीं किया था। अंतिम पंद्रह मिनट में ही गेम बदल गया और अर्जेन्टीना की टीम ने तीन गोल कर दिए।

यह एक रोमांचक मैच था, मगर मैच के बाद मिस्र के कोच होसम हसन ने यह दावा किया था कि फीफा ने पक्षपात किया है और उन्होंने यहां तक कहा कि टूर्नामेंट के नियम ही अर्जेन्टीना और मेसी को फायदा देने के लिए बनाए गए हैं।

उसके बाद लगातार ही यह चर्चा चल रही है कि फीफा ने अर्जेन्टीना के लिए नियम बदल दिए हैं। मगर क्या मामला केवल फुटबॉल का है? या फिर मजहबी? अर्जेन्टीना के विरोधियों का यह कहना है कि मेसी जैसे सुपरस्टार को बनाए रखने के लिए फीफा ऐसे कदम उठा रहा है। यह बात पूरी तरह से सच है कि मेसी एक ऐसे खिलाड़ी हैं, जो भीड़ खींचने की क्षमता रखते हैं। उनके कारण कई टिकट बिकते हैं।

अर्जेन्टीना की जीत या फिर कुछ और

यह सच है कि अर्जेन्टीना की टीम ने मुस्लिम मुल्क की फीफा में जीत का सपना तोड़ दिया है। मगर क्या यही एक कारण है कि मुस्लिम मुल्क अचानक से ही अर्जेन्टीना के विरोध में आ गए हैं? क्या केवल खेल ही एकमात्र कारण है या फिर कारण कुछ और है?

दरअसल यह कारण राजनीतिक है। अर्जेन्टीना के राष्ट्रपति जेवियर मीलई इस्लाम और लेफ्ट विचारधारा के प्रति बहुत आलोचनात्मक रवैया रखते हैं। उन्होंने बार-बार इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की है और इसके साथ ही इज़रायल के साथ गठबंधन को प्राथमिकता दी है, जबकि लेफ्ट और समाजवादी राजनीति को वे अर्जेंटीना की समस्याओं का मूल कारण मानते हैं।

यही कारण है कि इस्लामिक मुल्क अर्जेन्टीना के खिलाफ मिली इस हार को पचा नहीं पा रहे हैं। उनका यह कहना है कि अर्जेन्टीना के राष्ट्रपति अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ मिलकर फीफा के नियमों के साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं।

इस्लामिक देशों का यह भी कहना है कि जब अर्जेन्टीना राजनीतिक रूप से इजरायल का इतना मजबूत सहयोगी है, तो फीफा भी अर्जेन्टीना को खेल में विशेष लाभ दे रहा है।

अर्जेन्टीना ने अपना दूतावापस तेल अवीव से येरूशलम शिफ्ट कर दिया था, इसे लेकर भी मुस्लिम मुल्क अर्जेन्टीना के विरोधी रहे हैं। इसके साथ ही अर्जेन्टीना ने हमास को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था। इतना ही नहीं इसने संयुक्त राष्ट्र में फ़िलिस्तीन की सदस्यता के खिलाफ वोट किया, जिससे मुस्लिम देशों को लगा कि अर्जेंटीना उनके राजनीतिक हितों के खिलाफ खड़ा है।

फीफा विश्वकप में भी मुस्लिम देशों का रवैया अर्जेन्टीना के खिलाफ पक्षपाती रहा। यहाँ तक कि बांग्लादेश जैस देशों में भी अर्जेन्टीना के झंडे जलाए गए, और उसके धार्मिक प्रतीकों पर भी विवाद हुआ।

ये तमाम बातें बताती हैं कि अर्जेन्टीना का मुस्लिम मुल्कों द्वारा विरोध कहीं से भी खेलकूद की भावना से जुड़ा हुआ नहीं है। एक ऐसा देश जो इस्लामिक आतंक के खिलाफ बात करता है, जो इजरायल और अमेरिका का साथी है, उसके हाथों एक इस्लामिक मुल्क की फीफा में पराजय खेल से परे राजनीतिक और धार्मिक हो गई है।

 

Topics: अर्जेंटीनामुस्लिम पहचानइस्लामिक मुल्कफीफा विश्वकपअर्जेंटीना की टीमफीफा हराम है
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