अमिट अटल : ‘पत्रकारिता में यथार्थ सूचना के पक्षधर थे अटल जी’
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अमिट अटल : ‘पत्रकारिता में यथार्थ सूचना के पक्षधर थे अटल जी’

कार्यकम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने अपने विचार व्यक्त किए, प्रस्तुत हैं उसके मुख्यांश-

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jul 15, 2026, 12:31 pm IST
in पाञ्चजन्य इवेंट

यह हमारा सौभाग्य है कि मुझे अटल जी से मिलने, बात करने और उनका भाषण प्रत्यक्ष सुनने का अवसर मिला। यह विदित है कि अटल जी का बचपन ग्वालियर में बीता था। वहीं वह संघ से जुड़े और 27 साल की उम्र में स्वयंसेवक और प्रचारक बने। उन्हें श्रद्धेय भाऊराव देवरस जी का मार्गदर्शन मिला। तब शायद उन्हें भी पता नहीं होगा कि उनका भविष्य क्या होगा!

उन दिनों ‘पाञ्चजन्य’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। अटल जी ने बतौर संपादक ‘पाञ्चजन्य’ में काम किया। वह लेखन के अलावा, भाषण देने और कविता लेखन में भी निपुण थे। उन्हें पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी से प्रेरणा और मार्गदर्शन मिला। वह विचारशील लेखक और पत्रकार के रूप में प्रसिद्ध हुए। उन्होंने इस क्षेत्र में अपनी एक अमिट छाप छोड़ी।

हिंदू तन मन

उनकी कविता ‘हिंदू तन मन’ को हम लोग सुनते रहे हैं। पहली बार यह कविता ‘पाञ्चजन्य’ में छपी थी। आज भी अटल जी की यह कविता बहुत प्रसिद्ध है। उनकी इस कविता से देश के हर व्यक्ति को आपना परिचय एक ही पंक्ति में मिल जाता है। वास्तव में, यह अपने-आप में अमर कविता है। समाज और संस्कृति के अखंड राष्ट्र जीवन को परिलक्षित करती हुई यह कविता अपने आप में अमर है।

अपनी बात पर अडिग

उस समय ‘पाञ्चजन्य’ के प्रथम और संस्थापक संपादक अटल जी थे। अपने संपादन काल में अटल जी ने जम्मू-कश्मीर के संबंध में संपादकीय में लिखा, जिसका शीर्षक था-‘जम्मू कश्मीर से समझौता नहीं होने देंगे’। उस संपादकीय के शब्दों को उन्होंने जीवन के अंतिम क्षण तक निभाया और यह समझौता नहीं होने दिया।

अटल जी की विशेषता थी कि जो भी पुस्तक या पत्रिका उनके आवास पर आती थी, वह उनको पढ़ते और अपने विचार जरूर रखते थे। उन दिनों मैं विद्यार्थी परिषद की पत्रिका ‘छात्र शक्ति’ के संपादन से जुड़ा हुआ था। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष परमेश्वरन् का मदुरै में उनकी हत्या हो गई थी, उसकी खबर को प्रकाशित किया था। प्रधानमंत्री अटल जी की सरकार 1 जून 1996 को एक वोट से गिर गई थी। उसी शाम उनको हमलोग पत्रिका भेंट करने गए थे। उन्होंने बड़े मनोयोग से पत्रिका को देखा। लेकिन जब उन्होंने परमेश्वरन् जी की मृत्यु की खबर को देखा, तो उनकी आंखें नम हो गईं और उनका कवि हृदय भावुक हो गया। उन्होंने भर्राए गले से सिर्फ इतना कहा कि बड़ा अन्याय हो गया।

जनप्रिय राजनेता

अटल जी दमदार वक्ता थे। वह श्रोताओं को देखकर अपने भाषण के विषय का चयन करते थे। वह अपने चुनावी भाषण के दौरान जनसमूह की आयु क्या है, महिलाएं ज्यादा हैं या पुरुष ज्यादा हैं या युवा ज्यादा हैं, इसे देखकर मुद्दे को तय करते थे। वह एक भाषण को दोहराते नहीं थे। अलग-अलग स्थान के लिए अलग-अलग भाषण तैयार करते थे। इसलिए कहा जाता है कि जनता की नब्ज पर उनकी अंगुली रहती थी।

मुझे आपातकाल यानी 25 जून 1975 की घटना याद आ रही है। 25 जून की मध्य रात्रि में आपातकाल घोषित हुई थी। उसकी अगली सुबह शाखा के बाद हम लोग बेंगलुरु में आडवाणी जी और अटल जी से मिलने विधायक भवन में पहुंचे। उन दिनों टीवी और मोबाइल वगैरह कुछ नहीं था। जब हमने जाकर बताया कि देश में आपातकाल घोषित हो गया है। यह बात सुनकर, उन्होंने आडवाणी जी से कहा कि हमें समाचार एजेंसियों-यूएनआई और पीटीआई को फोन लगा कर, अपना वक्तव्य देना होगा। इसे सुनकर आडवाणी जी ने कहा कि अब हमारा वक्तव्य प्रकाशित नहीं होगा। वह कितना कठिन समय था!

‘पाञ्चजन्य’ से अथाह प्रेम

मैंने हितेश शंकर जी और पूर्व के संपादकों से भी सुना है कि ‘पाञ्चजन्य’ के प्रकाशन के बाद हर अंक अटल जी के घर पर पहुंचता था। वह उसे बड़े मन से पढ़ते थे। उसके बारे में वह प्रशंसा करते थे। ‘पाञ्चजन्य’ में प्रकाशित-‘काशी में सामाजिक समरसता’ का संदर्भ जिसमें डोम राजा का हिंदू साधु-संतों ने सम्मान किया, इसे पढ़कर भी वह खुश हुए।

वह मानते थे कि काल के प्रवाह के साथ-साथ हिंदू समाज के अंदर परिवर्तन होना चाहिए। इस कार्य को आध्यात्मिक एवं सामाजिक संस्थाएं कर रही हैं। ‘पाञ्चजन्य’ ने उस पर एक विशेषांक छापा था। उसमें गायत्री परिवार, अमृतानंदमई माता, रामकृष्ण मिशन जैसे बहुत-सी संस्थाओं का वर्णन था। तब उन्होंने कहा कि इतने परिवर्तन हो रहे हैं, वह लोगों को मालूम क्यों नहीं हो रहा है? इसका अधिकाधिक प्रचार किया जाना चाहिए।

सार्वजनिक जीवन की मर्यादा

अटल जी मानते थे कि सार्वजनिक जीवन में व्यक्तिगत आलोचना और निजी जीवन पर अनावश्यक चर्चा नहीं करनी चाहिए। यह सार्वजनिक जीवन के लिए ठीक नहीं है। वह संसद में अनुशासन को तोड़ने के विरुद्ध थे। वह सार्वजनिक जीवन में अनुशासन एवं नैतिकता के सिपाही थे। वह हमेशा अनावश्यक बयानबाजी और नारेबाजी से दूर रहे।

वह पत्रकारिता में यथार्थ सूचना और शुद्ध विचार के पक्षधर थे। उनके अनुसार ‘पाञ्चजन्य’ केवल एक पत्रिका का नाम नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है। जैसे महाभारत के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण ने ‘पाञ्चजन्य’ शंख बजाकर गीता का दिव्य संदेश दिया था, उसी प्रकार यह राष्ट्र के सनातन विचारों और सांस्कृतिक मूल्यों का संदेश लोगों तक पहुंचाने का प्रतीक है। इसलिए सार्वजनिक जीवन में, पत्रकारिता के क्षेत्र में, विचार के क्षेत्र में, बौद्धिकता के वलय में, विचार की जो प्रस्तुति हो, उसका मंथन होना चाहिए। हमारे देश की परंपरा है कि लोगों से प्रेम के साथ विरोधियों को भी गले लगाया जाए। अटल जी उसी परंपरा के वाहक थे। ‘पाञ्चजन्य’ के संदर्भ में मैं कहूंगा कि यह व्रत है, तपस्या है, आप इसे कर रहे हैं। अटल जी ने इस साधना को कई वर्षों तक किया। पत्रकार सामान्यता एक न्यायाधीश की तरह होता है।

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