
फिल्म ‘सतलुज’ का एक दृृृश्य
एक मद्धम रोशनी वाला कमरा। मेज पर आधी खाली शराब की बोतलें, सिगरेट की राख से भरी ऐश-ट्रे और उन्हीं के बीच बेतरतीब ढंग से रखी पिस्तौलें तथा हैंड ग्रेनेड। धुंधले साए में बैठा एक व्यक्ति-गहरे रंग की लेदर जैकेट, आंखों पर एविएटर चश्मा और हाथों में गिटार। वही उंगलियां, जिन्होंने कुछ घंटे पहले मासूमों की जिंदगी छीनने के लिए ट्रिगर दबाई थीं, अब गिटार के तारों पर बेहद नफासत से थिरक रही हैं। कमरे में एक मद्धम धुन गूंजती है, जो हवा में तैरते धुएं को चीरती हुई फैल जाती है। संगीत की लय में मेज पर रखा मौत का हर हथियार मानो एक सम्मोहक आवरण ओढ़ लेता है। हिंसा की वीभत्सता धुंधली पड़ने लगती है और रक्तरंजित वास्तविकता, कला और रोमांच के मायावी पर्दे के पीछे कहीं खो जाती है। यही सिनेमा की सबसे बड़ी और शायद सबसे खतरनाक चालाकी है। कैमरे का एक कोण, पृष्ठभूमि में बजती एक मोहक धुन, चमड़े की एक जैकेट और आत्मविश्वास से भरी चाल-बस इतना काफी होता है कि वास्तविक जीवन का एक निर्दयी हत्यारा पर्दे पर रोमांटिक विद्रोही में बदल जाए। दर्शक उसके अपराधों की विभीषिका को भूल जाता है और उसके अभिनय पर तालियां बजाता है।
ऐसी ही कहानी है ‘कार्लोस द जैकाल’ की। 1970 और 1980 के दशक का सबसे कुख्यात अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी, जिसके रक्तरंजित हमलों ने यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया था। लेकिन जब उसकी कहानी सिनेमा के पर्दे पर आई, तो कई आलोचकों ने चेतावनी दी कि उसकी हिंसा कहीं उसके आकर्षक चित्रण के पीछे दब गई है। फिल्म समीक्षक टिम रॉबी ने ‘द टेलीग्राफ’ में लिखा कि यह फिल्म आतंकवाद को एक ग्लैमरस ‘रॉक-एंड-रोल’ तमाशे की तरह प्रस्तुत करती है। परिणाम यह होता है कि इतिहास से अनभिज्ञ युवा दर्शक हत्यारे की क्रूरता से विचलित होने के बजाय उसके अंदाज और व्यक्तित्व से प्रभावित होने लगता है।
सिनेमा की सबसे बड़ी चालाकी तथ्यों को झुठलाने में नहीं, बल्कि उन्हें चुनने और गढ़ने में होती है।
हॉलीवुड ने यह प्रयोग ‘कार्लोस’ और ‘डाउनफॉल’ जैसी फिल्मों में किया, तो भारतीय क्षेत्रीय सिनेमा भी ‘सतलुज’ जैसी फिल्मों में इसी प्रवृत्ति का अनुसरण करता दिखाई देता है। राज्य की बर्बरता को क्लोज-अप में दिखाइए, लेकिन उसी बर्बरता को जन्म देने वाली उग्रवादी विचारधारा, आतंक और संगठित हिंसा को गायब कर दीजिए। परिणामस्वरूप दर्शक को पूरा सच नहीं, बल्कि सावधानी से चुना गया आधा सच मिलता है। और आधा सच, कई बार, पूरे झूठ से भी अधिक खतरनाक होता है, क्योंकि वह सत्य का मुखौटा पहनकर भ्रम को वैधता प्रदान करता है।
सवाल यह है कि ऐसी फिल्में बनती क्यों हैं? इसका उत्तर अक्सर उन निर्देशकों की छद्म-क्रांतिकारी महत्वाकांक्षा में छिपा होता है, जो स्वयं को व्यवस्था-विरोधी चेतना का सबसे प्रामाणिक प्रतिनिधि और सत्य का एकमात्र प्रवक्ता सिद्ध करना चाहते हैं। कहानी का चुनाव करते ही वे यह भी तय कर लेते हैं कि दर्शक की सहानुभूति किसके साथ होगी और उसकी नाराजगी किसके विरुद्ध।
‘सतलुज’ जैसी फिल्मों में सारी सहानुभूति राज्य के दमन पर केंद्रित है। यदि दमन हुआ है, तो उसका चित्रण होना भी चाहिए; लेकिन जब कथा उसी के समानांतर उन हजारों निर्दोष नागरिकों की पीड़ा को लगभग मौन में निगल जाती है, जो पंजाब में आतंकी हिंसा के शिकार बने, तब यह चयन भी एक वैचारिक वक्तव्य बन जाता है। इतिहास का एक हिस्सा उजाले में रहता है, जबकि दूसरा हिस्सा जानबूझकर अंधेरे में छोड़ दिया जाता है।
‘कार्लोस’ में जो काम हॉलीवुड ने किया, वही प्रवृत्ति सुखविंदर विकी की ‘सतलुज’ में दिखाई देती है। आतंकवादी पात्र को स्टाइलिश परिधान, प्रभावशाली पृष्ठभूमि संगीत, सिगार के धुएं के साथ रॉकस्टार बना दिया। ऐसे व्यक्तित्व को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि उसका हिंसक अतीत धीरे-धीरे उसके करिश्मे के पीछे धुंधला पड़ जाए। भारतीय संदर्भ में भी कई बार चरमपंथ से सहानुभूति रखने वाले पात्रों को भावुक पिता, ईमानदार कर्मचारी या उत्पीड़ित समाज के मसीहा के रूप में गढ़ा जाता है, जिससे दर्शक उनके विचारों की आलोचनात्मक पड़ताल करने के बजाय उनकी निजी त्रासदी से जुड़ने लगे।
यहीं सिनेमा अपनी सबसे प्रभावशाली मनोवैज्ञानिक युक्ति अपनाता है। जब पर्दे पर किसी लोकप्रिय अभिनेता की आंखों में आंसू दिखाई देते हैं, तो दर्शक का ध्यान उसके कर्मों से हटकर उसके दर्द पर केंद्रित हो जाता है। फिल्मकार जानते हैं कि भावनाएं अक्सर तर्क पर भारी पड़ती हैं; इसलिए वे विचारों पर बहस नहीं, बल्कि संवेदनाओं के माध्यम से दर्शक की धारणा को आकार देने का प्रयास करते हैं। क्या किसी जल्लाद की क्रूरता केवल इसलिए भुला दी जानी चाहिए कि वह शाम को घर लौटकर अपने बच्चों को प्यार करता है और पत्नी के साथ बगीचे में चाय पीता है? यदि नहीं, तो फिर सिनेमा बार-बार अपराधी की मानवीय छवि को उसके अपराधों से बड़ा क्यों बना देता है?
‘द जोन ऑफ इंटरेस्ट’ इसी जटिल प्रश्न के केंद्र में खड़ी फिल्म है। यह कला के नाम पर संवेदनहीन प्रयोग है। फिल्म की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह एक ओर अपराधी के सुव्यवस्थित, शांत और सुखी घरेलू जीवन को विस्तार से दिखाती है, तो दूसरी ओर लाखों निर्दोष पीड़ितों की चीखों को महज पृष्ठभूमि के शोर में समेट देती है। ‘द जोन ऑफ इंटरेस्ट’ के निर्देशक जोनाथन ग्लेजर ने इस उदासीनता को ही अपनी कलात्मक शैली का आधार बनाया है। कैमरा औशविट्ज के कमांडर रुडोल्फ होस के आलीशान घर, उसके परिवार और उसकी दिनचर्या पर ठहरता है, जबकि दीवार के उस पार चल रहे नरसंहार की भयावहता केवल ध्वनियों में सिमट जाती है।
कुछ ऐसी ही प्रवृत्ति ‘डाउनफॉल’ में भी दिखाई देती है, जहां हिटलर कई दृश्यों में एक कमजोर, कांपते हुए वृद्ध के रूप में सामने आता है, जो अपने कुत्ते से स्नेह करता है और अपनी सचिव के प्रति विनम्र व्यवहार करता है। ऐसे दृश्य ऐतिहासिक तथ्य हो सकते हैं, लेकिन जब वे उसके अपराधों की विराटता की तुलना में अधिक भावनात्मक स्थान घेरने लगते हैं, तो दर्शक की स्मृति का संतुलन बदलने लगता है। फिल्मकार जानते हैं कि आतंकवाद, नरसंहार या अलगाववाद का प्रत्यक्ष महिमामंडन समाज और कानून तुरंत अस्वीकार कर देंगे। इसलिए अपराधी को निर्दोष नहीं, बल्कि ‘मानवीय’ बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। उसकी विचारधारा नहीं, उसकी पारिवारिक संवेदनाएं, उसके अपराध नहीं, उसके निजी क्षण, उसकी हिंसा नहीं, उसका अकेलापन-इन सबको केंद्र में रखकर दर्शक की सहानुभूति का धीरे-धीरे पुनर्निर्माण किया जाता है। यही वह बिंदु है, जहां कला और नैतिकता के बीच की रेखा सबसे अधिक धुंधली दिखाई देने लगती है।
लेकिन प्रश्न यह है कि इतिहास के दूसरे पक्ष पर कैमरा कब जाएगा? क्या किसी फिल्मकार ने कभी पंजाब पुलिस के उन अधिकारियों की कहानी कहने का साहस किया, जिन्होंने आतंकवाद के विरुद्ध लड़ते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए? उदाहरण के लिए, डीआईजी अटवाल, जिनकी स्वर्ण मंदिर के बाहर नजदीक से गोली मारकर हत्या कर दी गई थी और जिनका शव घंटों मुख्य द्वार के सामने पड़ा रहा, क्योंकि उसे उठाने का साहस कोई नहीं कर सका। क्या यह दृश्य किसी सिनेमाई स्मृति का हिस्सा बना?
हॉलीवुड ने ‘द पोस्ट’ जैसी फिल्म बनाई, जिसमें ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ द्वारा पेंटागन पेपर्स प्रकाशित करने और सत्ता के दबाव का सामना करने की कहानी को वैश्विक पहचान मिली। वह प्रेस की स्वतंत्रता और संस्थागत साहस का महत्वपूर्ण अध्याय था। भारतीय इतिहास में भी पत्रकारिता के साहस के ऐसे अध्याय मौजूद हैं, जिनकी कीमत केवल मुकदमों, आर्थिक नुकसान या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि जीवन से चुकाई गई।
पंजाब में आतंकवाद के दौर में ‘पंजाब केसरी’ ने लगातार उग्रवाद के विरुद्ध लिखा। उसके पत्रकारों, संपादकों और मालिकों को बार-बार जान से मारने की धमकियां मिलीं। आतंकवादियों का संदेश स्पष्ट था-भिंडरावाले और आतंकवाद के विरुद्ध लिखना बंद करो, अन्यथा मृत्यु के लिए तैयार रहो। इसके बावजूद इस दैनिक समाचार-पत्र ने अपने संपादकीय रुख से समझौता नहीं किया। यह केवल पत्रकारिता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए दिया गया असाधारण साहस का उदाहरण था। विडंबना यह है कि इस संघर्ष और इसके नायकों को भारतीय सिनेमा ने वह स्थान अब तक नहीं दिया, जिसके वे वास्तविक अर्थों में अधिकारी हैं।
कांग्रेस नेता मनीष तिवारी के पिता प्रो. विश्वनाथ तिवारी की हत्या। ढिलवां के निकट बस से यात्रियों को धार्मिक पहचान पूछकर उतारना और छह निर्दोष लोगों की हत्या। गोबिंदगढ़ रेल नरसंहार। 1981 से 1993 के बीच पंजाब में 11,000 से अधिक आम नागरिक (हिंदू और सिख) आतंकवाद का शिकार बने। उनका एकमात्र ‘अपराध’ खालिस्तानी विचारधारा को स्वीकार न करना था। ये भी इतिहास के उतने ही वास्तविक और दर्दनाक अध्याय हैं। लेकिन इनकी पीड़ा, इनके साहस और इनके बलिदान पर भारतीय सिनेमा शायद ही कभी ठहरता है। इसके विपरीत, देश विरोधी विचारधारा से जुड़े पात्रों को केंद्र में रखकर बनाई गई ‘सतलुज’ जैसी फिल्में अक्सर कलात्मक स्वतंत्रता और वैकल्पिक दृष्टिकोण के नाम पर व्यापक चर्चा का विषय बन जाती हैं।
यही प्रवृत्ति अंतरराष्ट्रीय सिनेमा में भी दिखाई देती है। ‘कार्लोस द जैकाल’ ने ओपेक मुख्यालय पर हमला कर कई लोगों की हत्या की, सऊदी अरब और ईरान के तेल मंत्रियों सहित 60 से अधिक राजनयिकों को बंधक बनाया, उन्हें विमान से अल्जीरिया ले गया, करोड़ों डॉलर की फिरौती वसूली और वर्षों तक गिरफ्तारी से बचता रहा। लेकिन जब उसकी कहानी पर्दे पर आई, तो निर्देशक ओलिवियर असायास ने उसे लेदर जैकेट, मिलिट्री कैप और एविएटर चश्मे से सजे एक करिश्माई, रहस्यमय और लगभग रॉकस्टार जैसी छवि वाले किरदार के रूप में प्रस्तुत किया। अपराध का इतिहास मौजूद रहता है, पर उसकी सिनेमाई स्मृति अक्सर शैली और व्यक्तित्व के आकर्षण से ढक जाती है।
यहीं सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है। क्या यह केवल कलात्मक स्वतंत्रता है, या फिर मानवाधिकार, संवेदना और जटिल चरित्र-चित्रण के नाम पर हिंसक विचारधाराओं का नैतिक मानवीकरण? क्या सिनेमा अनजाने में दर्शकों की स्मृति का ऐसा पुनर्निर्माण कर रहा है, जिसमें अपराधी का व्यक्तित्व उसके अपराधों से अधिक याद रह जाता है? इस प्रश्न का उत्तर केवल फिल्मकारों को नहीं, बल्कि पूरे समाज को मिलकर खोजना होगा।